समुदाय के लिए समर्पण

जगवीर सिंह
सचिव सामाजिक प्रेरणा एवं ग्रामीण विकास संस्थान (SPGVS), लापोरिया, राजस्थान

उन्होंने एक आरामदायक और सफल करियर छोड़ दिया। मुंबई जैसी जगह की नौकरी को अलविदा कहा। वजह सिर्फ एक थी—अपने गांव और वहां के लोगों के लिए काम करना। जगवीर सिंह आज जयपुर और टोंक जिले के भूमिहीन और छोटे किसानों के लिए काम कर रहे हैं। उनकी संस्था सामुदायिक जमीन के अधिकार, जल संरक्षण, पलायन रोकने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर काम करती है।
मास्टर्स इन सोशियोलॉजी और MBA करने के बाद 1996 में उन्हें मुंबई में नौकरी मिली। यह नौकरी अमेरिकी संस्था कैथोलिक रिलीफ सर्विसेज (CRS) में डेवलपमेंट ऑफिसर की थी। उन्हें हर महीने 12 हजार रुपए वेतन मिलता था। कई सुविधाएं भी थीं। काम भी अपेक्षाकृत आसान था। उन्हें गुजरात और छत्तीसगढ़ (तब मध्य प्रदेश का हिस्सा) में फील्ड वर्क की मॉनिटरिंग करनी होती थी।
लेकिन भीतर से वह खुश नहीं थे। उन्हें अपना गांव लापोरिया याद आता था। वहां के लोग और उनका जीवन उन्हें खींचता था। जगवीर एक संपन्न किसान परिवार में पैदा हुए थे। उन्होंने बचपन से अपने भाई लक्ष्मण सिंह का काम देखा था। लक्ष्मण सिंह को पद्मश्री सम्मान भी मिल चुका है। लक्ष्मण सिंह ने 1980 के दशक में ग्रामीण विकास नवयुवक मंडल लापोरिया (GVNML) की स्थापना की थी। यह संस्था स्थानीय युवाओं के साथ मिलकर काम करती थी।
उस समय गांवों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। इस संस्था ने चरागाहों के पुनर्जीवन और पीने के पानी की व्यवस्था पर काम शुरू किया। जगवीर पढ़ाई के बाद इस संस्था के साथ स्वेच्छा से जुड़कर काम करते थे। वह लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याएं समझते थे और समाधान खोजने की कोशिश करते थे।
जगवीर कहते हैं, “CRS की नौकरी का काम बहुत औपचारिक था। इसमें जमीन से जुड़ाव नहीं था। इससे मैं संतुष्ट नहीं था। इसलिए डेढ़ साल बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और वापस गांव आ गया।” इसके बाद उन्होंने GVNML में 4000 रुपए महीने की नौकरी शुरू की। वह फिर से गांवों में काम करने लगे। वह मोटरसाइकिल और बस से दूर-दराज के इलाकों में जाते थे। जगवीर कहते हैं, “CRS में मुझे हवाई यात्रा जैसी सुविधाएं मिलती थीं। वेतन भी अच्छा था। लेकिन जो संतोष मुझे गांव के लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखकर मिलता था, वह वहां नहीं था।”
अपने समर्पण और काम के प्रति रुचि के कारण, पांच साल में ही वह संस्था के CEO बन गए। उन्होंने इस पद पर 20 साल तक काम किया। इस दौरान उन्होंने सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन पर काम किया। जल संरक्षण के कई मॉडल विकसित किए। लोगों की आजीविका मजबूत करने के लिए समुदाय को सशक्त किया।
GVNML ‘चौका’ मॉडल के लिए जाना जाता है। यह तीन तरफ से बनी मिट्टी की मेड़ होती है। इसे चरागाहों में बनाया जाता है। इससे बारिश का पानी रुकता है। जमीन में पानी का स्तर बढ़ता है। बंजर जमीन पर हरियाली लौटती है। लोगों और पशुओं के लिए पानी उपलब्ध होता है।
इसी दौरान, 1993 में जगवीर और उनके साथियों ने एक और संस्था बनाई—सामाजिक प्रेरणा एवं ग्रामीण विकास संस्थान (SPGVS)। यह संस्था भी समान काम करती थी। लेकिन इसका मॉडल अलग था। यह पूरी तरह समुदाय के योगदान और स्वैच्छिक सहयोग पर आधारित है। यह संस्था तभी फंड लेती है, जब प्रोजेक्ट उसके विजन और मिशन के अनुरूप हो।
2023 में जगवीर ने GVNML के CEO पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने SPGVS की पूरी जिम्मेदारी संभाली। कम संसाधनों और मजबूत सामुदायिक सहयोग के साथ उन्होंने काम को नई ऊर्जा के साथ शुरू किया। जगवीर बताते हैं, “हम ‘सशक्त समितियों’ का गठन करते हैं। ये स्थानीय लोगों की समितियां होती हैं। ये समितियां सामुदायिक जमीन, चरागाह और जल स्रोतों को अतिक्रमण से मुक्त कराती हैं। अक्सर जमीन माफिया इन पर कब्जा कर लेते हैं।”
“80 से 90 प्रतिशत लोगों की आजीविका इन्हीं संसाधनों पर निर्भर है। जब ये संसाधन वापस मिलते हैं, तो लोगों की जिंदगी बेहतर होती है। पलायन कम होता है। शिक्षा और स्वास्थ्य में भी सुधार आता है।” संस्था इन समितियों को आगे रखती है। खुद सिर्फ सहयोग करती है। हर महीने बैठकों का आयोजन होता है। जगवीर कहते हैं, “हम चाहते हैं कि यह काम स्थायी बने। अगर हम किसी गांव से हट भी जाएं, तो वहां की व्यवस्था चलती रहे।”
SPGVS ने जयपुर और टोंक के 58 गांवों में 5800 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया है। यह काम आसान नहीं था। इसमें कई बार जमीन माफिया और राजनीतिक ताकतों से टकराव हुआ। जगवीर पर पिछले कुछ सालों में कम से कम पांच कानूनी मामले दर्ज हुए। उनकी टीम को भी धमकियों का सामना करना पड़ा। लेकिन समुदाय उनके साथ खड़ा रहा।
जगवीर कहते हैं, “लोगों का साथ हमें हर मुश्किल से निकाल देता है।” उनकी संस्था प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा देती है। इसके लिए लोगों को प्रशिक्षण दिया जाता है। भूमिहीन और पलायन करने वाले समुदायों को आजीविका के अन्य विकल्प भी दिए जाते हैं। जैसे बकरी पालन। आने वाले पांच सालों में जगवीर अपनी पहुंच बढ़ाना चाहते हैं। वह राजस्थान के अन्य जिलों में भी काम फैलाना चाहते हैं।
इसके लिए वह राजस्थान कोएलिशन फॉर नेचुरल फार्मिंग जैसी संस्थाओं के साथ नेटवर्क बना रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा हो। प्राकृतिक खेती बढ़े। छोटे किसान और भूमिहीन लोग आत्मनिर्भर बनें।
सबसे अहम, वह चाहते हैं कि गरीब लोगों का पलायन रुके। इन सब चुनौतियों के बीच उन्हें अपने परिवार का पूरा साथ मिला। अब उनका बेटा भी बड़ा हो चुका है। वह प्राकृतिक खेती का विशेषज्ञ है। वह संस्था के काम में मदद करता है। साथ ही अन्य जगहों पर सलाह भी देता है।
जगवीर कहते हैं, “मेरा जीवन का लक्ष्य है कि स्थानीय समुदाय खुशहाल बने। इसके लिए मैं जो भी जरूरी होगा, वह करूंगा।”
