ऐसे पूरी हुई चाहत की चाहत

अजय चौहान
पहल जन सहयोग विकास संस्थान, बड़वानी

यह बात 15 जुलाई 2024 की है, बरसात का मौसम था, बारिश होकर थम चुकी थी। ठंडी-ठंडी हवाएं चल रही थीं और चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी। हवा के झोंकों से फसलें लहराते हुए जैसे जीवन का संगीत गुनगुना रही थीं। हमारा कार्यक्षेत्र बड़वानी जिले के ग्राम भवती में था। एक मोहल्ले से गुजरती कच्ची गलियों में पानी जमा था और अधिकांश लोग खेतों या मजदूरी के काम में लगे हुए थे। उसी समय हमारी संस्था ‘पहल जन सहयोग विकास संस्थान’ की टीम विभिन्न गाँवों में घर-घर जाकर बच्चों की शिक्षा की स्थिति समझने के लिए सर्वे कर रही थी।
दोपहर के लगभग 2 बजे मैं गांव की एक गली से गुजर रहा था। तभी मेरी नजर एक छोटे से घर के बाहर बैठे एक बच्चे पर पड़ी, जिसकी उम्र लगभग 14–15 वर्ष थी। उसके हाथ में एक पुरानी कॉपी और पेंसिल थी। वह कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन बार-बार रुक जा रहा था। मुझे लगा कि शायद वह स्कूल का होमवर्क कर रहा होगा, लेकिन उसी समय मेरे मन में एक सवाल आया अगर स्कूल का समय है तो यह बच्चा यहां क्यों है?
मैं उसके पास गया और पूछा, “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?” उसने धीरे से जवाब दिया, “चाहत।” मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, “चाहत, आज स्कूल नहीं गए?” वह कुछ पल चुप रहा, फिर धीमे स्वर में बोला, “भैया, पहले जाता था, लेकिन अब नहीं जा पाता। पलायन की वजह से मेरी स्कूल छूट गई। मैंने 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी।” जब हमने उससे और उसके परिवार से बात की, तो पता चला कि चाहत के पिताजी मजदूरी के लिए महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों कभी मुंबई, कभी पुणे में काम करने जाते हैं और कई बार 3-4 महीने तक घर से बाहर रहते हैं। परिवार की आय बहुत सीमित है, लगभग 6,000 से 7,000 रुपये प्रतिमाह।
पिताजी के पलायन के कारण घर की जिम्मेदारी चाहत और उसकी माँ पर आ जाती है। कभी घर के छोटे-मोटे काम, तो कभी मजदूरी में मदद, इन्हीं कारणों से उसकी पढ़ाई धीरे-धीरे छूट गई। स्कूल के रिकॉर्ड के अनुसार अगस्त 2023 से जून 2024 के बीच चाहत की उपस्थिति 30 प्रतिशत से भी कम रह गई थी। अंततः उसने स्कूल जाना लगभग बंद ही कर दिया। लेकिन असली समस्या अभी सामने आनी बाकी थी। जब हमने चाहत को दोबारा स्कूल से जोड़ने की कोशिश की, तो स्कूल प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा “बच्चे के दस्तावेज़ कहां हैं?” तभी हमें पता चला कि चाहत के पास जन्म प्रमाण पत्र और परिवार से जुड़े कुछ आवश्यक पहचान दस्तावेज़ अधूरे थे। सबसे बड़ी समस्या उसके पिताजी भूरेलाल जी के दस्तावेज़ों को लेकर थी। लगातार पलायन के कारण उनके कई जरूरी कागज़ पूरे नहीं हो पाए थे, जिसकी वजह से चाहत के दस्तावेज़ों में नाम और पता सही नहीं था।
उस समय ऐसा लगा कि चाहत की पढ़ाई फिर से रुक सकती है। एक सवाल हमारे सामने खड़ा था, क्या केवल कागज़ों की कमी के कारण एक बच्चे का भविष्य रुक जाएगा? हमारी संस्था की टीम ने इस समस्या को गंभीरता से लिया। अगस्त 2024 से अक्टूबर 2024 के बीच हमने परिवार के साथ कई बैठकें कीं। पिताजी भूरेलाल जी से फोन पर संपर्क किया गया, आवश्यक दस्तावेज़ों की जानकारी जुटाई गई और ग्राम पंचायत के सदस्य श्री मनोज डावर तथा स्कूल के प्राचार्य श्री मुकेश जी भार्गव के साथ समन्वय स्थापित किया गया। लगभग दो महीने के निरंतर प्रयासों के बाद आवश्यक दस्तावेज़ पूरे हो पाए। 5 नवंबर 2024 को चाहत का दोबारा स्कूल में नामांकन कराया गया।
शुरुआत में वह थोड़ा झिझकता था, लेकिन धीरे-धीरे उसकी रुचि पढ़ाई में बढ़ने लगी। फरवरी 2025 तक उसकी उपस्थिति 85 प्रतिशत तक पहुंच गई और शिक्षकों के अनुसार वह पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने लगा। मई महीने की बात है। सुबह का समय था, लगभग 10:30 बजे। मैं उसी रास्ते से गुजर रहा था, जहां पहली बार मेरी मुलाकात चाहत से हुई थी। दूर से मैंने एक बच्चे को खिलखिलाकर हंसते हुए देखा वह चाहत ही था। इस बार उसकी खुशी की वजह खास थी, उसने 10वीं की बोर्ड परीक्षा में 87.55 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे और जिले में प्रथम स्थान हासिल किया था। उसका नाम अब सरकार की मेरिट सूची में शामिल हो चुका था और वह 25,000 रुपये की छात्रवृत्ति का हकदार बना। जब वह मेरे पास आया, तो मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई। आज चाहत नियमित रूप से स्कूल जा रहा है और उसका सपना है कि वह आगे पढ़-लिखकर शिक्षक बने।
सिर्फ चाहत ही ऐसा बच्चा नहीं है, जो स्कूल से वंचित हुआ हो। बड़वानी जिले के प्राथमिक आंकड़ों के अनुसार हर 100 में से 66 बच्चों के स्कूल से वंचित होने का एक बड़ा कारण दस्तावेज़ों का अपूर्ण होना है। इसके अलावा पलायन, बाल मजदूरी और बाल विवाह भी प्रमुख कारण हैं। चाहत की मुस्कान हमें यह याद दिलाती है कि अगर सही समय पर दस्तावेज़ और पढ़ाई के लिए सहयोग मिल जाए, तो हर बच्चे का शिक्षा और विकास के अधिकार को सुनिश्चित किया जा सकता है।
