कहानियां

उसके न दिखने की खुशी और सुकून

आज फिर इतने सालों के बाद वैसा ही मंजर सामने आया। अपने ऑफिस जाने के लिए मैं रोज एक ही रास्ते से जाती हूं। आज मुझे रास्ते में एक चौराहे पर एक महिला दिखी, उम्र लगभग 30 साल होगी, इससे पहले मैंने उसे वहां कभी नहीं देखा था। कुछ सूदबुदाई सी वो महिला रास्ते पर अजीब तरीके से बैठी थी। उसके पास एक गंदे कपड़ों का पोटला था और एक गंदा गद्दा, जिस पर वो बैठी थी। मैंने उसे मेरी चलती गाड़ी में से एक नजर से बस देखा था, और मैं वहां से गुजर गई। लेकिन उस एक नजर में ही मानो सब कुछ हो गया।

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लडवारी की महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण

बुंदेलखंड अंचल के गांवों में जहां जनजीवन कर्ज के जाल में फंसा हुआ है वहीं लडवारी गांव की महिलाएं मंजरी फाउंडेशन से जुड़कर स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। टीकमगढ़ जिले के लडवारी और आसपास के गांवों में 273 स्वयं सहायता समूह कार्यरत हैं। इनसे जुड़ी 2,500 महिलाओं ने 23 लाख रुपये से अधिक की सामूहिक बचत की है और 46 लाख रुपये का ऋण प्रवाह सुनिश्चित किया है।

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माया का जीवन संघर्ष: एक संदेश

संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, सही सहयोग, अवसर और आत्मविश्वास से जीवन की दिशा बदली जा सकती है। परिवार की आर्थिक तंगी, बाल विवाह और फिर घरेलू हिंसा का सामना करने वाली माया के जीवन में कुछ ऐसा हुआ जिसने उसकी दिशा और दशा बदल दी। माया की कहानी कठिन परिस्थितियों में रह रही महिलाओं के लिए एक सकारात्मक संदेश है।

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विस्थापित बैगाओं को मिला मछली पालन का सहारा

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के दलदली बोदई गांव में पुस्तैनी रूप से रह रहे बैगा जनजातीय परिवारों को 26 साल पहले बालको-वेदांता कंपनी की बॉक्साइट खनन परियोजना के कारण विस्थापित होना पड़ा। तब गांव के 16 परिवारों ने विस्थापन का दर्द झेलते हुए इन्द्रीपानी नाम से न सिर्फ अपना नया गाँव बसाया बल्कि मछ्ली पालन को अपनाते हुए अपनी आजीविका का प्रबंधन भी किया। इस सामुदायिक पहल में ग्रामोदय ग्राम विकास समिति, कवर्धा की अहम भूमिका रही है।

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संगम का जुनूनी सफर

जमुई बिहार के सिमुलतला प्रखण्ड के एक छोटे से गांव वनगवां से शुरू होने वाली संगम कुमारी की कहानी केवल एक लड़की की नहीं, बल्कि उस जिद, साहस और आत्मसम्मान की है, जो हालातों से टकराकर अपना रास्ता खुद बनाती है। संगम का जन्म 6 दिसंबर 2003 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। उस समय गांव का माहौल ऐसा था, जहां बेटियों को अक्सर जिम्मेदारी से ज्यादा बोझ समझा जाता था।

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सुकमती का जीवन संघर्ष 

वर्धा की लाल मिट्टी में एक ख़ासियत है वह जो कुछ भी सोखती है, उसे भीतर ही रखती है। बारिश सोख लेती है, आंसू सोख लेती है, और कभी-कभी पूरी ज़िंदगी भी। सुकमती भी इसी मिट्टी की बेटी थी, वर्धा ज़िले के घने जंगल के कोर पर बसी गोंड बस्ती में जहां घर कम और झोपड़ियां ज़्यादा थीं।

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लैंगिक समानता के लिए “समावेशी क्रिकेट”

हरदा शहर अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी और मैदान के एक कोने में 12 से 20 साल की कुछ स्कूल और कॉलेज की लड़कियां  क्रिकेट की प्रैक्टिस कर रही थीं। उनके हाथों में बैट था, लेकिन उनके सामने केवल गेंद ही नहीं, बल्कि समाज की कई धारणाएं  भी थीं। यही वह पल था जहां  से एक ऐसी कहानी शुरू हुई, जो आगे चलकर लैंगिक समानता के एक अभियान में बदल गई।

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बंधुआ मजदूरी के खिलाफ एक मुहिम जारी है !

लगभग पांच  दशक पहले कुछ युवाओं ने अपने समाज की पीड़ा को बहुत करीब से महसूस किया। तब दलित समुदाय के लोग छुआछूत, अपमान और अमानवीय जीवन जीने को मजबूर थे। भूमिहीनता और आर्थिक कमजोरी ने उन्हें जमींदारों का गुलाम बना दिया था, जहां  वे पीढ़ियों तक बंधुआ मजदूरी करने को विवश थे। जीवन की बुनियादी जरूरतों और परिवार में जन्म, विवाह या मृत्यु से जुड़े सामाजिक रिवाजों को निभाने के लिए यह समुदाय बंधुआ मजदूरी और पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्ज के जाल में फंसा हुआ था। इन अमानवीय परिस्थितियों को बदलने के संकल्प के साथ ‘जन जागृति केंद्र’ की स्थापना हुई। 

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बेघर लड़कियों का एक हौसला

साल 1984 की बात है। पुणे जिले के एक छोटे से गांव  में प्रभा नाम की एक नन्ही बच्ची रहती थी। वह तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। हर रोज़ जब वह स्कूल जाती, तो अपनी सहेलियों के सुंदर-सुंदर बैग देखकर उसके मन में एक छोटी-सी इच्छा जन्म लेती “काश मेरे पास भी ऐसा सुंदर बैग होता।” लेकिन उसकी परिस्थितियां उसकी इच्छाओं से कहीं अलग थीं, उसके पास एक साधारण-सी थैली थी।

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ऐसे पूरी हुई चाहत की चाहत 

यह बात 15 जुलाई 2024 की है, बरसात का मौसम था, बारिश होकर थम चुकी थी। ठंडी-ठंडी हवाएं  चल रही थीं और चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी। हवा के झोंकों से फसलें लहराते हुए जैसे जीवन का संगीत गुनगुना रही थीं। हमारा कार्यक्षेत्र बड़वानी जिले के ग्राम भवती में था। एक मोहल्ले से गुजरती कच्ची गलियों में पानी जमा था और अधिकांश लोग खेतों या मजदूरी के काम में लगे हुए थे। उसी समय हमारी संस्था ‘पहल जन सहयोग विकास संस्थान’ की टीम विभिन्न गाँवों में घर-घर जाकर बच्चों की शिक्षा की स्थिति समझने के लिए सर्वे कर रही थी।

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