सूदखोरी का जाल तोड़ती ‘धोड़ी बैंक

दीपक पाटीदार
महिला शक्ति संघ,  झाबुआ, मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल झाबुआ जिले में एक समय ऐसा था जब सूरज ढलने के बाद केवल रात का अंधेरा ही नहीं, बल्कि कर्ज का काला साया भी गहरा जाता था। यहां गरीबी केवल फटे हुए कपड़ों या खाली थाली का नाम नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसी नियति बन चुकी थी जिससे निकलना नामुमकिन लगता था। लेकिन आज, उसी झाबुआ की माटी से एक ऐसी गूंज सुनाई दे रही है जिसने ‘काली बैंक’ के शोषणकारी तंत्र को उखाड़ फेंका है। यह कहानी है ‘धोड़ी बैंक’ (सफेद बैंक) की और उन 6,000 से अधिक महिलाओं की, जिन्होंने संगठित होकर गरीबी के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है और रू 2.5 करोड़ के वित्तीय प्रबंधन की नींव रखी है।

अस्सी के दशक में झाबुआ के ग्रामीण अंचलों में सूदखोरी की व्यवस्था को स्थानीय भाषा में ‘काली बैंक’ कहा जाता था। नाम के अनुरूप ही इसका काम भी काला और डरावना था। आदिवासी समाज में जब किसी को बीमारी, शादी-ब्याह या खेती के लिए बीज-खाद की तत्काल आवश्यकता होती, तो उनके पास इन साहूकारों के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

यहां ऋण देने का गणित शोषण की पराकाष्ठा था। अगर कोई 100 रुपये कर्ज मांगता, तो उसे हाथ में केवल 90 रुपये मिलते थे-10 रुपये अग्रिम ब्याज के रूप में पहले ही काट लिए जाते थे। लेकिन उसे लौटाने 110 रुपये पड़ते थे। वसूली का आलम यह था कि साहूकार सुबह 5 बजे ही दरवाजे पर दस्तक दे देते थे। पैसे न होने पर मवेशी, बर्तन यापुश्तैनी जमीन तक गिरवी रख ली जाती थी। यह व्यवस्था गरीबी को कम करने के बजाय उसे एक अंतहीन चक्रव्यूह में बदल देती थी, जहां पिता का कर्ज बेटे के कंधों पर विरासत में मिलता था।

इस घुटन भरे माहौल में बदलाव की पहली किरण 1980 के दशक के उत्तरार्ध (1987) में दिखाई दी। जुनाखेड़ा गांव में एक छोटी सी चौपाल सजी, जहां ग्रामीणों ने अपनी नियति को बदलने का ऐतिहासिक फैसला किया। उन्होंने तय किया कि वे साहूकारों के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपना खुद का ‘ग्राम कोष’ बनाएंगे।

यही ‘ग्राम कोष’ आगे चलकर ‘धोड़ी बैंक’ (सफेद बैंक) कहलाया। इसकी शुरुआत महज़ रू. 2,000 के सामूहिक अंशदान से हुई थी। सिद्धांत सरल थाः ‘गांव का पैसा, गांव के लोगों के लिए और गांव के ही नियंत्रण में। यहां ब्याज दरें कम थी. प्रक्रिया पारदर्शी थी और सबसे बड़ी बात इसमें कर्जदार का सम्मान था। धीरे-धीर यह मॉडल आसपास के गांवों में फैल गया और भविष्य की ‘महिला शक्ति’ की मजबूत नींव बना।

धौड़ी बैंक ने रास्ता दिखाया, लेकिन उसे एक राष्ट्रव्यापी मिसाल बनाने का श्रेय झाबुआ की ग्रामीण महिलाओं को जाता है। समय के साथ पुरुषों द्वारा शुरू की गई इस पहल की कमान महिलाओं ने धामी और जन्म हुआ ‘महिला शक्ति संघ’ का। 1987 में बोया गया वह छोटा सा बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है आज इस संगठन से 40 से अधिक गांवों की 6,000 से ज्यादा महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हैं। वर्तमान में इस समूह द्वारा लगभग 2.5 करोड़ की राशि ऋण के रूप में वितरित की जा चुकी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह 2.5 करोड़ केवल सरकारी अनुदान नहीं है, बल्कि यह उन महिलाओं की अपनी मेहनत की कमाई और चंद रुपयों की छोटी-छोटी बचतों का परिणाम है। यह अब एक आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन चुका है।

अड़जी-पड़जी परंपरा का पुनर्जीवन

खेती में एक-दूसरे की मदद करने की प्राचीन परंपरा अड़जी- पड़जी को फिर से जीवित किया गया है। इससे मजदूरों पर होने वाला खर्च बचता है और गांवों में आपसी भाईचारा बढ़ता है। इन सामूहिक प्रयासों और बचतों के कारण प्रत्येक परिवार अब सालाना 20,000 से 30,000 की अतिरिक्त बचत कर पा रहा है। महिला शक्ति संघ का प्रभाव केवल बैंक बैलेंस या तिजोरियों तक सीमित नहीं रहा। इन महिलाओं ने ग्रामीण समाज की जड़ों में जमी कुरीतियों पर भी कड़ा प्रहार किया है- शादियों और मृत्यु भोज जैसे सामाजिक आयोजनों में होने वाले अनावश्यक खर्चों को कम करने के लिए संघ ने सामूहिक निर्णय लिए हैं। इससे परिवारों पर कर्ज का बोझ कम हुआ है। वहीं 2.5 करोड़ के ऋण वितरण ने गांवों में स्वरोजगार की ऐसी बाढ़ ला दी है कि महिलाएं अब केवल गृहणी नहीं, बल्कि कुशल प्रबंधक और उद्यमी बन चुकी हैं।

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