छीपा कला के पुर्नजीवन की ‘आशा’

राकेश कुमार मालवीय
विकास संवाद समिति, भोपाल, मध्यप्रदेश

छीपा कला कपड़ों पर रंगकारी की एक ऐसी कला जो कई सौ सालों में फली-फूली आगे बढ़ी। तकरीबन पचास साल पहले मशीनों के बढ़ते प्रयोग से बेदम होती चली गई। तकरीबन गायब ही हो गई। इसको अपनाने वाले परिवारों के आगे रोजी-रोटी का संकट होता चला गया, वे कोयला खदानों में मजदूर बन गए या किसी और काम में लग गए। तकरीबन 15 साल पहले दो युवाओं के मन में यह बात पैठी और शुरू हुआ एक मिशन, इस खोई कला को पुर्नजीवित करने का। पिछले दस-बारह सालों में यह अभियान सचमुच एक नई आशा साबित हुआ है।

मप्र के छिंदवाड़ा शहर में आरती और रोहित रुसिया का घर, घर कम वर्कशॉप ज्यादा लगता है। घर के ऊपरी दो तलों पर यह वर्कशॉप हैं जहां दो कमरों में हजारों लकड़ी के बने छापे मौजूद हैं, और बाकी हिस्सों में छपाई और अन्य कार्य संपन्न होते हैं। यह पिछले दस सालों की मेहनत का सुफल है। कई मेजे लगी हैं, जिन पर कारीगर रंगों से एक-एक छापा लगाने का काम करते हैं। साड़ी, कुर्ते, दुपट्टे और ऐसे वस्त्र, जिन पर मेहनत की चमक अलग ही शान बिखरेती है।

आरती और रोहित की कहानी दिलचस्प है और प्रेरक भी। यूं तो रोहित नें फार्मास्युटिकल की पढ़ाई की, और दवा निर्माण के क्षेत्र में काम भी कर रहे थे। 2010 में उन्हें पक्षाघात हुआ। ऐसा समय किसी को निराशा में डालता है, पर रोहित ने इस वक्त एक सकारात्मक सोच रखी। अपने आसपास की चीजों को गौर से देखा। बचपन की चित्रकला और रचनाधर्मिता को गति दी। और तभी यह विचार भी आया कि विलुप्त होती छीपा कला पर ही पूरा समय लगाया जाए। इस विचार को उनकी पत्नी आरती का भी पूरा साथ मिला। चूंकि रोहित खुद पारंपरिक छीपा परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके दादा दुर्गाप्रसाद खुद भी एक छीपा कलाकार हैं और इस सतपुड़ा अंचल में आज छीपा समुदाय के अकेले बुजुर्ग कलाकार हैं। ऐसे तीन सौ पारंपरिक छीपा कारीगरों के परिवार अकेले सावनेर कस्बे में थे (सीपी एंड बरार के विघटन के बाद सावनेर महाराष्ट्र का हिस्सा बना और छिंदवाड़ा और अन्य कस्बे / शहर मध्यप्रदेश का हिस्सा) और इतने ही परिवार आसपास के अंचल जैसे छिंदवाड़ा, बैतूल, नरसिंहपुर, गाडरवाड़ा, पिपरिया आदि जगहों पर अपनी परंपरागत छीपा कला के काम में लगे हुए थे, जो समय के साथ दूसरे काम धंधों में चले गए। तकरीबन चालीस साल पहले यह काम इस पूरे सतपुडा अंचल से पूरी तरह खत्म हो चुका था।

छीपा कला को पुनर्जीवन देने की तैयारी शुरू की और आशा (ऐड एंड सर्वाइवल ऑफ हेंडिक्राफ्ट्स आर्टिसन्स) नाम से प्रकल्प गठित किया, जिसे सामाजिक उद्यमिता (social entrepreneurship) कहना सही होगा। इस प्रकल्प का उद्देश्य इस विलुप्त होती कला को एक नया जीवन देने के साथ साथ ग्रामीण आदिवासी महिलाओं मुख्यधारा से जोड़ना और स्थानीय बुनकरों को रोजगार मुहैया कराना है। पहले यह काम कठिन था, पुराने छापे जमा करना, नए तैयार करवाना, कलाकारों को खोजना, नए शिल्पियों को तैयार करना, नए जमाने के हिसाब से सूती कपड़ा, रंग, डिजाइन सभी का समन्वय बैठाना और फिर मार्केट. भी तलाशना, एकदम आसान नहीं था।

2015 में अंचल के पारंपरिक बुनकरों को भी साथ लिया ताकि स्थानीय स्तर पर कपड़ों की आपूर्ति हो सके और बुनकरों का रोजगार भी बढ़ सके। रोहित कहते हैं कि इसमें काफी मुश्किलें भी आई, एक समय लगता था कि आगे कर पाएंगे या नहीं, पर धीरे-धीरे लोगों का, मित्रों का, कलाप्रेमियों का, संस्थाओं का सहयोग मिलता गया। सतपुड़ा अंचल के पारंपरिक छीपा शिल्पियों की बस्तियां नदियों के किनारे ही हुआ करती थी, जो प्राकृतिक रंगों से रंगाई और छपाई किया करते थे। हरड, लोहे, फिटकरी, मंजीठ, धावडा फूल, आल की जड़, अनार आदि का प्रयोग किया जाता था।

स्थानीय लोगों के लिए तैयार किए जाने वाले कपड़ों पर प्रकृति से प्रेरित प्रतीक चिन्हों जैसे बेलपान, कैरी, सांकल बूटा, चौक बूटा,गुलबकावली, चंबू बूटा, देवल की धडी, फूल धडी, कुंदरू की धडी, कीर कौवे की कोर, पीपल पान आदि से डिजाइन तैयार फडिया, रजाई आदि वस्त्र तैयार किये जाते थे। अभी प्राकृतिक रंगों के साथ साथ पिगमेंट रंगों का भी प्रयोग किया जाता है जिससे पानी की बचत की जा सके। आरती रुसिया ने पारम्परिक ब्लॉक्स के अलावा भी साड़ियों पर ब्लॉक प्रिंटिंग के कई नए प्रयोग किए हैं जैसे ज्यामितीय डिजाइन, एबस्ट्रेक्ट डिजाइन, रोहित और अन्य कलाकारों की पेंटिंग और स्केच भी ब्लॉक के माध्यम छापे जा रहे हैं। आर्डर आने लगे पर उससे अधिक तसल्ली यह थी कि हम अपनी विलुप्त होती पारंपरिक कला को जीवन देते जा रहे थे। रोहित ने घूम घूम कर कई तरह की लोककलाओं को भी देखा समझा और उन्हें ब्लॉक पर प्रिन्ट करवाया, जैसे गोंडवाना अंचल के विलुप्त होते पारंपरिक आदिवासी गोदना प्रतीक चिन्ह छीपा कला के माध्यम से अब कपड़ों पर भी दिखाई दे रहे हैं।

आशा में अब तकरीबन दस ग्रामीण आदिवासी महिला कलाकार जुड़कर काम करते हैं, बहुत से पारंपरिक बुनकर भी जुड़े हैं, जिन्हें रोजगार मिल रहा है। हालांकि मशीनों की तुलना में यह सब कम लागत पर कर पाना अपने आप में एक चुनौती है, पर कला के कदरदानो से यह सफर चल रहा है।

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