बेघर लड़कियों का एक हौसला

राजश्री रासकर
वर्क फॉर इक्वालिटी, पुणे, महाराष्ट्र

साल 1984 की बात है। पुणे जिले के एक छोटे से गांव में प्रभा नाम की एक नन्ही बच्ची रहती थी। वह तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। हर रोज़ जब वह स्कूल जाती, तो अपनी सहेलियों के सुंदर-सुंदर बैग देखकर उसके मन में एक छोटी-सी इच्छा जन्म लेती “काश मेरे पास भी ऐसा सुंदर बैग होता।” लेकिन उसकी परिस्थितियां उसकी इच्छाओं से कहीं अलग थीं, उसके पास एक साधारण-सी थैली थी। उसकी उदासी को उसकी माँ ने महसूस किया। माँ ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उन्हें शिक्षा का महत्व भली-भाँति पता था। उन्होंने ताड़पत्री से एक बैग सिलकर प्रभा को दिया। वह बैग भले ही साधारण था, लेकिन उसमें माँ का प्यार और संघर्ष छिपा था।
प्रभा के परिवार में पांच भाई-बहन थे। घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो जाता था। प्रभा अक्सर सोचती “मेरी सहेलियों के माता-पिता स्कूल की मीटिंग में आते हैं, लेकिन मेरी माँ क्यों नहीं आती?” धीरे-धीरे उसे समझ में आया कि उसकी माँ सुबह से काम पर निकल जाती हैं और पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। उसके पिता नशे की लत के कारण ज्यादा काम नहीं कर पाते थे। माँ घर चलाने के लिए दिन-रात मेहनत करती थीं। इन परिस्थितियों ने प्रभा को बहुत छोटी उम्र में ही जीवन की सच्चाई से रूबरू करा दिया।

समय बीतता गया। जब प्रभा दसवीं कक्षा में पहुंची , तब घर की स्थिति और भी कठिन हो गई। उसकी माँ रोज़ इमली की टोकरी लातीं, और प्रभा अपने भाई-बहनों के साथ मिलकर इमली के बीज अलग करती। पूरे दिन की मेहनत के बदले उन्हें केवल बीस रुपये मिलते थे। ऐसे में पढ़ाई करना, किताबें खरीदना और समय निकालना बेहद कठिन था। लेकिन प्रभा ने हार नहीं मानी। उसने संघर्षों के बीच पढ़ाई जारी रखी और दसवीं की परीक्षा डिस्टिंक्शन से पास की। उस दिन उसकी माँ की आंखों में खुशी के आँसू थे, वह उनकी मेहनत का पहला बड़ा फल था।
इस परीक्षा परिणाम से प्रभा का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ। उसने महसूस किया कि समाज में शिक्षा की कमी ही गरीबी, बेरोजगारी, अंधविश्वास और नशा जैसी समस्याओं की जड़ है। उसने मन ही मन ठान लिया कि वह न केवल खुद आगे बढ़ेगी, बल्कि दूसरों को भी आगे बढ़ने में मदद करेगी। कठिनाइयों के बावजूद उसने बाहर से बी.ए. किया और फिर मास्टर ऑफ सोशल वर्क (MSW) की पढ़ाई भी पूरी की। अब वह समझ चुकी थी कि केवल पेट भरना ही जीवन नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर बनना भी उतना ही जरूरी है। पढ़ाई के बाद उसे सेक्स वर्कर महिलाओं के साथ काम करने का अवसर मिला। वहां उसने देखा कि अधिकतर महिलाएं मजबूरी में इस काम में आती हैं। अगर उन्हें शिक्षा और सहारा मिला होता, तो उनका जीवन कुछ और हो सकता था। इस अनुभव ने उसके अंदर एक मजबूत संकल्प पैदा किया।
2010 में उसने अपनी साथियों के साथ मिलकर “वर्क फॉर इक्वलिटी” संस्था की स्थापना की। शुरुआत कठिन थी, न संसाधन, न पहचान, लेकिन इरादे मजबूत थे। एक दिन ट्रेन में उसने दो छोटी लड़कियों को सामान बेचते देखा। बातचीत में पता चला कि वे अनाथ हैं और पढ़ाई से दूर हैं। उस दिन प्रभा ने तय कर लिया कि वह ऐसे बच्चों के लिए काम करेगी। तब वर्ष 2018 में उसने 50 बेघर लड़कियों के लिए एक वसतिगृह शुरू किया जिससे जुड़कर आज बड़ी संख्या में बेघर और जरूरतमन्द लड़कियों को शिक्षा, नेतृत्व और आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ्ने का हौसला मिल रहा है।
