संगम का जुनूनी सफर

अनुपम अनूप
भरोसा सेवा समिति, रीवा, मध्य प्रदेश

जमुई बिहार के सिमुलतला प्रखण्ड के एक छोटे से गांव वनगवां से शुरू होने वाली संगम कुमारी की कहानी केवल एक लड़की की नहीं, बल्कि उस जिद, साहस और आत्मसम्मान की है, जो हालातों से टकराकर अपना रास्ता खुद बनाती है। संगम का जन्म 6 दिसंबर 2003 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। उस समय गांव का माहौल ऐसा था, जहां बेटियों को अक्सर जिम्मेदारी से ज्यादा बोझ समझा जाता था। जिसका परिणाम ये हुआ कि, संगम के जन्म के साथ ही उसके जीवन का पहला संघर्ष शुरू हो गया था। पिता ने संगम को अपनाने से इंकार करने का लगभग मन बना लिया था क्योंकि वह लड़की थी। इस बात को लेके घर में तनाव था, रिश्तों में खामोशी थी, लेकिन संगम की मां और मामा ने साफ कहा कि यह बच्ची बोझ नहीं, बल्कि इस परिवार की जिम्मेदारी और सम्मान है। उनके इस दृढ़ निर्णय ने धीरे-धीरे हालात बदले और संगम को परिवार में जगह मिली।

बचपन से ही संगम थोड़ी अलग थी। जहां दूसरी लड़कियों को घर घर खेलना पसंद था, तो संगम को घर से बाहर घूमने का बहुत शौक था, उसे दुनिया को देखने और समझने की ललक थी। उसने गांव के सरकारी स्कूल से शुरूआती पढ़ाई शुरू की, और अपनी तेज समझ से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। लेकिन जैसे-जैसे वह किशोरावस्था में पहुंची, परिवार और समाज की परंपराएं उसके रास्ते में खड़ी होने लगीं। उसकी तीनों बहनों की शादी कम उम्र में ही कर दी गई थी, और अब वही दबाव संगम पर भी आने लगा था।

जब खुद काट लिए अपने बाल…

साल 2021 में संगम के बड़े भाई की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारियां उसके कंधों पर आ गईं। वहीं घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी थी और ऐसे में उसके लिए आगे की पढ़ाई जारी रखना और भी कठिन हो गया। इसी बीच उसके विवाह की बातें भी शुरू हो गईं। एक समय ऐसा आया जब उसका रिश्ता तय होने की तैयारी तक पहुंच गया। लेकिन संगम ने चुप रहने के बजाय एक साहसी कदम उठाया। उसने अपने बाल खुद काट लिए। यह मानो केवल एक विरोध नहीं, बल्कि यह एक घोषणा की तरह था कि वह अपनी जिंदगी के फैसले खुद तय करेगी। संगम के इस कदम ने सबको चौंका दिया और उसका रिश्ते की बात वही समाप्त हो गई।

परिवार की शुरुआती नाराजगी के बावजूद संगम ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की और साथ ही एक सामाजिक संस्था से जुड़ गई। वर्ष 2023 में उसने मिलेट्स को बढ़ावा देने के अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई। जिसमें अलग-अलग गांवों में जाकर वो लोगों को मिलेट्स के फायदे बताती, उनके व्यंजन बनाकर दिखाती और किसानों को इसे उगाने के लिए प्रेरित भी करती। इस काम ने उसे घर से बाहर निकलने, नए लोगों से मिलने और दुनिया को समझने का अवसर दिया। हालांकि उसके पिता को उसका बार-बार बाहर जाना पसंद नहीं था, लेकिन संगम हर बार उन्हें समझाती “बस आखिरी बार,” और इसी तरह धीरे धीरे समय आगे बढ़ता गया।

एंबीशन एक्सीलरेटर में भागेदारी

इसके साथ ही साल 2024 में उसने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया। वह अपने गांव से 7 किलोमीटर दूर एक स्कूल में तीन महीनों तक आदिवासी बच्चों को पढ़ाने लगी। यह उसके लिए बिल्कुल नए अनुभव की तरह था। वहां संगम ने बच्चों को किताबों से ज्यादा गतिविधियों के माध्यम से सिखाया। संगम एक किसान परिवार से थी तो, अपने साथियों के साथ मिलकर कृषि के क्षेत्र में भी प्रयोग किए। अपने घर के छोटे से खेत में उसने एग्रोफॉरेस्ट्री फार्मिंग की शुरुआत की। उसके इस नवाचारी प्रयास को पहचान मिली जिसकी बदौलत सितंबर 2024 में उसका चयन बैंगलोर में आयोजित एंबीशन एक्सीलरेटर प्रोग्राम 2024 के लिए हुआ, जहां वह भारत के शीर्ष 25 युवाओं में शामिल हुई।

संगम अपने गांव की पहली लड़की थी जिसे अपने कार्यों के लिए इतना बड़ा मंच मिला और जिसे हवाई जहाज में बैठकर अकेले इतने दूर जाने का मौका मिला। संगम का बैंगलोर से लौटना, मानो उसके गांव में संगम के लिए नई दरवाजे खोलने जैसा था, जब मीडिया के लोग उसके घर पहुंचे,और उसके पिता से बात की तो, वही पिता जिन्होंने कभी उसे अस्वीकार करने का मन बना लिया था, मीडिया के सामने कहा कि मेरी बेटी मेरा अभिमान है, संगम को जो करना है करे, मैं मेरी बेटी के हर निर्णय के साथ हूं।”

संडे साइकिल यात्रा से नया सफर

पिता और परिवार जनों के व्यवहार में आए इस बदलाव ने उसके लिए आगे बढ़ने के रास्ते खोल दिए। दिसंबर 2024 में संगम ने अपने स्तर पर, बिना किसी संस्था या सरकारी सहायता के, अपने दोस्तों के साथ मिलकर “संडे साइकिल यात्रा” की शुरुआत की। जिसमें हर रविवार वह गांव-गांव जाकर साइकिल यात्रा करती, पेड़ लगाती और लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करती। धीरे-धीरे कई युवा इस यात्रा से जुड़ने लगे। लेकिन 2025 में संगम को गूंज की ग्रासरूट फेलो बनी और काम के सिलसिले में झारखंड चली गई, तो यह पहल रुक गई क्योंकि उसके साथी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए।

संगम ने झारखंड के खूंटी जिले में 14 महीने रहकर सामुदायिक श्रमदान की व्यवस्था के माध्यम से बच्चों, युवाओं, महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य व स्वच्छता और आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित करते हुए मार्च 2026 में सफलतापूर्वक अपनी फैलोशिप पूर्ण की। आज संगम अपने परिवार की जिम्मेदारियां भी निभा रही है और अपने छोटे भाई की पढ़ाई में सहयोग कर रही है। उसके प्रयासों से उसके गांव की तीन लड़कियों को बेहतर शिक्षा का अवसर मिला है। फेलोशिप खत्म होने के बाद संगम जहां एक स्थानीय संस्था के जुड़कर शिक्षा से जुड़े कार्य कर रही है,संगम का चयन जहां एकतरफ नवगुरुकुल के हुआ, वहीं दूसरी तरफ अजीमप्रेमजी यूनिवर्सिटी और गांधी फेलोशिप के फाइनल साक्षात्कार के लिए भी चयनित हो चुकी हैं, और संगम की पूरी यात्रा संगम के साथ साथ गांव के दूसरी लड़कियों के भी उज्जवल भविष्य का विश्वास जगा रही हैं।

संगम की कहानी का मुझे उस वक्त पता चली जब दिल्ली में फेलोशिप के दौरान मेरी मुलाकात संगम से हुई, तब से उसकी यात्रा के एक सहयोगी या मार्गदर्शक के रूप में शामिल होकर, कह सकता हु कि ये केवल उसके संघर्ष की कहानी भर नहीं है, बल्कि यह बदलाव की कहानी है। संगम की जिंदगी दिखाती है कि, जब एक लड़की अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तो वह न केवल अपनी जिंदगी बदलती है, बल्कि पूरे समाज की सोच को नई दिशा देती है। संगम अपने गांव की लड़कियों के लिए एक उम्मीद हैं, साथ ही एक उदाहरण भी, कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, साहस, संघर्ष और जिद से हर रास्ता बनाया जा सकता है।

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