प्यार और समर्पण की कहानी

चंद्रकांत यादव
एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, ग्रामोदय ग्राम विकास समिति, कबीरधाम, छत्तीसगढ़

पिछले 20 सालों में चंद्रकांत ने छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले की बैगा जनजाति के साथ ऐसा गहरा रिश्ता बना लिया है, जो सिर्फ काम तक सीमित नहीं है। यह रिश्ता भावनाओं और भरोसे पर टिका है। वह अपनी निजी सुविधाओं की परवाह किए बिना इस समुदाय के लिए काम करना चाहते हैं। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर वह दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक अहम सलाह भी देते हैं—समाज के लिए काम करते हुए अपने परिवार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

दिलचस्प बात यह है कि अपने घर से महज 60 किलोमीटर दूर रहने के बावजूद चंद्रकांत ने अपने जीवन के पहले 21 सालों में बैगा समुदाय को कभी देखा तक नहीं था। लेकिन 2008 के आसपास, जब वह एक NGO कार्यकर्ता के रूप में उनसे मिले, तो सब कुछ बदल गया। उनके बीच एक गहरा और आत्मीय रिश्ता बन गया। यह रिश्ता समय के साथ और मजबूत होता गया।

इस जुड़ाव का असर इतना गहरा था कि 2022 में उन्होंने अपनी पुरानी संस्था आस्था समिति की नौकरी छोड़ दी। नई जिम्मेदारियों के कारण वह बैगा समुदाय से दूर हो रहे थे। यह उन्हें मंजूर नहीं था। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी संस्था को नए रूप में खड़ा किया। अब वह उसी के जरिए बैगा समुदाय के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए काम कर रहे हैं। साथ ही उनकी कला, संस्कृति और जीवनशैली को बचाने की कोशिश भी कर रहे हैं।

39 साल के चंद्रकांत तीन बच्चों के पिता हैं। उनकी दो बेटियां जुड़वां हैं। उनके इस अलग तरह की जिंदगी जीने के फैसले को लेकर उनके माता-पिता आज भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। चंद्रकांत खुद मानते हैं कि शादी के शुरुआती वर्षों में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ न्याय नहीं किया। इसकी वजह उनका सामाजिक काम में पूरी तरह डूब जाना था।

अब उन्होंने यह तय किया है कि वह अपने परिवार को भी पूरा समय देंगे। अपने वैवाहिक जीवन को संतुलित रखने की कोशिश करेंगे। लेकिन इसके साथ ही वह बैगा समुदाय के लिए अपने काम का दायरा भी बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए वह उन संस्थाओं से बात कर रहे हैं, जो बैगा समुदाय के साथ काम करती हैं। यह काम छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के मैकल पर्वत क्षेत्र में फैले बैगा बस्तियों तक फैला है।

चंद्रकांत कहते हैं, “हमारा लक्ष्य है कि इस इलाके के कृषि-पर्यावरण को फिर से मजबूत किया जाए। साथ ही बैगा समुदाय की कला, संस्कृति और जीवनशैली को बचाया जाए। हम चाहते हैं कि यह काम सामूहिक तरीके से हो, ताकि लोगों की आजीविका स्थायी बन सके। और वे बाहरी दबावों का सामना कर सकें।”

बैगा समुदाय के साथ चंद्रकांत का यह सफर काफी दिलचस्प है। उनका जन्म कबीरधाम जिले के पंडरिया ब्लॉक के अतरिया गांव में हुआ। यह एक दूर-दराज का इलाका है। यहां से पक्की सड़क करीब 10 किलोमीटर दूर थी। 2006 में, हायर सेकेंडरी पास करने के बाद, उनका पहला संपर्क सामाजिक क्षेत्र से हुआ। उस समय नेशनल लिटरेसी मिशन की एक टीम उनके गांव में आई थी। वहां एक PRA (Participatory Rural Appraisal) कैंप लगाया गया था। चंद्रकांत ने इस टीम की मदद करने का फैसला किया।

वह बताते हैं, “टीम ने कहा था कि जो स्थानीय युवा मदद करेंगे, उन्हें मोबिलाइजर की नौकरी का मौका मिलेगा। मैंने मदद की और चयन प्रक्रिया के बाद मुझे यह काम मिल गया। ट्रेनिंग के तहत मुझे पांच दिन के लिए एक गांव भेजा गया। क्लासरूम ट्रेनिंग में मैं झिझकता था। लेकिन फील्ड में, लोगों के बीच, मैं खुद को बहुत सहज महसूस करता था।” यहीं से उन्हें सामाजिक काम की ओर अपना झुकाव समझ में आया।

इसी ट्रेनिंग के दौरान उनकी मुलाकात आस्था समिति के प्रमुख से हुई। वही उनके ट्रेनर थे। दोनों के बीच संपर्क बना रहा। चंद्रकांत के काम से प्रभावित होकर उन्हें संस्था में नौकरी का प्रस्ताव मिला। 2008 में उन्होंने इस संस्था को जॉइन किया। उन्हें पंडरिया ब्लॉक के ही कुकदूर गांव में बैगा समुदाय के साथ काम करने के लिए भेजा गया। यह उनके गांव से करीब 60 किलोमीटर दूर था।

वह कहते हैं, “यही पहली बार था जब मैंने बैगा समुदाय को जाना। जबकि वे उसी ब्लॉक में रहते थे। लेकिन बहुत कम समय में ही मैं उनकी सादगी, अपनापन और भरोसे से जुड़ गया। वे मेरे लिए परिवार से भी बढ़कर बन गए।” चंद्रकांत ने वहां टिकाऊ आजीविका से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम किया। समय के साथ उनका जुड़ाव और गहरा होता गया।

वह याद करते हैं,  “जब मैं उनके बीच रहता था, तो मैंने कभी खुद खाना नहीं बनाया। वे ही मेरी देखभाल करते थे। जब मैं बीमार पड़ता था, तो वे मुझे अस्पताल तक लेकर जाते थे।” यह रिश्ता इतना मजबूत हो गया कि जब उन्हें चाइल्डलाइन प्रोजेक्ट में जिला समन्वयक बनाया गया, तो उनकी बैगा समुदाय से दूरी बढ़ने लगी। इससे वह बेचैन रहने लगे।

इसी दौरान 2022 में उनके एक और मेंटर काशीराम वर्मा ने उन्हें काम का प्रस्ताव दिया। काशीराम वर्मा ग्रामोदय केंद्र से जुड़े थे और पहले भी उन्हें ट्रेनिंग दे चुके थे। यह प्रोजेक्ट स्विस एड के सहयोग से चल रहा था और बैगा समुदाय पर केंद्रित था। चंद्रकांत बताते हैं,  “यह प्रोजेक्ट अपने अंतिम साल में था। काशीराम जी की उम्र भी 80 साल हो चुकी थी। उन्होंने मुझसे और मेरे साथियों से कहा कि हम संस्था का काम संभाल लें।” “चूंकि संस्था पहले मध्य प्रदेश में रजिस्टर्ड थी, हमने 2024 में इसे नए नाम से पंजीकृत किया—ग्रामोदय ग्राम विकास समिति।”

आज यह संस्था कबीरधाम के बोड़ला ब्लॉक में काम कर रही है। इसके काम के क्षेत्र में कृषि-पर्यावरण, पोषण, स्वास्थ्य और कला-संस्कृति का संरक्षण शामिल है। इसके साथ आजीविका से जुड़े काम भी किए जाते हैं। संस्था एक बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BIRC) भी चलाती है। यहां गोबर और गोमूत्र जैसे जैविक पदार्थों से खाद, कीटनाशक और प्राकृतिक खेती के लिए जरूरी सामग्री बनाई जाती है।

संस्था ने एक खास मॉडल अपनाया है। इसमें पूरी तरह महिलाओं का बोर्ड बनाया गया है। इसमें बैगा, दलित और ओबीसी समुदाय की महिलाएं शामिल हैं। चंद्रकांत कहते हैं, “हमने खुद को सिर्फ कार्यकारी भूमिका तक सीमित रखा है। हम चाहते हैं कि समुदाय, खासकर महिलाएं, नेतृत्व संभालें और मालिकाना जिम्मेदारी लें।”

संस्था एक योगदान आधारित फंडिंग मॉडल पर काम करती है। इसमें समुदाय और सहयोगी, दोनों आर्थिक योगदान देते हैं। हाल ही में संस्था को छत्तीसगढ़ सरकार से BIRC चलाने के लिए 1 लाख रुपए की सहायता भी मिली है। समुदाय के लिए पूरी तरह समर्पित होने के बावजूद, चंद्रकांत एक जरूरी चेतावनी भी देते हैं।

उनके माता-पिता किसान हैं। वे आज भी उनके इस “अस्थिर” जीवन को लेकर पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि चंद्रकांत ने अपनी पढ़ाई खुद पूरी की और अपने भाई-बहनों की पढ़ाई में भी मदद की। चंद्रकांत कहते हैं, “मुझे हमेशा लगता है कि मैंने परिवार की अपेक्षाओं को नजरअंदाज किया। खासकर शादी के बाद के शुरुआती वर्षों में मैंने अपनी पत्नी के साथ न्याय नहीं किया। लेकिन उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया। अब मैं तय कर चुका हूं कि परिवार के साथ भी पूरा न्याय करूंगा।”

वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, “लेकिन समुदाय के लिए मेरा मिशन जारी रहेगा। इसमें कोई समझौता नहीं होगा।”

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