जून 2026

अंतर्मन का अवलोकन

मानव समाज के इतिहास में सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने हमेशा एक समतामूलक, न्यायपरक और शोषण-मुक्त समाज के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई है। राज्य और समाज व्यवस्था की विसंगतियों को बदलने का साहस सदैव इन संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दिखाया है।

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संगम का जुनूनी सफर

जमुई बिहार के सिमुलतला प्रखण्ड के एक छोटे से गांव वनगवां से शुरू होने वाली संगम कुमारी की कहानी केवल एक लड़की की नहीं, बल्कि उस जिद, साहस और आत्मसम्मान की है, जो हालातों से टकराकर अपना रास्ता खुद बनाती है। संगम का जन्म 6 दिसंबर 2003 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। उस समय गांव का माहौल ऐसा था, जहां बेटियों को अक्सर जिम्मेदारी से ज्यादा बोझ समझा जाता था।

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सुकमती का जीवन संघर्ष 

वर्धा की लाल मिट्टी में एक ख़ासियत है वह जो कुछ भी सोखती है, उसे भीतर ही रखती है। बारिश सोख लेती है, आंसू सोख लेती है, और कभी-कभी पूरी ज़िंदगी भी। सुकमती भी इसी मिट्टी की बेटी थी, वर्धा ज़िले के घने जंगल के कोर पर बसी गोंड बस्ती में जहां घर कम और झोपड़ियां ज़्यादा थीं।

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लैंगिक समानता के लिए “समावेशी क्रिकेट”

हरदा शहर अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी और मैदान के एक कोने में 12 से 20 साल की कुछ स्कूल और कॉलेज की लड़कियां  क्रिकेट की प्रैक्टिस कर रही थीं। उनके हाथों में बैट था, लेकिन उनके सामने केवल गेंद ही नहीं, बल्कि समाज की कई धारणाएं  भी थीं। यही वह पल था जहां  से एक ऐसी कहानी शुरू हुई, जो आगे चलकर लैंगिक समानता के एक अभियान में बदल गई।

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बंधुआ मजदूरी के खिलाफ एक मुहिम जारी है !

लगभग पांच  दशक पहले कुछ युवाओं ने अपने समाज की पीड़ा को बहुत करीब से महसूस किया। तब दलित समुदाय के लोग छुआछूत, अपमान और अमानवीय जीवन जीने को मजबूर थे। भूमिहीनता और आर्थिक कमजोरी ने उन्हें जमींदारों का गुलाम बना दिया था, जहां  वे पीढ़ियों तक बंधुआ मजदूरी करने को विवश थे। जीवन की बुनियादी जरूरतों और परिवार में जन्म, विवाह या मृत्यु से जुड़े सामाजिक रिवाजों को निभाने के लिए यह समुदाय बंधुआ मजदूरी और पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्ज के जाल में फंसा हुआ था। इन अमानवीय परिस्थितियों को बदलने के संकल्प के साथ ‘जन जागृति केंद्र’ की स्थापना हुई। 

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सामाजिक क्षेत्र की इलाकाई मानसिकता और असुरक्षा

2005 की बात है। यूपीएससी के इम्तिहान में धूल चाटने के बाद जब मैं नए सिरे से जीवन में मायने ढूंढने की कोशिश कर रहा था।  तब मैंने उत्तराखंड में एक संस्था में काम करने की ठानी। संस्था वालों ने काफी वक़्त लगाया मेरी दरख्वास्त पर विचार करने के लिए। बहरहाल, लगभग 1 महीने की मशक्कत और बार बार याद दिलाने पर, संस्था के निदेशक साहब ने मुझे मिलने के लिए बुलाया।  जुलाई के एक बेहद तेज़ बारिश भरे और ठन्डे  दिन मैं वहां कांपते हुए पहुंचा। एक गर्म चाय के साथ एक छोटे से मगर साफ़ सुथरे कमरे में मुझे बिठाया गया।

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क्यों जरूरी हो गया है लिंक्ड इन प्रोफाइल बनाना!

यह अपनी—अपनी पसंद हो सकती है कि आप किस सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर उपस्थित हों, सक्रिय हों, अपनी जान-पहचान आगे बढ़ाएं। लेकिन इस बात पर जरा गौर कीजिए जो मैं अपने अनुभव से आपको बताने जा रहा हूं। दरअसल पिछले दिनों मैं कुछ नई पार्टनरशिप के लिए काम कर रहा था। इसके लिए सामान्य बातचीत और कुछ विषयों पर सहमति बनने के बाद दस्तावेजों तक बात गई तो मैं यह देखकर हैरान था कि संस्था के किसी भी तरह के दस्तावेज की जगह मुझे उसमें संस्था की लिंक्ड इन आईडी दर्ज करने को कहा था। बात यहीं तक खत्म नहीं हुई, इस दस्तावेज में जिन चार—पांच साथियों की प्रोफाइल मुझे देनी थी, उसके लिए भी मुझे उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल का लिंक मांगा गया था।

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बेघर लड़कियों का एक हौसला

साल 1984 की बात है। पुणे जिले के एक छोटे से गांव  में प्रभा नाम की एक नन्ही बच्ची रहती थी। वह तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। हर रोज़ जब वह स्कूल जाती, तो अपनी सहेलियों के सुंदर-सुंदर बैग देखकर उसके मन में एक छोटी-सी इच्छा जन्म लेती “काश मेरे पास भी ऐसा सुंदर बैग होता।” लेकिन उसकी परिस्थितियां उसकी इच्छाओं से कहीं अलग थीं, उसके पास एक साधारण-सी थैली थी।

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ऐसे पूरी हुई चाहत की चाहत 

यह बात 15 जुलाई 2024 की है, बरसात का मौसम था, बारिश होकर थम चुकी थी। ठंडी-ठंडी हवाएं  चल रही थीं और चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी। हवा के झोंकों से फसलें लहराते हुए जैसे जीवन का संगीत गुनगुना रही थीं। हमारा कार्यक्षेत्र बड़वानी जिले के ग्राम भवती में था। एक मोहल्ले से गुजरती कच्ची गलियों में पानी जमा था और अधिकांश लोग खेतों या मजदूरी के काम में लगे हुए थे। उसी समय हमारी संस्था ‘पहल जन सहयोग विकास संस्थान’ की टीम विभिन्न गाँवों में घर-घर जाकर बच्चों की शिक्षा की स्थिति समझने के लिए सर्वे कर रही थी।

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