कहानियां

छीपा कला के पुर्नजीवन की ‘आशा’

छीपा कला कपड़ों पर रंगकारी की एक ऐसी कला जो कई सौ सालों में फली-फूली आगे बढ़ी। तकरीबन पचास साल पहले मशीनों के बढ़ते प्रयोग से बेदम होती चली गई। तकरीबन गायब ही हो गई। इसको अपनाने वाले परिवारों के आगे रोजी-रोटी का संकट होता चला गया, वे कोयला खदानों में मजदूर बन गए या किसी और काम में लग गए।

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पढ़ाई का सपना पूरा करने सास ने दी हिम्मत

अक्सर समाज में सास और बहू के रिश्ते को अलग नजर से देखा जाता है, लेकिन मेरे लिए मेरी सासू माँ एक सहारा बनकर सामने आईं। उन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए न केवल प्रेरित किया, बल्कि हर कदम पर मेरा साथ भी दिया, इसी का नतीजा है कि मैं आज मैं 12 वीं की पढ़ाई कर रही हूं। यह कहानी है एक ऐसी बहू की जिसे कम उम्र में विवाह के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

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कंचन की हरी उम्मीद

जयपुर जिले के किशनगढ़ रेनवाल की एक साधारण महिला कंचन ने अपनी बीमारी और कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया। एक बीमारी के कठिन अनुभव ने उसे न सिर्फ खुद बदलने के लिए प्रेरित किया, बल्कि पूरे समुदाय में एनीमिया को खत्म करने के लिए पोषण बाग आंदोलन चलाने का रास्ता दिखाया। कंचन ने 155 परिवार में पोषण बाग तैयार कराने में भूमिका निभायी है जिससे महिलाओं और किशोरियों का स्वास्थ्य बेहतर हो रहा है।

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उजाले की शाला

सन् 1992 की बात है। झाबुआ जिला मध्यप्रदेश के छोटे से गांव “काली घाटी” में सूरज ढलते ही सब सन्नाटा हो जाता था। खेतों में दिनभर काम करने वाले बच्चों की आंखों में पढ़ने का सपना था, पर उनके हाथों में कलम की जगह हल था। स्कूल की घंटी उनके लिए पराई थी, क्योंकि सुबह होते ही उन्हें पशुओं को चराने जाना पड़ता था।

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जब ग्राम सभा में पहुंचने लगी महिलाएं

यह कहानी झारखंड के हजारीबाग जिले के ग्राम पंचायत बच्छई की है, जहां कभी ग्राम सभा केवल औपचारिकता बनकर रह गई थी। महिलाओं की भागीदारी बेहद कम थी और उनके मुद्दे अनसुने रह जाते थे। लेकिन जागरूकता, प्रशिक्षण और निरंतर प्रयासों से वही ग्राम सभा आज महिलाओं के नेतृत्व और सक्रिय भागीदारी का सशक्त मंच बन चुकी है।

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सूदखोरी का जाल तोड़ती ‘धोड़ी बैंक

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल झाबुआ जिले में एक समय ऐसा था जब सूरज ढलने के बाद केवल रात का अंधेरा ही नहीं, बल्कि कर्ज का काला साया भी गहरा जाता था। यहां गरीबी केवल फटे हुए कपड़ों या खाली थाली का नाम नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसी नियति बन चुकी थी जिससे निकलना नामुमकिन लगता था।

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‘हाथ सिर्फ मेहंदी नहीं, अब ऑइल से भी सना करेंगे’

खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक के छोटे से गांव सांवलीखेड़ा की रहने वाली गायत्री कासदे आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हौसले, आत्मनिर्भरता और नारी सशक्तिकरण की मिसाल बन चुकी हैं। मात्र 8वीं तक पढ़ी गायत्री ने समाज की उन सोचों को चुनौती दी, जो यह मानती थीं कि लड़कियों का काम केवल घर संभालना है।

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जैविक खेती की ओर दूदू के किसान

दूदू की यह कहानी केवल खेती के बदलाव की नहीं, बल्कि एक पूरे समाज के बदलते जीवन की कहानी है। रासायनिक खेती के कारण बिगड़ती जमीन, पलायन करते युवा और बढ़ते अपराध के बीच एक नई राह की शुरुआत होती है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे सही मार्गदर्शन और सामूहिक प्रयास से न केवल खेती, बल्कि युवाओं का भविष्य भी बदला जा सकता है।

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उसके न दिखने की खुशी और सुकून

आज फिर इतने सालों के बाद वैसा ही मंजर सामने आया। अपने ऑफिस जाने के लिए मैं रोज एक ही रास्ते से जाती हूं। आज मुझे रास्ते में एक चौराहे पर एक महिला दिखी, उम्र लगभग 30 साल होगी, इससे पहले मैंने उसे वहां कभी नहीं देखा था। कुछ सूदबुदाई सी वो महिला रास्ते पर अजीब तरीके से बैठी थी। उसके पास एक गंदे कपड़ों का पोटला था और एक गंदा गद्दा, जिस पर वो बैठी थी। मैंने उसे मेरी चलती गाड़ी में से एक नजर से बस देखा था, और मैं वहां से गुजर गई। लेकिन उस एक नजर में ही मानो सब कुछ हो गया।

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लडवारी की महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण

बुंदेलखंड अंचल के गांवों में जहां जनजीवन कर्ज के जाल में फंसा हुआ है वहीं लडवारी गांव की महिलाएं मंजरी फाउंडेशन से जुड़कर स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। टीकमगढ़ जिले के लडवारी और आसपास के गांवों में 273 स्वयं सहायता समूह कार्यरत हैं। इनसे जुड़ी 2,500 महिलाओं ने 23 लाख रुपये से अधिक की सामूहिक बचत की है और 46 लाख रुपये का ऋण प्रवाह सुनिश्चित किया है।

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