माया का जीवन संघर्ष: एक संदेश

प्रमिला चौहान
मुश्त समाज सेवा समिति, खंडवा, मप्र

संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, सही सहयोग, अवसर और आत्मविश्वास से जीवन की दिशा बदली जा सकती है। परिवार की आर्थिक तंगी, बाल विवाह और फिर घरेलू हिंसा का सामना करने वाली माया के जीवन में कुछ ऐसा हुआ जिसने उसकी दिशा और दशा बदल दी। माया की कहानी कठिन परिस्थितियों में रह रही महिलाओं के लिए एक सकारात्मक संदेश है।

माया के जीवन में सघर्ष की शुरुआत बचपन के उन दिनों से हो चुकी थी जब उसके खेलने, खाने और पढ़ने के दिन थे। आर्थिक तंगी से जूझ रहे 12 सदस्यों वाले उसके परिवार का जीवन यापन बांस के बर्तन सूपड़ा-टोपला बनाकर होता रहा है। माया को पढ़ने का बहुत शौक था, लेकिन परिवार की आर्थिक तंगी और सामाजिक सोच उसके रास्ते की कई बार रुकावट बनी। उसके गांव में 8वीं तक ही स्कूल था, आगे पढ़ने के लिए 5 किमी दूर जाना पड़ता था, जो लड़कियों के लिए आसान नहीं था। वह पढ़ाई के साथ-साथ घर आका कामकाज और कभी-कभी सुपड़ा बेचने भी जाती थी। जब वह 16 साल की हुई उसे देखने रिश्तेदार आने लगे। हालांकि उसने अपने परिवार को जल्दी शादी नहीं करने और आगे पढ़ने की इच्छा बतायी लेकिन बड़ी बहन की शादी के बाद से उसपर शादी करने का मानसिक दबाव बढ़ने लगा। 10 वीं के बाद उसकी पढ़ाई छूट गई और परिवार ने भी अपनी गरीबी और समाज के दबाव में साल 2017 में नाबालिग माया की शादी कर दी।

माया का पति सरकारी दफ्तर में मुलाज़िम था, उसका घर भी पक्का और बड़ा था, परिवार वालों ने सोचा की बिटिया वहां खुश रहेगी। लेकिन शादी के कुछ माह बाद से ही माया को ससुराल वालों ने शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरु कर दिया। खंडवा जैसे बड़े शहर में रहकर भी पति और सास-ससुर की सोच कितनी छोटी होगी यह कभी माया ने सोचा न था। ससुराल में उसके साथ नौकरानी जैसा व्यवहार किया जाने लगा। इसी कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए माया ने एक बेटी को जन्म दिया। उसने सोचा कि बच्चे के आने से सब ठीक हो जाएगा, जैसा अक्सर हमारे समाज में महिलाएं सोचती हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उपेक्षा और घरेलू हिंसा का सामना

माया बताती है कि डिलीवरी के एक घंटे बाद ही बच्ची को उससे अलग कर दिया गया। स्तनपान के लिए भी समय निर्धारित कर दिया गया, जबकि सरकार और डॉक्टर भी माँ के दूध को अमृत बताते हैं और कम से कम 6 महीने तक बच्चे को माँ का दूध देने की सलाह देते हैं। परन्तु सास और पति को एक नौकरानी” चाहिए थी इसलिए उन्होने कमजोरी और छोटी बच्ची होने के बावजूद घर का सारा काम काज पूरा करने का भार डाल दिया। अक्सर खाना खाने के लिए हर सदस्य का अलग आदेश होता, जैसे किसी होटल में गए हों। कभी-कभी माया को पर्याप्त पोषण न मिल पाने की वजह से ठीक से दूध नहीं उतरता जिससे बच्ची रोने लगती तो भी उसे ही ताने और गालियां सुनाई जाती थी।

पति बाहर की किसी बात का गुस्सा भी घर आकर उसी पर निकालता-बेल्ट से मारता। कभी दाल में पानी ज्यादा होने पर, कभी तेल ज्यादा होने पर, तो कभी राशन कम होने पर सास ताने देती-“क्या तेरे बाप के घर से आएगा?” ननद भी तानों और अपमान में पीछे नहीं रहती। कई बार सास और ननद भी उस पर हाथ उठा देती थीं। आप सोच रहे होंगे कि इतना सब सहकर भी वह कैसे जी रही थी? गरीबी, परिवार की जिम्मेदारियां , सामाजिक दबाव और लोक-लाज,इन सबने उसके लिए हर रास्ता बंद कर दिया था।

वर्ष 2020 में, जब माया एक रिश्तेदार की शादी में गई, तब नहाने के दौरान उसकी भाभी ने उसके शरीर पर पड़े नीले घाव देख लिए। यह देखकर पूरा परिवार चौंक गया। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उनका सीधा-सादा दिखने वाला दामाद इतना क्रूर हो सकता है। तब पता चला कि शादी के 3-4 महीने बाद से ही मारपीट, ताने और गाली-गलौज शुरू हो गई थी। लेकिन माया ने कभी यह बात अपने मायके में नहीं बताई-पिता की इज़्ज़त और समाज के डर से। उसे लगा कि शायद वह गांव की होने के कारण शहर के तौर-तरीकों में ढल नहीं पा रही है।

असहनीय दर्द दे गई मासूम की मौत

माया के साथ ससुराल पक्ष द्वारा खानपान व देखरेख में कमी और आये दिन होने वाली घरेलू हिंसा का असर उसकी मासूम बेटी के जीवन पर पड़ता गया। समय पर पोषण और देखभाल न मिलने के कारण उसका विकास रुक गया जिससे वह न ठीक से बोल पाती थी, न चल पाती थी, उसे अक्सर दौरे पड़ने लगे। ऐसे कठिन समय में भी ससुराल वालों ने कोई विशेष मदद नहीं की तब माया के माता-पिता ने उसे ससुराल वापस न भेजने का निर्णय लिया और नातिन के इलाज के लिए गांव -गांव घूमकर सूपड़ा-टोपला बेचकर पैसे जुटाए और यथा संभव इलाज भी कराया लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था, अप्रैल 2021 में मासूम बिटिया की मृत्यु हो गई जिसने माया के लिए जीवन भर टीसने वाला दर्द दे गयी। इस घटना के बाद माया पूरी तरह से निराश हो गयी, उसके मन में कई बार आत्महत्या का ख्याल भी आया लेकिन मायके वालों ने उसे किसी कदर संभाले रखा।

हेल्थ वर्कर की नई पहचान

नवंबर 2021 में माया मुस्त समाज सेवा समिति के एक कार्यक्रम में शामिल हुई। इस संस्था में उसकी छोटी बहन पहले से वालंटियर थी। इस कार्यक्रम में अपनी जैसी महिलाओं की बातों को सुनकर उसका जुड़ाव बढ़ता गया। लगातार काउंसलिंग, संवाद और अन्य महिलाओं की कहानियों ने माया के जीवन में नई उम्मीद पैदा की। इसी बीच वर्ष 2022 का वह खास दिन भी आया जब उसका चयन सामुदायिक स्वास्थ्य फ़ेलो के रूप में हुआ। इस फ़ेलोशिप के तहत माया को प्लस ट्रस्ट उदयपुर में शामिल होकर सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी कौशल सीखने का मौका मिला।

इस प्रशिक्षण के बाद माया ने गाँवों में स्वास्थ्य सर्वे किया और बीपी, शुगर, हीमोग्लोबिन जैसी प्राथमिक जाँच शुरू की। पहले ही महीने उसने 3000 रुपये कमाए। धीरे-धीरे उसने स्वास्थ्य केंद्रों के साथ मिलकर कैंप आयोजित करना शुरू किया जिससे संवेदनशील हेल्थ वर्कर के रूप में माया की पहचान बढ़ने लगी। उसके समर्पण को देखते हुए एक स्थानीय डॉक्टर ने उसे 7000 रुपये मासिक वेतन पर काम दिया, जो दो साल में बढ़कर 12000 रुपये मासिक हो गया है। संस्था के सहयोग से मिले इस कौशल और हौंसले के दम पर एक नई ज़िंदगी की ओर कदम बढ़ाते हुए माया ने अपनी 12 वीं की पढ़ाई भी पूरी की। उसका सपना एक लैब टेक्नीशियन बनने का है जिसकी पढ़ाई के लिए वह पैसे बचा रही है साथ ही अपने परिवार का पालन पोषण भी कर रही है।

Scroll to Top