जुलाई 2026

प्यार का बंधन

सामाजिक क्षेत्र को लेकर शुरुआती संकोच अब पीछे छूट चुका है। आंचल गर्डिया अब पूरे आत्मविश्वास के साथ काम कर रही हैं। उन्हें अपने कार्यक्षेत्र की ग्रामीण महिलाओं का मजबूत साथ मिला है। इसी सहारे उन्होंने अपनी मां की आर्थिक संकट से जूझ रही संस्था को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी उठाई है।

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प्यार और समर्पण की कहानी

पिछले 20 सालों में चंद्रकांत ने छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले की बैगा जनजाति के साथ ऐसा गहरा रिश्ता बना लिया है, जो सिर्फ काम तक सीमित नहीं है। यह रिश्ता भावनाओं और भरोसे पर टिका है। वह अपनी निजी सुविधाओं की परवाह किए बिना इस समुदाय के लिए काम करना चाहते हैं। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर वह दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक अहम सलाह भी देते हैं—समाज के लिए काम करते हुए अपने परिवार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

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विरासत को आगे बढ़ाने की कहानी

न तो उनके सामाजिक कार्यकर्ता पिता चाहते थे कि दिनेश पुरी इस क्षेत्र में आएं, और न ही खुद दिनेश की इसमें कोई खास रुचि थी। लेकिन परिस्थितियों और अंदरूनी खिंचाव ने उन्हें उसी राह पर ला खड़ा किया। आज दिनेश अपने दिवंगत पिता की जगह संभाल रहे हैं। वह सबसे वंचित विमुक्त (डीनोटिफाइड) जनजातियों के लिए काम कर रहे हैं। उनका फोकस शिक्षा, पोषण, ऑर्गेनिक खेती और सामाजिक समावेशन पर है। उन्होंने न सिर्फ अपने पिता की तीन दशक पुरानी संस्था को संभाला है, बल्कि उसके काम को आगे बढ़ाने की भी तैयारी कर रहे हैं।

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ठुकराई गई, लेकिन हारी नहीं

बचपन में ही अपने पिता द्वारा ठुकरा दी गई एक लड़की। हालात ऐसे थे कि कोई भी टूट सकता था। लेकिन ईशा टंडन ने हार नहीं मानी। उन्होंने न सिर्फ खुद को खड़ा किया, बल्कि सैकड़ों लोगों के लिए सहारा बन गईं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के एक छोटे कस्बे में NGO शुरू किया। यह संस्था महिलाओं के सशक्तिकरण, कौशल विकास, शिक्षा और कई सामाजिक मुद्दों पर काम करती है।

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समुदाय के लिए समर्पण

उन्होंने एक आरामदायक और सफल करियर छोड़ दिया। मुंबई जैसी जगह की नौकरी को अलविदा कहा। वजह सिर्फ एक थी—अपने गांव और वहां के लोगों के लिए काम करना। जगवीर सिंह आज जयपुर और टोंक जिले के भूमिहीन और छोटे किसानों के लिए काम कर रहे हैं। उनकी संस्था सामुदायिक जमीन के अधिकार, जल संरक्षण, पलायन रोकने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर काम करती है।

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‘सक्षम’ होकर बने दूसरों का सहारा

खेमचंद के भीतर दूसरों की मदद करने का जुनून साफ दिखाई देता है। वह चाहते तो कोई और काम करके ज्यादा पैसे कमा सकते थे। एक आसान जिंदगी चुन सकते थे। लेकिन उन्होंने अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपना जीवन सामाजिक क्षेत्र को समर्पित कर दिया। बचपन में पोलियो की वजह से उनके दोनों पैर प्रभावित हो गए थे। निचला हिस्सा स्थायी रूप से कमजोर हो गया। लेकिन इससे उनके हौसले पर कोई असर नहीं पड़ा।

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माया का जीवन संघर्ष: एक संदेश

संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, सही सहयोग, अवसर और आत्मविश्वास से जीवन की दिशा बदली जा सकती है। परिवार की आर्थिक तंगी, बाल विवाह और फिर घरेलू हिंसा का सामना करने वाली माया के जीवन में कुछ ऐसा हुआ जिसने उसकी दिशा और दशा बदल दी। माया की कहानी कठिन परिस्थितियों में रह रही महिलाओं के लिए एक सकारात्मक संदेश है।

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विस्थापित बैगाओं को मिला मछली पालन का सहारा

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के दलदली बोदई गांव में पुस्तैनी रूप से रह रहे बैगा जनजातीय परिवारों को 26 साल पहले बालको-वेदांता कंपनी की बॉक्साइट खनन परियोजना के कारण विस्थापित होना पड़ा। तब गांव के 16 परिवारों ने विस्थापन का दर्द झेलते हुए इन्द्रीपानी नाम से न सिर्फ अपना नया गाँव बसाया बल्कि मछ्ली पालन को अपनाते हुए अपनी आजीविका का प्रबंधन भी किया। इस सामुदायिक पहल में ग्रामोदय ग्राम विकास समिति, कवर्धा की अहम भूमिका रही है।

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