जैविक खेती की ओर दूदू के किसान

जगवीर सिंह
सामाजिक प्रेरणा एवं ग्रामीण विकास संस्थान (SPGVS), जयपुर, राजस्थान

दूदू की यह कहानी केवल खेती के बदलाव की नहीं, बल्कि एक पूरे समाज के बदलते जीवन की कहानी है। रासायनिक खेती के कारण बिगड़ती जमीन, पलायन करते युवा और बढ़ते अपराध के बीच एक नई राह की शुरुआत होती है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे सही मार्गदर्शन और सामूहिक प्रयास से न केवल खेती, बल्कि युवाओं का भविष्य भी बदला जा सकता है।
जयपुर जिले का टूटू ब्लॉक कभी अपनी उपजाऊ मिट्टी और लहलहाती फसलों के लिए जाना जाता था। लेकिन समय के साथ खेती का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। किसानों ने पैदावार बढ़ाने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। शुरुआत में फसलें अच्छी हुई, लेकिन कुछ ही सालों में इसके गंभीर परिणाम सामने आने लगे। मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता खत्म होने लगी और वह सख्त हो गई। खेती की लागत हर साल बढ़ती गई, जबकि मुनाफा लगातार गिरता गया। कर्ज के बोझ तले दबे किसानों के लिए खेती अब एक घाटे का सौदा बन चुकी थी। जब खेती में भविष्य अंधकारमय दिखने लगा, तो दूदू की नई पीढ़ी ने मिट्टी से मुंह मोड़ लिया। बेहतर जीवन की तलाश में यहां के युवा खेती छोड़कर आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों के कारखानों में मजदूरी करने के लिए पलायन करने लगे, लेकिन इस चकाचौंध के पीछे की सच्चाई बहुत कड़वी थी।
कारखानों में 10-12 घंटे की हाड़-तोड़ मेहनत, कम वेतन और अमानवीय कार्य परिस्थितियों ने युवाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया। इस हताशा, तनाव और अकेलेपन से बचने के लिए टूटू के कई युवा नशे की गिरफ्त में आ गए। शराब, गांजा और अन्य मादक पदार्थों की लत ने उनकी सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर कर दिया। नशे की इस लत को पूरा करने के लिए जब कारखाने की मामूली पगार कम पड़ने लगी, तो युवाओं ने अपराध का रास्ता अपना लिया। चोरी, लूटपाट और आपसी झगड़ों के मामले तेजी से बढ़ने लगे। टूटू. जो कभी शांति और भाईचारे के लिए जाना जाता था, अब युवाओं की बर्बादी और बढ़ते अपराध के कारण आंसू बहा रहा था। परिवार टूट रहे थे और बुजुर्ग अपनी आंखों के सामने अपने जवान बेटों को बर्बाद होते देख बेबस थे।
इसी घोर निराशा के बीच सामाजिक प्रेरणा एवं ग्रामीण विकास संस्थान (SPGVS) नामक एक गैर-सरकारी संगठन ने स्थिति को समझा और यह महसूस किया कि युवाओं को अपराध और नशे के दलदल से बाहर निकालने का एकमात्र तरीका उन्हें उनकी जड़ों, यानी खेती से दोबारा जोड़ना है, लेकिन इस बार एक नए और लाभकारी रूप में। संस्था ने सबसे पहले किसानों का विश्वास जीतने का प्रयास किया और उन्हें रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों के बारे में विस्तार से समझाया। वर्ष 2021 से संस्था ने टूटू ब्लॉक के 1300 किसानों को एक साथ जोड़कर एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया और उन्हें प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण देना शुरू किया। किसानों को यूरिया और डीएपी जैसी रासायनिक खादों
को छोड़कर जीवामृत, बीजामृत, केंचुआ खाद और गाय के गोबर का उपयोग करना सिखाया गया। बाजार से महंगे रसायन न खरीदने के कारण खेती की लागत लगभग शून्य हो गई। कुछ ही समय में मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ने लगी और खेत फिर से उपजाऊ होने लगे। बिना जहर के उगाई गई फसलें न केवल किसानों के स्वास्थ्य के लिए बेहतर थीं, बल्कि बाजार में भी उनकी मांग बढ़ने लगी।
संस्था का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम युवाओं की मानसिकता में बदलाव लाना था। संस्था जानती थी कि युवा तभी वापस गांव लौटेंगे जब उन्हें खेती में मजदूर नहीं, बल्कि मालिक बनने का अवसर मिलेगा। इसी सोच के साथ संस्था ने कारखानों से लौटे और गांव में बेरोजगार बैठे युवाओं को कृषि उद्यमी बनने का प्रशिक्षण देना शुरू किया। युवाओं को यह सिखाया गया कि वे अपनी फसलों को सीधे मंडी में बिचौलियों को बेचने के बजाय उनका मूल्यवर्धन कैसे करें। प्राकृतिक रूप से उगाई गई सरसों से शुद्ध कच्ची घानी का तेल निकालना, गिर गाय का शुद्ध घी तैयार करना, दालों और मसालों की साफ-सफाई, उनकी ब्रांडिंग और आकर्षक पैकेजिंग करके उन्हें सीधे जयपुर और अन्य बड़े शहरों के ग्राहकों और सुपरमार्केट तक पहुंचाना सिखाया गया।
आज दूदू की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। जो युवा कल तक कारखानों के धुएं और नशे के अंधकार में खोए हुए थे, वे आज अपने खुद के कृषि-आधारित व्यवसाय शुरू कर रहे हैं। जब उनकी जेब में सम्मानजनक कमाई आने लगी, तो नशे की लत और अपराध का ग्राफ अपने आप नीचे आने लगा। एस.पी.जी.वी.एस. और 1300 किसानों की इस एकजुटता ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही दिशा, तकनीकी ज्ञान और उद्यमिता का साथ मिले, तो खेती आज भी सबसे उत्तम और लाभकारी व्यवसाय बन सकती है
