सामाजिक नागरिक संस्थाएं जन मुद्दों पर रचनात्मक आख्यान कैसे बना सकती हैं?

सचिन कुमार जैन

व्यापक अनुभवों के बाद अब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है। महात्मा गांधी ने एक बात कही थी। केवल साध्य (लक्ष्य) ही नहीं साधन भी महत्वपूर्ण है। वह लक्ष्य किस साधन (तरीके, संसाधनों और भाव) से प्राप्त किया जा रहा है, यह ध्यान रखना और समीक्षा करना जरूरी होता है। अगर हमारा लक्ष्य लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करना है तो यह लक्ष्य दबाव डाल, शोषण और झूठ कहकर हासिल नहीं किया जा सकता है। ऐसा नहीं हो सकता है कि एक नजरिया, विचार और विकल्प बना कर लोगों पर थोप दिया जाए। लोकतंत्र में विश्वास जबरिया पैदा नहीं किया जा सकता है। अगर लक्ष्य यह है कि देश-समाज लोकतंत्र में विश्वास करे, लोकतांत्रिक व्यवस्था में सहभागिता करे, तो इसके लिए लोगों के बीच मंथन और आत्ममंथन की प्रक्रिया को आकार देना होगा। ये स्वयं विश्लेषण करें कि लोकतंत्र एक अच्छा विकल्प क्यों है? सबसे महत्वपूर्ण होता है लोगों का विचार और विश्लेषण की प्रक्रिया का स्वयं के द्वारा अपनाया जाना।

क्या हिंसा के तरीके अपनाकर देश-दुनिया-समाज में अमन-चैन स्थापित किया जा सकता है? क्या भ्रष्टाचार और असमानता वाले तरीकों से देश में समानता लाई जा सकती है? क्या ऐसी न्याय व्यवस्था से न्याय-परक समाज स्थापित किया जा सकता है, जिसमें जाति, लिंग, धार्मिक पहचान पर आधारित भेदभाव को मिटाने की प्रतिबद्धता न हो, जिसमें केवल एक ही जाति या लिंग के व्यक्ति निर्णायक भूमिका में हों?

इस पृष्ठभूमि में सामाजिक नागरिक संस्थाओं के तौर-तरीके क्या होने चाहिए? अब तक के अनुभवों से यह पता चल रहा है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं अपने ज्ञान, अनुभवों और निष्कर्षों को लेकर समाज के बीच जाती हैं और समाज से अपेक्षा करती हैं कि वह इस ज्ञान, अनुभव और निष्कर्षों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर ले। इनके अनुरूप अपने परिवार, समाज की व्यवस्था और निजी व्यवहार में बदलाव ले आये। लेकिन वास्तव में ऐसा कभी हो नहीं सकता है क्योंकि समाज और लोगों के व्यवहार बनने की एक गहरी प्रक्रिया होती है। समाज और लोगों की सोच और व्यवहार धार्मिक आख्यानों, संस्कृतियों, परम्पराओं, पर्यावरण और पारिस्थितिकी, सामाजिक कहानियों से बनते हैं। यही कारण है कि समाज की व्यवस्था या लोगों के व्यवहार सामाजिक नागरिक संस्थाओं के ज्ञान प्रवचनों से नहीं बदल सकते हैं। सामाजिक नागरिक संस्थाओं की सबसे पहली जरूरत होती है कि वे सबसे पहले यह समझ बनायें कि वास्तव में सामाजिक व्यवस्था और व्यवहार कैसे बने हैं? कौन से तत्व हैं, जिनके कारण समाज और लोग उस व्यवस्था और व्यवहार में गहरा विश्वास या अंध-विश्वास रखते हैं। समस्या के कारणों को जानकर ही समाधान खोजा जा सकता है। और इन कारणों और उनके प्रभावों से समाज और व्यक्तियों का वाकिफ होना, उन्हें समझना सबसे बुनियादी जरूरत होती है। इसीलिए केवल ज्ञान और सूचनाएं बहाने से बदलाव का लक्ष्य हासिल नहीं होता, सामाजिक नागरिक संस्थाओं को ‘तकनीकों, पृवत्ति, कौशल और कलाओं’ पर न केवल अपनी क्षमताएं विकसित करने की जरूरत है, बल्कि समुदायों के साथ काम करते हुए उनके प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित करने की भी जरूरत है। ये तकनीकें, पृवत्तियां, कौशल और कलाएं हैं – संवाद की तकनीक, सुनना का कौशल और क्षमताएं, वैज्ञानिक सोच और तथ्य आधारित परीक्षण की पृवत्ति, पूर्वाग्रह से मुक्ति आदि।

सामाजिक नागरिक संस्थाओं के सपनों का जुड़ाव समाज और व्यक्तियों की आँखों से गहरा रिश्ता होना चाहिए। लोगों ने अपना आजीवन जिया है। वह जीवन चुनौतियों और परीक्षणों से आकार लेता है। उनमें तत्काल बदलाव आसानी से संभव नहीं होता है। इसके लिए पहले सामाजिक नागरिक संस्थाओं को कौशल और तरीकों को समझने की पहल करना होती है।

सामाजिक मुद्दों पर प्रभावी आख्यान (नैरेटिव) बनाने का अर्थ है कि लोग गरीबी, असमानता, शोषण, बीमारियों, बेरोज़गारी, जलवायु परिवर्तन, घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया देने तक सीमित न रहें, बल्कि इन मुद्दों पर बदलाव के लिए आवश्यक सामाजिक-राजनीतिक भूमिका को परिभाषित करें, अपनी भूमिका को पहचानें और उसे निभाने का ‘मानस’ बनायें और सामाजिक-राज्य की नीतियों को रचनात्मक तरीके से प्रभावित करें।

संवाद का कौशल और क्षमता

कुपोषण, लैंगिक भेदभाव, जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित व्यवहार, प्राकृतिक खेती, बच्चों की शिक्षा और माहवारी स्वास्थ्य के मुद्दे पर इस अपेक्षा से ज्ञान नहीं दिया जाना कि इन संदेशों को ज्यों का त्यों अपना लिया जाएगा। लोगों के साथ संवाद की प्रक्रिया में जाना चाहिए, जहाँ सामाजिक कार्यकर्ता ‘जिज्ञासा’ के साथ लोगों की बात समझने और महसूस की तैयारी में रहते हैं। संवाद की प्रक्रिया में किसी व्यवहार या परंपरा को खारिज करने की पृवत्ति से ज्यादा जरूरी होता है कि असहमति होने के बावजूद संवाद की संभावना को बनाए रखना, क्योंकि समाज में बदलाव संस्थाओं की परियोजनाओं की अवधि से तय नहीं होता है।

भागीदारी और निर्णय लेने की प्रक्रिया

संवाद के साथ ही एक दूसरा जरूरी महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू जुड़ा हुआ है, और वह है निर्णय लिए जाने की प्रक्रिया। क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया में लोगों की, महिलाओं की, युवाओं की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित की गई है? इस भागीदारी का मतलब यह है कि लोगों ने अपनी बात कही, उनकी बात को सुना गया, लोगों को यह महसूस हुआ कि उनकी बात को सुना गया और उन्हें यह दिखाई दिया कि उनकी बात को निर्णय में स्थान मिला है। सामाजिक नागरिक संस्थाओं के लिए सूचक यह है कि मुद्दे, लक्ष्य और योजना के बारे में समुदाय के लोग आत्मविश्वास के साथ खुद अपनी व्याख्या कर सकें।

सुनने का कौशल और क्षमता

सुनना एक कौशल भी है और मानसिक क्षमता भी। सुनना इसलिए नहीं चाहिए क्योंकि किसी बात का जवाब देना है या प्रतिक्रिया देना है। समाज या लोगों को उनके व्यवहार या स्थिति के लिए ‘आरोपी’ साबित करने के नज़रिए उनकी बात नहीं सुनना चाहिए। जो बात, जिस रूप में, जिस भाव से कही जा रही है, उसी रूप में उसे सुनना आवश्यक होगा। अकसर हम दूसरों की बात को पूरा सुने बिना, अपनी बात कहना या दूसरों की बात का उत्तर देना चाहते हैं। सामाजिक नागरिक संस्थाओं के कार्यकर्ताओं और नेताओं को सुनने की आदत विकसित करना जरूरी है। हमेशा जवाब देना, समाधान सुझाना, दूसरों को सुधारना जरूरी नहीं होता है।

वैज्ञानिक सोच की पृवत्ति

जिन समूहों या समुदायों के साथ पहल की जा रही है, उन्हें प्रश्नों के उत्तर देने की पृवत्ति से बचना होगा। सबसे बेहतर विकल्प यह होता है कि समुदायों को प्रश्नों का उत्तर खोजने और परीक्षण करने के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने में मदद दी जाए। अगर लोगों को बने-बनाये उत्तर दिए जाते हैं, तो यह जोखिम हमेशा बना रहेगा कि फिर अन्य समूह या विचार ज्यादा प्रभावी तरीके से कोई नया उत्तर देगा तो लोग-समुदाय उस उत्तर में विश्वास करने लगेंगे। सामाजिक नागरिक संस्थाओं की भूमिका उत्तर देने की नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक सोच और परीक्षण की पृवत्ति विकसित करने की होती है।

लोक भाषा का प्रयोग

जिन मुद्दों पर सामाजिक नागरिक संस्थाएं काम कर रहीं हैं, क्या उसके स्थानीय भाषा में विवरण और व्याख्या की गई है? क्या जलवायु परिवर्तन, असमानता, अन्याय, कुपोषण, समावेशी विकास, एक हज़ार दिनों का जीवन नज़रिया आदि समाज की शब्दावली के शब्द हैं? हो सकता है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं की पहल से कुपोषण या जलवायु परिवर्तन पर दिल्ली, न्यूयार्क, भोपाल के दफ्तरों में बात शुरू हो जाए, लेकिन अगर सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने मुद्दों और विषयों को समाज की अपनी भाषा में परिभाषित नहीं किया तो वह समाज का मुद्दा बन नहीं पायेगा और यह जोखिम हमेशा बना रहेगा कि जब अन्य समूह या सरकारें अपने स्वार्थों के चलते उस मुद्दे को छोड़ देंगे तो उस पर पहल और चर्चा बंद हो जायेगी। जब लोग अपनी भाषा में सामाजिक मुद्दों की व्याख्या करने लगते हैं तब उनका जुड़ाव राजनीतिक प्रक्रियाओं से होना सुनिश्चित होता है।

व्यापक आयामों और जुड़ावों को जाना

संबंधित विषय कितना फैला हुआ है? समाज या लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाला कोई भी मुद्दा या विषय या समस्या कई आयामों से जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए कुपोषण का लैंगिक असमानता के साथ क्या संबंध है, इसका जलवायु परिवर्तन के साथ कितना गहरा सम्बन्ध है? कृषि के संकट के साथ क्या जुडाव है? क्या सांप्रदायिकता या अंध-विश्वास भी कुपोषण में क्या भूमिका निभाते हैं? सामाजिक नागरिक संस्थाओं के कार्यकर्ताओं की यह मूलभूत जिम्मेदारी है कि वे अपने विषय को गहराई से जानें-समझने-विश्लेषण करें-संवाद करें।

पूर्वाग्रहों से मुक्ति और तथ्यों पर निर्भरता

पूर्वाग्रहों से मुक्त हुए बिना समाज और समाज के मुद्दों से जुडाव बनना संभव नहीं होगा। अगर पूर्वाग्रह हैं तो सामाजिक नागरिक संस्थाएं एक ध्रुव पर होंगे और समुदाय/लोग दूसरे ध्रुव पर होंगे। सामजिक संरचना क्या है? उनका परिचय, लोक संस्कृति, आर्थिकी, और पहचान क्या है? समस्या के वास्तविक कारण क्या हैं? कौन सबसे ज्यादा प्रभावित हैं? इसके साथ ही वे कौन से सूचक हैं, जिनमें हम बदलाव लाना चाहते हैं? उन सूचकों की स्थिति क्या है? सामाजिक नागरिक संस्थाएं इन आयामों पर तथ्यों के साथ विश्लेषण करेंगे तो उनकी पहल वास्तविक और परिणाममूलक हो सकेगी।

परिणाम से ज्यादा मूल्य आधारित प्रक्रिया में निवेश

सामाजिक नागरिक संस्थाओं के सामने आज के दौर में दुविधापूर्ण स्थिति खड़ी हुई है। उन पर दबाव है कि वे हर सप्ताह, हर तिमाही, हर हाल के आखिर में साबित करें कि उनकी परियोजना से समाज में बदलाव का परिणाम आया है। यह दिखाना जरूरी है कि कितने लोगों के राशन कार्ड बने या कितने हेक्टेयर खेती में सिंचाई की सुविधा विकसित हो गई है या कितने बच्चों के नाम स्कूल में दर्ज हो गए हैं? इस बात को ध्यान में नहीं रखा जाना है कि क्या सामाजिक नागरिक संस्थाएं वास्तव में ‘समुदाय/लोगों के नेतृत्व’ के अपने काम को आगे बढ़ा रहीं हैं? क्या खाद्य सुरक्षा, रोज़गार या शिक्षा का मुद्दा अधिकार के नज़रिए से स्थापित हो रहा है? क्या सामाजिक नागरिक संस्थाएं न्याय, समता, बराबरी, शोषण से मुक्ति, गरिमा के मूल्यों के विचार को स्थापित करने के उद्देश्य से काम कर पा रहीं हैं? अगर वास्तव में सामाजिक-आर्थिक बदलाव की प्रक्रिया को स्थाई बनाना है, तो इसे लोक-केंद्रित बनाना होगा। जनता के मुद्दों पर तब तक आख्यान नहीं बन सकता है, जब तक संस्थाएं मूल्य आधारित नज़रिए को नहीं अपनाएंगी।

— लेखक विकास संवाद के निदेशक हैं

Scroll to Top