विस्थापित बैगाओं को मिला मछली पालन का सहारा

चंद्रकांत यादव
ग्रामोदय ग्राम विकास समिति, कवर्धा, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के दलदली बोदई गांव में पुस्तैनी रूप से रह रहे बैगा जनजातीय परिवारों को 26 साल पहले बालको-वेदांता कंपनी की बॉक्साइट खनन परियोजना के कारण विस्थापित होना पड़ा। तब गांव के 16 परिवारों ने विस्थापन का दर्द झेलते हुए इन्द्रीपानी नाम से न सिर्फ अपना नया गाँव बसाया बल्कि मछ्ली पालन को अपनाते हुए अपनी आजीविका का प्रबंधन भी किया। इस सामुदायिक पहल में ग्रामोदय ग्राम विकास समिति, कवर्धा की अहम भूमिका रही है।

झर-झर बहते झरने, कल-कल करती नदियाँ और मैकल पर्वत की मनमोहक वादियों में अपनी मस्ती और साधारण जीवनशैली को जीने वाली बैगा जनजाति अपने सहज स्वभाव के लिए जानी जाती है। शहरों की चकाचौंध से दूर कम संसाधनों में जंगल आधारित आजीविका,मछली व मुर्गी पालन के साथ ही प्राकृतिक खेती-मजदूरी पर निर्भर रहने वाले इस समुदाय को अपने जल-जंगल-जमीन से गहरा लगाव होता है।

लेकिन आज से 26 साल पहले दलदली बोदई गांव के इन बैगा परिवारों के जीवन में वह दुर्दिन भी आया जब 8 दूसरे गांव के साथ ही उनका गांव भी बॉक्साइट खनन परियोजना के कारण उजाड़ दिया गया। विस्थापित होने वाले बैगा परिवारों का तब गाँव ही नहीं उजड़ा बल्कि उनसे उनके जीने-खाने के साधन, नदी पहाड़, जंगल भी छूट गए। तब सहारे की तलाश में करीब 15 किलोमीटर दूर तरेगांव जंगल क्षेत्र में आकर यह परिवार बस गए। इन परिवारों ने मिलकर जंगल के भीतर एक नया गाँव ‘इन्द्रीपानी’ बसाया।

इसी दौर में छत्तीसगढ़ में ग्रामोदय संस्था का कार्य भी शुरू हुआ। जैसे-जैसे इन्द्रीपानी गाँव बस रहा था, वैसे-वैसे ग्रामोदय की टीम भी समुदाय के साथ जुड़ती गई। वह समय अत्यंत पीड़ादायक था,रहने के लिए घर नहीं, आजीविका का कोई स्थायी साधन नहीं, भोजन और पानी की समस्या अलग, और जंगलों से जुड़ा आदिवासी जीवन कई तरह की समस्याओं से घिरा हुआ था। इस परिस्थिति में ग्रामोदय ने सहारे का हांथ आगे बढ़ाया। बैगा समुदाय के मुखिया के नेतृत्व में ग्रामोदय की टीम ने लोगों के साथ मिलकर घर बनाने से शुरुआत की। धीरे-धीरे लोगों ने बसाना शुरू किया।

ग्रामीणों के साथ निरंतर रूप से जुड़ाव बनाए रखने के लिए सामुदायिक बैठकों की प्रक्रिया अपनायी गई। इस समूह के साथ मिलकर गाँव की बुनियादी जरूरतों पर काम किया गया जिसमें पीने के पानी के लिए हैंडपंप, बच्चों की शिक्षा के लिए विद्यालय, छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी, आने-जाने के लिए सड़क और जल निस्तार के लिए सामुदायिक तालाब निर्माण हेतु वर्षों तक प्रयास किए गए। स्थानीय पंचायत और शासन के सहयोग से आज गाँव में ये सभी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

यह यात्रा आसान नहीं थी। लंबे संघर्ष, धैर्य और सामूहिक प्रयासों से धीरे-धीरे गाँव ने अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा किया। लेकिन इसके बावजूद एक नई चुनौती सामने थी-जंगलों पर घटती निर्भरता के कारण आजीविका और भोजन की विविधता का संकट। इसी समस्या के समाधान के लिए समुदाय और ग्रामोदय की टीम ने मिलकर विचार किया कि गाँव के सामुदायिक तालाब में मछलीपालन शुरू किया जाए, ताकि भोजन और आजीविका के लिए ठोस वैकल्पिक माध्यम मिल सके। तब कुछ परिवारों ने ग्राम पंचायत से सहमति लेकर गांव के तालाब में मछली पालन करना शुरू किया। लेकिन बैगा परिवारों ने कभी तालाब में वैज्ञानिक तरीके से मछलीपालन नहीं किया था। वे तो सदियों से नदियों, झरनों और नालों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाली मछलियों का ही उपयोग करते थे। उनका अनुभव बिल्कुल नया था,इसमें रात में मछलियों की चोरी होने की घटना और तकनीकी जानकारी की कमी ने उन्हें निराश भी किया। समय पर मछली बीज नहीं मिल पाना भी एक बड़ी चुनौती रही है।

मछली पालन के लिए मिली विभागीय मदद

ऐसे में ग्रामोदय की टीम ने इस समस्या के समाधान की दिशा में काम शुरू किया। मत्स्य पालन विभाग के सहयोग से समुदाय को वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन का प्रशिक्षण दिलाया गया। बैगा समूह को विभागीय समन्वय से मछली बीज और जाल दिया गया। इससे मछली पालन का काम चल पड़ा। इस दिशा में वर्ष 2023 में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई। मछलियों की चोरी रोकने और सामुदायिक स्वामित्व सुनिश्चित करने के लिए जिला कलेक्टर और उप संचालक, मत्स्य पालन विभाग को बार-बार आवेदन और निवेदन किए गए। अंततः शासन द्वारा बैगा समूह को 10 साल के लिए तालाब की लीज प्रदान की गई। आज इन्द्रीपानी में एक नई सुबह दिखाई देती है। पूरा गाँव मत्स्य पालन समिति से जुड़कर सामूहिक और व्यवसायिक मछलीपालन कर रहा है। लोग अब अपनी जरूरत के अनुसार मछलियाँ खाते भी हैं और अच्छी कीमत पर बेचकर आय भी अर्जित कर रहे हैं। गाँव के मत्स्यपालक समूह ने बैंक में अपना बचत खाता भी खोला है, जिसमें अब तक 25 हजार रुपये से अधिक की बचत जमा हो चुकी है।

इन्द्रीपानी की यह कहानी केवल मछलीपालन की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस समुदाय के सीख, संघर्ष और सामूहिक शक्ति की मिसाल है, जिसने चुनौतियों के बीच नए ज्ञान और कौशल को अपनाकर आजीविका के नए रास्ते तैयार किए हैं। विस्थापन के संकट से उभर कर अपने गाँव, आजीविका और बुनियादी सुविधाओं की पुनर्स्थापना करते इन्द्रीपानी के बैगा परिवार आसपास के कई गांव के लिए एक मिसाल बन चुके हैं। लेकिन वे अभी यहां पहुंचकर रुक नहीं गए हैं बल्कि वे मछली पालन को अधिक व्यावसायिक बनाने के लिए नई तकनीकि और अवसर तलाश रहे हैं।

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