अक्टूबर 2026

छीपा कला के पुर्नजीवन की ‘आशा’

छीपा कला कपड़ों पर रंगकारी की एक ऐसी कला जो कई सौ सालों में फली-फूली आगे बढ़ी। तकरीबन पचास साल पहले मशीनों के बढ़ते प्रयोग से बेदम होती चली गई। तकरीबन गायब ही हो गई। इसको अपनाने वाले परिवारों के आगे रोजी-रोटी का संकट होता चला गया, वे कोयला खदानों में मजदूर बन गए या किसी और काम में लग गए।

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पढ़ाई का सपना पूरा करने सास ने दी हिम्मत

अक्सर समाज में सास और बहू के रिश्ते को अलग नजर से देखा जाता है, लेकिन मेरे लिए मेरी सासू माँ एक सहारा बनकर सामने आईं। उन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए न केवल प्रेरित किया, बल्कि हर कदम पर मेरा साथ भी दिया, इसी का नतीजा है कि मैं आज मैं 12 वीं की पढ़ाई कर रही हूं। यह कहानी है एक ऐसी बहू की जिसे कम उम्र में विवाह के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

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कंचन की हरी उम्मीद

जयपुर जिले के किशनगढ़ रेनवाल की एक साधारण महिला कंचन ने अपनी बीमारी और कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया। एक बीमारी के कठिन अनुभव ने उसे न सिर्फ खुद बदलने के लिए प्रेरित किया, बल्कि पूरे समुदाय में एनीमिया को खत्म करने के लिए पोषण बाग आंदोलन चलाने का रास्ता दिखाया। कंचन ने 155 परिवार में पोषण बाग तैयार कराने में भूमिका निभायी है जिससे महिलाओं और किशोरियों का स्वास्थ्य बेहतर हो रहा है।

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उजाले की शाला

सन् 1992 की बात है। झाबुआ जिला मध्यप्रदेश के छोटे से गांव “काली घाटी” में सूरज ढलते ही सब सन्नाटा हो जाता था। खेतों में दिनभर काम करने वाले बच्चों की आंखों में पढ़ने का सपना था, पर उनके हाथों में कलम की जगह हल था। स्कूल की घंटी उनके लिए पराई थी, क्योंकि सुबह होते ही उन्हें पशुओं को चराने जाना पड़ता था।

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एक ठंडी रात ने बदल दी जिंदगी

2016 में 41 वर्षीय नरेंद्र की जिंदगी सामान्य थी। वह एक बुक शॉप चलाते थे। उनके पिता रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी थे। परिवार के साथ उनका जीवन आराम से चल रहा था। उन्होंने कभी किसी बड़े उतार-चढ़ाव का सामना नहीं किया था। लेकिन किस्मत ने कुछ और तय कर रखा था। उन्होंने कभी सामाजिक क्षेत्र के बारे में सोचा भी नहीं था।

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