विरासत को आगे बढ़ाने की कहानी

दिनेश पुरी
संस्थापक और डायरेक्टर – आसरा फाउंडेशन, महासमुंद, सिरपुर, छतीसगढ़

न तो उनके सामाजिक कार्यकर्ता पिता चाहते थे कि दिनेश पुरी इस क्षेत्र में आएं, और न ही खुद दिनेश की इसमें कोई खास रुचि थी। लेकिन परिस्थितियों और अंदरूनी खिंचाव ने उन्हें उसी राह पर ला खड़ा किया। आज दिनेश अपने दिवंगत पिता की जगह संभाल रहे हैं। वह सबसे वंचित विमुक्त (डीनोटिफाइड) जनजातियों के लिए काम कर रहे हैं। उनका फोकस शिक्षा, पोषण, ऑर्गेनिक खेती और सामाजिक समावेशन पर है। उन्होंने न सिर्फ अपने पिता की तीन दशक पुरानी संस्था को संभाला है, बल्कि उसके काम को आगे बढ़ाने की भी तैयारी कर रहे हैं।

दिनेश के पिता, स्वर्गीय कन्हैया पुरी, एक समर्पित और सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता थे। वह टोंक जिले के मालपुरा तहसील के पचेवर में अपनी संस्था चलाते थे। उनका जीवन पूरी तरह समाज सेवा को समर्पित था। घर का माहौल भी सामाजिक काम से भरा हुआ था। कन्हैया पुरी ने कभी अपनी निजी सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया। वे शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और आजीविका के मुद्दों पर लगातार काम करते रहे। लेकिन इसके बावजूद, वह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे इस क्षेत्र में आएं। वह चाहते थे कि वे इस संघर्ष भरे रास्ते से दूर रहें।

दिनेश का स्वभाव भी बचपन में अलग था। वह एक बड़े बिजनेसमैन बनना चाहते थे। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही इस दिशा में कदम बढ़ा दिया। दसवीं पास करने के बाद उन्होंने एक दोस्त के साथ मोबाइल फोन का होलसेल कारोबार शुरू किया। उस समय वह कानूनी रूप से बालिग भी नहीं थे। वे दिल्ली से मोबाइल फोन खरीदते थे। फिर उन्हें अपने इलाके के रिटेलर्स को अच्छे मुनाफे पर बेचते थे। पढ़ाई के साथ-साथ उनका यह काम भी चलता रहा।

कुछ समय बाद दोस्त के साथ विवाद हो गया। इसके बाद दिनेश ने यह काम बंद कर दिया। उन्होंने मुख्य बाजार में एक अच्छी जगह पर अपनी मोबाइल शॉप खोल ली। दुकान का कारोबार अच्छा चल रहा था। तभी जनवरी 2016 में एक बड़ी आग लगी। इस आग में उनकी पूरी दुकान जलकर खाक हो गई। इससे दिनेश पूरी तरह टूट गए।

उन्होंने दूसरी जगह छोटे स्तर पर फिर से काम शुरू करने की कोशिश की। लेकिन कारोबार पहले जैसा नहीं चल पाया। उन्हें छोटे स्तर पर काम करना भी मुश्किल लग रहा था। दिनेश कहते हैं, “मैं अंदर से टूट गया था। एक दिन मैंने अपने पिता से बात की। मैंने कहा कि अब मैं बिजनेस नहीं करना चाहता। हमेशा की तरह उन्होंने मेरा साथ दिया। उन्होंने कहा कि जो मन करे, वही करो।”

दिनेश ने कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया था। उन्हें पढ़ाने में रुचि थी। इसलिए उन्होंने एक स्थानीय स्कूल में शिक्षक के रूप में काम शुरू किया। इसी दौरान तिलोनिया की एक संस्था ने उनसे संपर्क किया। उन्हें उनके तकनीकी ज्ञान के बारे में पता चला था। संस्था ने उनसे युवाओं को कंप्यूटर बेसिक्स और मोबाइल रिपेयरिंग की ट्रेनिंग देने को कहा। दिनेश ने युवाओं को ट्रेनिंग दी। उनके काम की काफी सराहना हुई। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में, उनके पिता के सामने ही, संस्था ने कहा कि अब उनकी “दूसरी पीढ़ी” तैयार हो रही है।

दिनेश बताते हैं,  “इस बात ने मुझे बहुत संतोष दिया। कुछ महीनों बाद, 2017 में, मैं जयपुर की विकासोन्मुख संस्था के राजेश मलाकर के साथ जुड़ा।” यहां उन्होंने स्कूल के छात्रों और उनकी माताओं को फाइनेंशियल लिटरेसी की ट्रेनिंग दी। यह काम दो साल तक चला। इस दौरान उन्होंने और उनकी टीम ने एक लाख से ज्यादा छात्रों को ट्रेनिंग दी। यह एक बड़ी उपलब्धि थी। 2018 के अंत तक दिनेश ने तय कर लिया कि वह आगे सामाजिक क्षेत्र में ही काम करेंगे। उन्होंने अपने पिता की संस्था GVSTK में फील्ड कोऑर्डिनेटर के रूप में काम शुरू किया।

उन्होंने महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इसी दौरान उन्होंने फील्ड वर्क की बारीकियां सीखीं। दिनेश एक घटना को याद करते हैं।  “फील्ड में एक दिन लाली नाम की एक युवती मेरे पास आई। वह कभी स्कूल नहीं गई थी। लेकिन पढ़ना-लिखना सीखना चाहती थी। हमारे पास इसके लिए कोई कार्यक्रम नहीं था। फिर भी मैंने व्यक्तिगत पहल की। मैंने गांव की पढ़ी-लिखी लड़कियों से कहा कि वे लाली को पढ़ाएं। मैंने वादा किया कि जो भी सामग्री चाहिए, मैं दूंगा।” कुछ महीनों में लाली ने पढ़ना-लिखना सीख लिया। वह रोमन (अंग्रेजी) में व्हाट्सऐप भी चलाने लगी।

दिनेश बताते हैं, “एक दिन उसने धन्यवाद देने के लिए मेरे पैर छूने की कोशिश की। वह मेरी ही उम्र की थी। मैंने उसे रोका, लेकिन उस भाव ने मुझे बहुत संतोष दिया।” “तभी मुझे एहसास हुआ कि पैसे से ऐसी खुशी नहीं खरीदी जा सकती। इसने मेरे फैसले को और मजबूत किया कि मुझे सामाजिक क्षेत्र में ही काम करना है।” कोविड-19 लॉकडाउन के;5 दौरान दिनेश ने एक और बड़ी समस्या देखी। उनके इलाके में बावली और बगरिया जैसी विमुक्त जनजातियों के बच्चे पर्याप्त भोजन भी नहीं पा रहे थे।

इस स्थिति को देखकर उन्होंने कदम उठाया। उन्होंने मालपुरा के बरोल और बाछेला गांवों में दो प्री-स्कूल न्यूट्रिशन सेंटर शुरू किए। यहां 70 बच्चों को पोषण और प्रारंभिक शिक्षा दी गई। धीरे-धीरे इन केंद्रों की संख्या बढ़कर पांच हो गई। ये आज भी चल रहे हैं। इस काम ने दिनेश को समुदाय के और करीब ला दिया। उन्होंने उनकी समस्याओं को करीब से समझा।

इसके बाद उन्होंने ऑर्गेनिक खेती की पहल शुरू की। आज करीब 9 बस्तियों के 300 परिवार इस काम से जुड़े हैं। वे अपनी छोटी जमीन पर जैविक खेती करके अच्छी आय कमा रहे हैं। लेकिन 2023 में एक और बड़ा झटका लगा। कन्हैया पुरी का अचानक हार्ट अटैक से निधन हो गया। इससे दिनेश और संस्था दोनों को बड़ा आघात पहुंचा। संस्था एक तरह से दिशा विहीन हो गई थी। लेकिन GVSTK की टीम ने दिनेश का साथ दिया। उन्होंने उन्हें आगे आने के लिए प्रेरित किया। बोर्ड मीटिंग में दिनेश को संस्था का सचिव चुना गया।

दिनेश बताते हैं,  “पिता के निधन के बाद हमारे FCRA रजिस्ट्रेशन पर सवाल उठे। CID जांच भी शुरू हुई। मैंने पूरी शांति से जांच में सहयोग किया। मैंने सभी जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराए। आखिरकार हम अपना रजिस्ट्रेशन बचाने में सफल रहे।” आगे की योजना भी स्पष्ट है। दिनेश इस साल टोंक जिले के 100 किसानों को ऑर्गेनिक खेती से जोड़ना चाहते हैं। इनमें 70 प्रतिशत महिलाएं होंगी। संस्था किसानों को बीज खरीदने से लेकर फसल बेचने तक मदद करेगी।

इसके अलावा संस्था ने अजमेर जिले के स्कूलों में बाल तस्करी और जेंडर जागरूकता पर भी काम बढ़ाया है। GVSTK विमुक्त जनजातियों के लोगों की सामाजिक पहचान से जुड़े काम भी करती है। संस्था उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड जैसे दस्तावेज बनवाने में मदद करती है। इससे वे सरकारी योजनाओं का लाभ ले पाते हैं। दिनेश कहते हैं,  “हो सकता है कि मैं बहुत ज्यादा पैसे नहीं कमा रहा हूं। लेकिन मुझे और मेरे परिवार को इस काम से संतोष मिलता है।”

“हम वंचित लोगों के जीवन में थोड़ा सुकून ला पा रहे हैं। मैं इस काम को पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ाता रहूंगा।”

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