सुकमती का जीवन संघर्ष

पीयूष अशोककुमार आगलावे
ग्रामीण समस्या मुक्ति ट्रस्ट, यवतमाल, महाराष्ट्र

वर्धा की लाल मिट्टी में एक ख़ासियत है वह जो कुछ भी सोखती है, उसे भीतर ही रखती है। बारिश सोख लेती है, आंसू सोख लेती है, और कभी-कभी पूरी ज़िंदगी भी। सुकमती भी इसी मिट्टी की बेटी थी, वर्धा ज़िले के घने जंगल के कोर पर बसी गोंड बस्ती में जहां घर कम और झोपड़ियां ज़्यादा थीं। जहां के रास्ते कच्चे थे पर इरादा पक्का। उसके घर के पीछे नीम का एक बूढ़ा पेड़ था जो हर मौसम में एक-सा खड़ा रहता न सूखता, न झुकता। सुकमती को वह पेड़ हमेशा से पसंद था। शायद इसलिए कि वह अकेला था, और फिर भी डिगा नहीं था। सुकमती का जीवन भी कुछ वैसा ही हो चला था।
सुकमती की माँ जानकी बाई एक मज़बूत गोंड औरत थी,जिसने पूरी ज़िंदगी खेत और जंगल के बीच काटी। बाप बचपन में ही गुज़र गए तो भाई मुन्नू ने घर संभाला। इस परिवार के बाहर सुकमती की पूरी दुनिया थी जंगल, नदी, और वर्धा की वह अनंत खुली धूप जो सुबह सोने जैसी लगती थी और दोपहर को आग जैसी। सुकमती की उम्र तब बाईस बरस थी जब विक्रांत से पहली बार उसकी मुलाक़ात हुई। वह शहर का था बातों में चिकनाई थी, आंखों में चमक, और होठों पर कुटिल मुस्कान। उसने कहा, “तुम्हारी आंखों में जंगल है।” सुकमती हंसी, शर्म से नहीं, हैरानी से क्योंकि इससे पहले किसी ने उसकी आंखों में कुछ देखने की कोशिश नहीं की थी। लोग या तो उसके हाथों को देखते काम के लिए या उसके बदन को, किसी और मतलब से।
फिर गोंड बस्ती में विक्रांत रोज़ आने लगा। कभी लकड़ी के बाज़ार तक साथ चलता, कभी जंगल की कोर पर बैठकर घंटों बातें करता। उसने बताया कि उसके घर में कलह है, माँ बीमार है, वह भीतर से टूटा हुआ है। और सुकमती जो खुद टूटे हुए लोगों को देखकर पिघल जाती थी उसने उसका दर्द अपने भीतर उतार लिया। सुकमती को लगा, शायद वे दोनों एक-दूसरे की जरूरत हैं। जंगल की उस एकांत में पला रिश्ता कच्चा था न वादे की छत थी, न रिश्ते का नाम। बस दो इंसान थे और उनके बीच एक ख़ामोश समझौता, जो कभी लिखा नहीं गया था।
फिर दो महीने गुज़रे, विक्रांत का आना धीरे-धीरे कम होने लगा। और एक दिन किसी ने सुकमती को बताया कि विक्रांत ने शहर में किसी और से ब्याह कर लिया। यह सुनकर उसके होश उड़ गए। उस वक़्त सुकमती के गर्भ में एक जीवन पल रहा था। बिन ब्याही लड़की के लिए माँ बनने की कहीं कोई इजाजत नहीं थी फिर भी सुकमती ने अपने बच्चे को दुनिया में लाने का निश्चय किया। सात महीने बाद एक बच्चा रोया। तब गांव और समाज के लोगों ने तरह-तरह के ताने मारे उसे समाज के लिए कलंक बताया गया। लेकिन चुप रहकर सुकमती ने मासूम बच्चे के प्यार के भरोसे अपना जीवन आगे बढ़ाया।
इधर गांव के कुछ मर्दों ने तय कर लिया था कि बिन ब्याह माँ बनी औरत वह सबके लिए उपलब्ध है। रात के अँधेरे में टोमने आते और दिन के उजाले में लोगों की कुत्सित नज़रें उसे घूरती रहती। एक बार एक युवक ने रास्ता रोका। दूसरी बार तीन इकट्ठे आए। सुकमती ने जंगल से लाई लकड़ी उठाई और डाँटकर खदेड़ दिया। यह सब कई दिनों तक चलता रहा। फिर एक दिन उसकी नज़र भीमसिंग पर पड़ी। वह गोंड बस्ती का एक युवक था जो चुपचाप गाय चराता रहता। उसके आंखों में एक सीधापन था जो शहरी चमक से बिल्कुल अलग था। उसने कभी सुकमती पर उँगली नहीं उठाई थी। एक दिन जंगल की राह में बस इतना कहा “तुम अकेली हो, पर अकेली नहीं दिखती।” यह बात सुकमती के भीतर कहीं गहरे उतर गई।
उसने फिर एक बार भरोसा किया इस बार धीरे-धीरे, डरते-डरते, जैसे जले हुए हाथ से कोई फिर आग के पास जाए। भीमसिंग अच्छा था। वह उसके बच्चे को देखकर मुँह नहीं फेरता था। महीनों का यह रिश्ता एक दिन उस मुक़ाम तक पहुँचा जहां सुकमती ने सोचा शायद इस बार ज़िंदगी ने कुछ लौटाया है। पर भीमसिंग के घरवालों ने साफ़ कह दिया एक बच्चे की माँ, वो भी बिन ब्याह की यह रिश्ता नहीं हो सकता। फिर भीमसिंग ने भी उससे मिलना-जुलना बंद कर दिया। इस दूसरी चोट ने सुकमती को अंदर से तोड़ दिया। उसकी उम्मीद फिर से एक गहरे निराशा और क्षोभ में बदल गयी। वह सोचने लगी शायद सभी पुरुष ऐसे ही होते हैं मतलबी या फिर मेरी किस्मत ही ख्रराब है। उसके मन में बच्चे और अपने जीवन को लेकर एक तरह का डर समाने लगा था।
फिर आया तीसरा ज़ख्म जो किसी एक इंसान ने नहीं, पूरे तंत्र ने दिया। गांव की पंचायत ने तय किया कि सुकमती को गांव की किसी बैठक में नहीं बुलाया जाएगा क्योंकि वह “चरित्रहीन” है। उसके बेटे को स्कूल में दाखिला देने से पहले टीचर ने पूछा, “बाप का नाम ?” सुकमती ने कहा “माँ का नाम काफ़ी नहीं है क्या?” टीचर ने उसे अपने नियम का हवाला देकर लौटा दिया। स्कूल से लौटती निराश सुकमती के मन में कई सवाल उठने लगे। यह कैसा नियम है जो बच्चे को शिक्षा देने के लिए बाप का नाम ही मांगे ? और फिर पंचायत का वह फैसला जो हर समय महिला को ही कठघरे में खड़ा करे। उस दिन सुकमती घर नहीं गई। सीधे नीम के पेड़ के पास गई, उसी बूढ़े पेड़ के पास जो बरसों से खड़ा था। और पहली बार ज़ोर से रोई भीतर से, आत्मा के उस कोने से जहां उसने सब कुछ दबाकर रखा था। आंसुओं की धार बहती रही और वह सोचती रही खुद के और बच्चे के जीन के बारे में, मन से एक आवाज आयी उसकी कोई गलती नहीं प्रेम करना तो इंसान की प्रकृति है। नीम की छांव में उसे एक शांति मिली और वह तैयार हो उठी एक नए संकल्प के साथ, वह इन बंधनों और सवालों का जवाब देगी,हर परिस्थिति का सामना करेगी।
अगले दिन वह फिर स्कूल गयी एक लिखित आवेदन लेकर। इस आवेदन को उसने रात को खुद लिखा था। उसमें लिखा था कि किसी भी बच्चे का अधिकार उसकी माँ के नाम पर भी होता है और किसी नियम में यह नहीं लिखा कि बाप का नाम न हो तो बच्चा पढ़ नहीं सकता। यदि फिर भी बच्चे को एडमिशन नहीं दिया तो स्कूल वालों को कारण लिखकर देना होगा। टीचर उसकी इन बातों से हैरान हुए। हेडमास्टर बुलाए गए। बहस हुई। पर सुकमती अपनी बात पर डटी रही। आखिरकार उसके बेटे को दाखिला मिला। यह उसकी पहली जीत थी, इससे उसका हौंसला मजबूत हुआ।
फिर पंचायत की बैठक का एक दिन आया। सुकमती को नहीं बुलाया गया था फिर भी वह गयी। जाकर पंचायत के दरवाज़े पर खड़ी रही। किसी ने रोका तो उसने कहा “मैं इस गांव की बेटी हूं । इस मिट्टी पर मेरा भी उतना ही हक़ है।” सरपंच ने नज़र फेर ली। दो-तीन बुज़ुर्ग औरतें चुप रहीं। पर एक युवती हीराबाई, जो पास के गांव से ब्याही आई थी वह सुकमती के पास आयी और बोली, “आओ, यहां बैठो।” उस एक वाक्य में जितनी हिम्मत थी, उतनी शायद पूरी बैठक में नहीं थी। धीरे-धीरे बस्ती की दूसरी औरतें भी उसके पास आने लगीं। वे औरतें जो खुद अपना दर्द किसी को नहीं बता सकती थीं उन्होंने सुकमती में कुछ देखा। शायद अपना ही अक्स। सुकमती ने उनके लिए कुछ नहीं किया था पर वह खड़ी रही थी। और खड़े रहना ही कभी-कभी सबसे बड़ा काम होता है।
उसने अपने बेटे का नाम रखा “आकाश”। इसलिए नहीं कि वह उसका बड़ा सपना था, बल्कि इसलिए कि आकाश किसी एक का नहीं होता। आकाश सबका होता है और कोई उसे छीन नहीं सकता। आकाश आज स्कूल जाता है। रोज़ सुबह जब वह अपनी पाटी उठाकर निकलता है, तो सुकमती दरवाज़े पर खड़ी होकर देखती है और उसके चेहरे पर जो भाव होता है, वह दर्द नहीं होता। वह किसी और चीज़ का नाम है जिसे शायद गोंड भाषा में “जीत” कहते हैं, पर जो हर भाषा में समझ में आती है।
सुकमती अब बस्ती की उन लड़कियों से मिलती है जो किसी न किसी धोखे के बाद चुप हो गई हैं। वह उन्हें कोई भाषण नहीं देती। कोई सलाह नहीं। बस एक काम करती है वह उनके पास बैठती है। और कहती है, “तुमने कुछ ग़लत नहीं किया। तुमने सिर्फ़ भरोसा किया था। भरोसा करना ग़लत नहीं है।” यही उसका जवाब है, उस विक्रांत को, उस भीमसिंग को, उस पंचायत को, उस टीचर को और उन सब टोमनों को। वह जवाब चिल्लाकर नहीं दिया। बस इन सबसे पैदा हुई हालात के सामने वह खड़ी रही अपने नीम के पेंड़ की तरह अडिग और जीवंत रूप से।
