‘सक्षम’ होकर बने दूसरों का सहारा

खेमचंद
कोऑर्डिनेटर (मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम) – इब्तदा, अलवर (राजस्थान)

खेमचंद के भीतर दूसरों की मदद करने का जुनून साफ दिखाई देता है। वह चाहते तो कोई और काम करके ज्यादा पैसे कमा सकते थे। एक आसान जिंदगी चुन सकते थे। लेकिन उन्होंने अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपना जीवन सामाजिक क्षेत्र को समर्पित कर दिया। बचपन में पोलियो की वजह से उनके दोनों पैर प्रभावित हो गए थे। निचला हिस्सा स्थायी रूप से कमजोर हो गया। लेकिन इससे उनके हौसले पर कोई असर नहीं पड़ा।
38 साल के खेमचंद एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार से आते हैं। उन्होंने पोस्टग्रेजुएशन किया है। साथ ही B.Ed की डिग्री भी ली है। वह चाहते तो एक आरामदायक और बेहतर कमाई वाला जीवन चुन सकते थे। लेकिन उनके मन में लोगों के लिए कुछ करने की इच्छा थी। यही उन्हें सामाजिक क्षेत्र में ले आई। यह इच्छा उनके अपने अनुभवों से पैदा हुई।
खेमचंद बताते हैं, “मुझे 3 साल की उम्र में पोलियो हो गया था। इससे मेरे दोनों पैर हमेशा के लिए प्रभावित हो गए। लेकिन मुझे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि मैं किसी चीज में पीछे हूं। मुझे हमेशा लोगों का प्यार और सहयोग मिला। इसी वजह से मेरे मन में आया कि मुझे भी दूसरों के लिए कुछ करना चाहिए।” 2019 में उन्हें मौका मिला। उन्होंने अलवर की NGO इब्तदा में काम शुरू किया। यह संस्था महिलाओं और बच्चियों की शिक्षा और सशक्तिकरण पर काम करती है।
आज वह MIS कोऑर्डिनेटर के साथ-साथ जिला कार्यक्रम समन्वयक की भूमिका भी निभा रहे हैं। उनका काम यह सुनिश्चित करना है कि संस्था की आजीविका से जुड़ी योजनाएं ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचें। खेमचंद कहते हैं, “जब मैं फील्ड में या वर्कशॉप में इन महिलाओं से मिलता हूं, तो वे जो सम्मान और स्नेह देती हैं, वह मुझे हैरान कर देता है। मुझे लगता है कि मैंने ऐसा कुछ खास नहीं किया है। लेकिन यही प्यार मुझे और मेहनत करने की ताकत देता है।”
शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्हें दो बार सरकारी नौकरी भी मिली। लेकिन किसी कारण से दोनों बार भर्ती प्रक्रिया रद्द हो गई। इसके बाद उन्होंने एक निजी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। लेकिन वहां का व्यावसायिक माहौल उन्हें पसंद नहीं आया। उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी और अपना कोचिंग सेंटर शुरू किया।
कुछ समय बाद उन्हें राजस्थान पंचायत विभाग में काम करने का मौका मिला। यह काम स्वच्छ भारत मिशन के तहत रामगढ़ ब्लॉक में था। यह कॉन्ट्रैक्ट पर था। करीब साढ़े छह साल तक उन्होंने यह काम किया। इस दौरान उन्होंने गांवों में 40 हजार शौचालय बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौरान उनका संपर्क इब्तदा की टीम से हुआ। यह टीम ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका कार्यक्रम चला रही थी।
खेमचंद बताते हैं, “मैंने देखा कि इब्तदा की टीम महिलाओं को एकत्र करती है। उनके समूह बनाती है। उनसे उनके मुद्दों पर बात करती है।” “मैंने उनसे कहा कि मुझे भी इन बैठकों में बोलने का मौका दें। मैं स्वच्छ भारत मिशन के बारे में जानकारी देना चाहता था।” इससे उन्हें अपने काम में भी मदद मिली। लेकिन इससे ज्यादा, उन्हें इब्तदा के काम को करीब से समझने का मौका मिला। यह काम उन्हें बहुत प्रभावित कर गया।
2019 में जब पंचायत विभाग का उनका कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने वाला था, तो उन्होंने इब्तदा में नौकरी पाने की कोशिश शुरू की। शुरुआत में उनकी कोशिश सफल नहीं हुई। लेकिन जब उन्होंने अलवर टीम से संपर्क किया, तो उन्हें तीन दिन के भीतर मुख्यालय बुलाया गया। खेमचंद कहते हैं, “उन्होंने ज्यादा इंटरव्यू नहीं लिया। मुझे डेटा मैनेजमेंट का काम ऑफर कर दिया।”
उन्होंने अक्टूबर 2019 में इब्तदा जॉइन किया। वह MIS ऑपरेटर के रूप में काम करने लगे। करीब साढ़े चार साल बाद जिला समन्वयक का पद खाली हुआ। उन्हें इस पद पर नियुक्त कर दिया गया। अब वह पूरे संगठन के MIS काम को संभालते हैं। उनका काम राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक फैला है। इसके अलावा वह अलवर जिले में महिलाओं के लिए खेती और गैर-खेती आधारित आजीविका कार्यक्रमों की निगरानी भी करते हैं। उनके काम में फील्ड विजिट और यात्रा भी शामिल है।
शुरुआत में वह रोज 25 किलोमीटर का सफर तय करते थे। रामगढ़ से अलवर तक आते-जाते थे। इसके लिए वह एक मॉडिफाइड स्कूटर चलाते थे। अब अपने दो बच्चों की पढ़ाई के लिए वह परिवार के साथ अलवर में रहने लगे हैं। इब्तदा संस्था ने उनके लिए खास व्यवस्थाएं भी की हैं। खेमचंद बताते हैं, “मैं ऑफिस में अकेला दिव्यांग हूं। लेकिन संस्था ने तीन मंजिला बिल्डिंग में लिफ्ट लगवाई, ताकि मुझे आने-जाने में आसानी हो।”
“यात्रा के दौरान भी अक्सर कोई टीम सदस्य मेरे साथ जाता है। मैंने कभी यह सुविधाएं नहीं मांगीं, लेकिन संस्था खुद यह सब करती है।” वह कहते हैं कि यही संवेदनशीलता उन्हें और मजबूती देती है। खेमचंद बताते हैं, “मेरे जीवन में मुझे कभी अपनी विकलांगता की वजह से बुरा अनुभव नहीं हुआ। इससे मेरे अंदर आत्मविश्वास बना रहा।”
वह एक घटना याद करते हैं। “एक बार शादी के लिए लड़की के पिता ने मेरी कम आय पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मुझे किसी दुकान में काम करना चाहिए।” “मैंने तुरंत उन्हें वहां से जाने को कह दिया। मुझे लगा कि मेरे पिता नाराज होंगे। लेकिन उन्होंने मेरी तारीफ की और कहा कि कभी खुद को छोटा मत समझना।”
इसी आत्मविश्वास और जज्बे के साथ खेमचंद काम कर रहे हैं। वह बिना किसी विशेष अपेक्षा के महिलाओं को सशक्त बनाने में लगे हैं। लेकिन उन्हें सम्मान और प्यार अपने आप मिल जाता है। शायद उनके भीतर की सच्चाई लोगों को आकर्षित करती है।
