सामाजिक क्षेत्र की इलाकाई मानसिकता और असुरक्षा
2005 की बात है। यूपीएससी के इम्तिहान में धूल चाटने के बाद जब मैं नए सिरे से जीवन में मायने ढूंढने की कोशिश कर रहा था। तब मैंने उत्तराखंड में एक संस्था में काम करने की ठानी। संस्था वालों ने काफी वक़्त लगाया मेरी दरख्वास्त पर विचार करने के लिए। बहरहाल, लगभग 1 महीने की मशक्कत और बार बार याद दिलाने पर, संस्था के निदेशक साहब ने मुझे मिलने के लिए बुलाया। जुलाई के एक बेहद तेज़ बारिश भरे और ठन्डे दिन मैं वहां कांपते हुए पहुंचा। एक गर्म चाय के साथ एक छोटे से मगर साफ़ सुथरे कमरे में मुझे बिठाया गया।
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