यह हमारा समूह है
सामाजिक क्षेत्र की इलाकाई मानसिकता और असुरक्षा

2005 की बात है।
यूपीएससी के इम्तिहान में धूल चाटने के बाद जब मैं नए सिरे से जीवन में मायने ढूंढने की कोशिश कर रहा था। तब मैंने उत्तराखंड में एक संस्था में काम करने की ठानी। संस्था वालों ने काफी वक़्त लगाया मेरी दरख्वास्त पर विचार करने के लिए। बहरहाल, लगभग 1 महीने की मशक्कत और बार बार याद दिलाने पर, संस्था के निदेशक साहब ने मुझे मिलने के लिए बुलाया। जुलाई के एक बेहद तेज़ बारिश भरे और ठन्डे दिन मैं वहां कांपते हुए पहुंचा। एक गर्म चाय के साथ एक छोटे से मगर साफ़ सुथरे कमरे में मुझे बिठाया गया। निदेशक साहब ने मुझसे पूछा कि क्या करना चाहते हो। मैंने कहा मुझे पता नहीं। पर शायद आप मौका दें तो कुछ समझ पाऊं। मैंने कहा मैं ज्यादा दिन आपके संसाधन जाया नहीं करूंगा। पर क्या कर सकता हूँ, बता नहीं सकता। मैं बस एक ग्रेजुएट था जिसके पास JNU का माइग्रेशन सर्टिफिकेट था और यूपीएससी के मेन्स और इंटरव्यू की मार्कशीट यादगार के तौर पर । इसके अलावा कुछ नहीं।
उन्होंने पता नहीं क्या सोच कर मुझसे कहा, “अच्छा तुम यहाँ 2-3 दिन रहो। अलग अलग काम देखो। और फिर मिलकर तय करेंगे कि क्या करना है ।”
फिर मुझे एक चाय और पिलायी गयी और फिर पास के गाँव की ओर जाती हुयी एक महिला कार्यकर्ता (आगे उन्हें दीदी कहूंगा) के साथ गांव जाने को कहा गया। वहां एक महिला स्वयं सहायता समूह की बैठक होने वाली थी और उन्हें उसे संचालित करना था। हम चल दिए उनके साथ। बैठक में पहुंचे तो २-3 महिलाएं वहां पर थीं पर बाकियों का इंतज़ार करना था। जब बाकी महिलाएं भी आयीं, तो दीदी ने उन्हें उलाहना दिया, कि घडी देखिये, कितनी देर हो गयी है। बाकी महिलाओं ने मज़ाक में कहा कि हमें तो बहुत काम होता है, घडी का क्या है, ये तो चलती ही रहती है। मुझे अभी तक तो मज़ा आ रहा था। दीदी ने बैठक की कार्यवाही थोड़ी आगे बढ़ाई। समूह के कोष की जानकारी दी गयी, उससे जो क़र्ज़ लिए गए थे, उनके वापसी के बारे में प्रगति पर चर्चा हुयी। अभी यह सब चल ही रहा था कि बैठक के कमरे में दो और महिलाएं दाखिल हुईं। सामान्य शिष्टाचार और कुशल क्षेम पूछने के बाद इन महिलाओं ने समूह की महिलाओं को मिलकर एक गीत गाने के लिए राज़ी कर लिया। गीत तो मुझे याद नहीं पर वह था बहुत विचारोत्तेजक। महिलाओं को उनकी सामाजिक स्थिति का आभास दिलाने वाला और प्रेरणा देने वाला। मैंने अपनी संस्था वाली दीदी से पूछा कि ये लोग कौन हैं तो पता चला कि वह महिला सामाख्या कार्यक्रम की कार्यकर्ता थीं जो महिला सशक्तिकरण के मुद्दे के लिए सरकार का ही एक कार्यक्रम था। मैंने इसके बारे में अपनी यूपीएससी की तैयारी में पढ़ा था। अब जाकर असल में पता चला कि उस कार्यक्रम में क्या होता है। मुझे उन महिलाओं की कही हर बात, महिला अत्याचारों और उनके शोषण के खिलाफ, महिला स्वास्थ्य और पोषण सम्बन्धी जानकारी, सब कुछ बहुत ही अच्छी लगी। यह सब कुछ आधा घंटे चला और वह महिलाएं चली गयीं। हमारी बैठक का भी समापन होने लगा। दीदी ने आखिर में मुझसे कहा कि मैं महिलाओं की बातचीत से हुए अनुभव और उसके बारे में मैं क्या सोचता हूँ, उसे सबके साथ साझा करूँ। मैं अचानक से थोड़ा फंस गया था। मुझे लगा शायद यही मेरा टेस्ट होगा। मैंने वही कहा जो उस समय मुझे महसूस हो रहा था।
मैंने कहा, “दीदी आप सबको बहुत धन्यवाद मुझे अपनी बैठक में शामिल करने के लिए। आप लोग जो अपने समूह के बारे में बात कर रहे थे, वो सारी बातें मुझे बहुत अच्छी लगी। लेकिन मुझे वो महिला समाख्या वाली दीदी की कही बात भी बहुत दिल को छू लेने वाली लगी। आप लोग ज़रूर उसके बारे में भी सोचियेगा।” ये कहकर मैंने, समूह की महिलाओं को देखा और फिर हमारी संस्था वाली दीदी को जो शायद बालक (मुझसे) से कुछ और जवाब सुनना चाह रही थी।
खैर हम वहां से वापस अपने ऑफिस के लिए चल दिए। ऑफिस कुछ 2-3 कम दूर था तो मैं और दीदी ने यहाँ वहां की बातें शुरू कर दी। पता चला दीदी के बच्चों के बारे में, उनके संस्था में काम के बारे में और ऐसे ही और बहुत सी बातें। बातों बातों में मैंने उन्हें बताया कि मुझे वो महिला सामाख्या की बातें बहुत अच्छी लगी। अब शायद दीदी को लगा कि मुझ पर से ये महिला सामाख्या का भूत उतारना ज़रूरी है। वो बहुत नम्रता के साथ बोली-
“असल में ये लोग हमारा फायदा उठाने आ जाते हैं। “
मैं चौंक गया। मैंने पूछा कैसे?
वो बोली, “अब हमने इतनी मेहनत से समूह खड़ा किया है। और वो बिना कोई मेहनत किये बैठक में आ जाती हैं। बस थोड़ी बात करके चली जाती है। ये हमारा समूह है। ऐसे ही कोई उसकी बैठक में आ जाए तो अच्छा नहीं लगता। “
“ये हमारा समूह है “.
ये वाक्य मेरे दिमाग में तब से लेकर आज तक गूंजता रहता है। इस घटना को 20 साल हो चुके हैं। आज भी संस्थाएं इसी फेर में पड़ी हुयी हैं। अपने क्षेत्र और अपने द्वारा बनाये गए संगठनों के प्रति हमारा व्यवहार और हमारी इलाकाई मानसिकता। जिस समुदाय के लिए काम करते हैं, उसपर हक़ जमाने की इच्छा लगभग हर अच्छे या औसत सामाजिक कार्यकर्ता के अंदर आ ही जाती है। एक बार कोई संस्था जहाँ काम कर लेती है, वहां किसी दूसरी संस्था का प्रवेश जैसे दिल पर छुरियां चला देता है। जब सरकार ने आजीविका मिशन स्थापित कर के एक झटके में संस्थाओं से उनके समूह छीन लिए थे, तब न जाने हज़ारों सामाजिक संस्था कार्यकर्ताओं के दिल पर क्या गुज़री होगी जिनका जीवन उन समूहों को बनाने में गुज़रा था।
मुझे अपने संस्था के साथियों के दिल दुखाने के पहले इस बात इस बात की भी तस्दीक करनी चाहिए कि मैं खुद भी जब मंडला में था, तब भौगोलिक पहुँच के रूप में तो नहीं पर सैद्धांतिक रूप से मैं भी “हम चुनी दीगरे नीस्त” यानी “यहाँ ज्ञान न दें, यहाँ सभी ज्ञानी हैं” वाली भावना से ग्रसित रहा। मेरे लिए कामकाजी जीवन में सबसे पहले “समाज और पारिस्थितिकी के बीच का सम्बन्ध ” महत्त्वपूर्ण रहा और अर्थव्यवस्था बाद में। इस विचार पर बिना खटके काम करने के लिए बहुत से नियम मैंने खुद बनाये और कुछ जिस संस्था में काम करता था, उससे मिले। मेरी स्वीकारोक्ति का अर्थ यह नहीं कि आज मुझे वह नियम गलत लगते हैं पर इन नियमों ने मुझे बिला वजह एक कुँए का मेंढक भी बना दिया। और तो और मैं सरकार तक से भी यह उम्मीद करता था कि वह मेरा दृष्टिकोण समझे न कि मैं उनका।
अब सरकार तो सरकार है। पर संस्थाओं के बीच में भी सतही तौर पर ही संवाद हो रहा है। बहुत कम स्थान ऐसे हैं जहाँ हम अनौपचारिक तौर पर बिना आंके जाने के खतरे को मोल लिए बात कर सकें।संस्थाएं बानी तो किसी और उद्देश्य के लिए थी। लेकिन उनकी स्थापना के पीछे का विचार असल में कॉर्पोरेट या कहें कि फौजी स्थापन ( ऐस्टैब्लिशमेंट) से आता है। जिस तरह दुनिया में और संस्थाएं बनीं, उसी तरह संस्थाओं ने भी फौजी प्रशासन के विचार और सिद्धांतों से ही प्रेरणा ली, कभी कम कभी ज़्यादा। हमारा एक मिशन होता है, एक विचार कि हमारी संस्था से अच्छा आजीविका कार्यक्रम, इससे अच्छा महिला सशक्तिकरण, या भू-दृश्य बहाली कहीं नहीं है। एक कलेक्टर या सरकारी अफसर के सामने हम अपने अपने विचार को लेकर प्रतियोगिता करते दिखाई देते हैं।डरते रहते हैं कि हमारा काम कोई छीन न ले जाए। इस सबके चलते हम एक जार में रखे हुए केकड़ों की तरह व्यवहार करते हैं, जोकि ऊपर चढ़ने वाले केकड़े की टांग खींचने में लगे रहते हैं। फिर कोई भी उससे बाहर निकल नहीं पाता।
उत्तरजीविता (survival ) का संघर्ष इतना ज़्यादा है कि चाहते हुए भी हम एक दूसरे से नहीं सीख पाते। दानदाताओं का मॉडल भी संस्थाओं को एक दूसरे से जोड़ने में कोई मदद नहीं करता । आमतौर पर संस्थाएं दानदाताओं के सामने लाइन लगाकर खड़ी रहती हैं और अपने को दूसरे से अलग दिखाने की कोशिश करती रहती हैं। चार संस्थाएं मिलकर कोई कार्यक्रम बनाएं, ऐसा कितनी बार होता है? अगर होता भी है, तो क्या इसे दानदाताओं का समर्थन मिलता है? बहुत कम। इसके बहुत से कारण हैं। मिलकर काम करने का विचार यदि किसी फण्ड को पाने के लिए पैदा हुआ हो, तो ज़रूरी नहीं कि दो संस्थाएं मिलकर काम करने के विचार के बाद भी मिलकर काम कर पाएं। यदि फण्ड नहीं मिला तो वह संवाद भी गया पानी में। मिलकर काम करने के सिद्धांत बनाना और उनपर अमल करना एक अलग संस्था बनाने के बराबर का काम है। उसपर लगन से सालों काम करना पड़ता है, संस्थाओं के मिज़ाजों के खिलाफ, कभी कभी संस्थाओं के संस्थापकों के खिलाफ भी।
भारत में सामाजिक संस्थाएं अपने सबसे कठिन दौर से गुज़र रही हैं। उन्हें दसों दिशाओं से मार पड़ रही है। ये किसी से छिपा नहीं है। पर मैं जितना समझता हूँ कि मुश्किल समय ही नए विचारों को जन्म देता है। मुझे उम्मीद है कि भारत की सामाजिक संस्थाएं इस समय का लाभ उठाएंगी। सामाजिक संस्थाओं की ऐतिहासिक भूमिका के कारण ही आज इस देश में तमाम समस्याओं के बावजूद लोकतंत्र है, बहुत से लोक-कल्याणकारी कार्यक्रम हैं। पर यदि हम इकट्ठे नहीं हुए तो लोकतंत्र को बचाने वाली एक और ढाल टूट जायेगी।
ईशान अग्रवाल एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और शोधार्थी हैं। यह लेख मूल रूप से उनके ब्लॉग मैं कबीर पर प्रकाशित हुआ है। लेखक की सहमति से सिविक आख्यान पर प्रकाशित कर रहे हैं।

