मंथन
सामाजिक क्षेत्र की इलाकाई मानसिकता और असुरक्षा
2005 की बात है। यूपीएससी के इम्तिहान में धूल चाटने के बाद जब मैं नए सिरे से जीवन में मायने ढूंढने की कोशिश कर रहा था। तब मैंने उत्तराखंड में एक संस्था में काम करने की ठानी। संस्था वालों ने काफी वक़्त लगाया मेरी दरख्वास्त पर विचार करने के लिए। बहरहाल, लगभग 1 महीने की मशक्कत और बार बार याद दिलाने पर, संस्था के निदेशक साहब ने मुझे मिलने के लिए बुलाया। जुलाई के एक बेहद तेज़ बारिश भरे और ठन्डे दिन मैं वहां कांपते हुए पहुंचा। एक गर्म चाय के साथ एक छोटे से मगर साफ़ सुथरे कमरे में…
क्यों जरूरी हो गया है लिंक्ड इन प्रोफाइल बनाना!
यह अपनी—अपनी पसंद हो सकती है कि आप किस सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर उपस्थित हों, सक्रिय हों, अपनी जान-पहचान आगे बढ़ाएं। लेकिन इस बात पर जरा गौर कीजिए जो मैं अपने अनुभव से आपको बताने जा रहा हूं। दरअसल पिछले दिनों मैं कुछ नई पार्टनरशिप के लिए काम कर रहा था। इसके लिए सामान्य बातचीत और कुछ विषयों पर सहमति बनने के बाद दस्तावेजों तक बात गई तो मैं यह देखकर हैरान था कि संस्था के किसी भी तरह के दस्तावेज की जगह मुझे उसमें संस्था की लिंक्ड इन आईडी दर्ज करने को कहा था। बात यहीं तक खत्म नहीं…
खेल का नैरेटिव: क्या बिना पैसे, बड़े शहर और सुविधाओं के खिलाड़ी बनना संभव है?
भारतीय खेल जगत में लंबे समय से एक धारणा रही है कि बड़ा खिलाड़ी बनने के लिए बड़े शहर, महंगी अकादमियां, अत्याधुनिक सुविधाएं और आर्थिक रूप से मजबूत परिवार होना जरूरी है। यह नैरेटिव इतना मजबूत रहा है कि कई प्रतिभाशाली बच्चे मैदान तक पहुंचने से पहले ही अपने सपनों को छोड़ देते हैं। लेकिन भारत के अनेक खिलाड़ियों की कहानियां इस सोच को गलत साबित करती हैं।
सामाजिक नागरिक संस्थाएं जन मुद्दों पर रचनात्मक आख्यान कैसे बना सकती हैं?
व्यापक अनुभवों के बाद अब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है। महात्मा गांधी ने एक बात कही थी। केवल साध्य (लक्ष्य) ही नहीं साधन भी महत्वपूर्ण है। वह लक्ष्य किस साधन (तरीके, संसाधनों और भाव) से प्राप्त किया जा रहा है, यह ध्यान रखना और समीक्षा करना जरूरी होता है। अगर हमारा लक्ष्य लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करना है तो यह लक्ष्य दबाव डाल, शोषण और झूठ कहकर हासिल नहीं किया जा सकता है।
सामाजिक संस्थाओं को आत्म विश्लेषण की जरूरत : भाग 1
यह माना जा सकता है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं की अवधारणा का उदय समाज की आकांक्षाओं, उसके आभासों, विरोधाभासों, संगति और विसंगतियों का एक साथ संज्ञान लेते हुए समतामूलक, न्यायपरक और मानवीय मूल्यों से संचालित होने वाला समाज बनाने के उद्देश्य से हुआ है। जब समान विचारों के कुछ लोग एक साथ मिलते हैं, संगठित होते हैं और साझा पहल करने का वायदा करते हैं, तब सामाजिक नागरिक संस्था का उदय होता है।
सामाजिक संस्थाओं को आत्म विश्लेषण की जरूरत : भाग 2
हमारा पहला अनुभव यह रहा है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं में अपने स्वयं के होने के कारण, अपनी भूमिका के बारे में सोचना बंद कर देते हैं। शायद यह भी कह सकता हूँ कि उसके बारे में सोचना शुरू ही नहीं करते हैं। जब मैं “भूमिका” शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ, तो इसका मतलब है सामाजिक नागरिक संस्थाएं अस्तित्व में क्यों आती हैं? जब राज्य है, जब बाजार है और जब समाज भी है, तब सामाजिक नागरिक संस्थाओं के होने का क्या मतलब है?
