अप्रैल 2026

आदिवासियों ने अपने खेतों के लिए मेहनत कर रास्ता बनाया

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में पोहरी से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव बसा है अहेरा मङखेड़ा। इस गांव में मुख्य रूप से आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं, जिनका जीवन खेती-किसानी और कड़ी मेहनत पर टिका है। लेकिन उनके सामने एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी थी। उनके खेतों तक पहुंचने का रास्ता।

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बकरी चराने से बीएससी तक निशा की कहानी

कोटड़ी अजमेर नागौर और जयपुर की सीमा पर बसा एक गांव है। रुपनगढ़ से 19 किलोमीटर दूर बसे इस गांव का पानी खारा है, जिससे यहां पर खरीफ सीजन की केवल एक ही फसल वर्षा के पानी से हो पाती है। ज्यादातर लोग खारे पानी की सांभर झील पर मजदूरी करने जाते हैं। वहां नमक बनाने का काम किया जाता है।

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प्राकृतिक खेती जुड़ी है मानवीय मूल्यों से

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया में कृषि का स्वरूप तेजी से बदला। रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और संकर बीज आधुनिक कृषि के आधार बन गए। खेती धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होती चली गई और उद्योगों पर निर्भर हो गई।

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