जब ग्राम सभा में पहुंचने लगी महिलाएं

शंकर लाल राणा
नई दिशा, हजारीबाग, झारखंड

यह कहानी झारखंड के हजारीबाग जिले के ग्राम पंचायत बच्छई की है, जहां कभी ग्राम सभा केवल औपचारिकता बनकर रह गई थी। महिलाओं की भागीदारी बेहद कम थी और उनके मुद्दे अनसुने रह जाते थे। लेकिन जागरूकता, प्रशिक्षण और निरंतर प्रयासों से वही ग्राम सभा आज महिलाओं के नेतृत्व और सक्रिय भागीदारी का सशक्त मंच बन चुकी है।
झारखंड के हजारीबाग जिले के चौपारण प्रखंड की बच्छई पंचायत में कुछ साल पहले तक ग्राम सभा की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। बैठकें तो नियमित रूप से होती थीं, लेकिन उनमें भागीदारी सीमित रहती थी। गांव के कुछ ही लोग इन बैठकों में शामिल होते थे और अधिकतर निर्णय भी वही कुछ लोग ले लेते थे। बाकी लोगों की भूमिका केवल उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित थी, और रजिस्टर में कार्यवाही लिख दी जाती थी। इस पूरी प्रक्रिया में सामूहिक भागीदारी और पारदर्शिता का अभाव साफ दिखाई देता था।
वर्ष 2022 तक की स्थिति यह थी कि हर ग्राम सभा में औसतन 40 से 50 लोग शामिल होते थे, लेकिन उनमें महिलाओं की संख्या मात्र 5 से 10 प्रतिशत तक ही सीमित रहती थी। जो महिलाएं आती भी थीं, वे अधिकतर चुपचाप बैठी रहती थीं। उनके मन में कई सवाल और समस्याएं होती थीं-पानी की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति, बच्चों की शिक्षा, आंगनवाड़ी केंद्रों की समस्याएं। लेकिन इन मुद्दों को कभी भी ग्राम सभा के एजेंडा में जगह नहीं मिल पाती थी। महिलाओं की उपस्थिति तो थी, लेकिन उनकी आवाज़ कहीं खो जाती थी। फिर वर्ष 2023 में इस पंचायत में बदलाव की एक नई शुरुआत हुई, जब “नयी दिशा संस्था” ने यहां काम करना शुरू किया। संस्था का उद्देश्य केवल महिलाओं की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें जागरूक, आत्मविश्वासी और अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाना था। इसके लिए गांव-गांव में छोटी- छोटी बैठकों का आयोजन किया गया। इन बैठकों में महिलाओं को सरल भाषा में समझाया गया कि ग्राम सभा क्या होती है, ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) में उनकी क्या भूमिका है और वे अपने मुद्दों को प्रभावी तरीके से कैसे सामने रख सकती हैं।
शुरुआत में यह प्रक्रिया आसान नहीं थी। कई महिलाएं हिचकिचाती थीं, कुछ को घर से अनुमति नहीं मिलती थी और कुछ को यह विश्वास ही नहीं था कि उनकी बात सुनी जाएगी। वर्षों से चली आ रही चुप्पी को तोड़ना एक दिन का काम नहीं था। लेकिन संस्था के लगातार संवाद, प्रशिक्षण और प्रेरणा से धीरे-धीरे यह झिझक कम होने लगी। वर्ष 2024 तक आते-आते बदलाव के संकेत स्पष्ट दिखाई देने लगे। ग्राम सभा में महिलाओं की भागीदारी बढ़कर लगभग 35 प्रतिशत हो गई। अब महिलाएं केवल बैठने नहीं आती थीं, बल्कि सवाल पूछने लगी थीं, अपनी समस्याओं को खुलकर साझा करने लगी थीं। उनके भीतर आत्मविश्वास का संचार होने लगा था।
इसके बाद वर्ष 2025 में यह बदलाव और मजबूत हुआ। महिलाओं की उपस्थिति बढ़कर 50 से 55 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह केवल संख्या में वृद्धि में वृद्धि नहीं थी, बल्कि यह उस सोच में बदलाव का प्रतीक था, जहां महिलाएं अब निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनने लगी थीं। उनकी आवाज़ को सुना जाने लगा था और उनके मुद्दों को गंभीरता से लिया जाने लगा था। वर्ष 2026 में यह परिवर्तन एक नए स्तर पर पहुंच गया। अब ग्राम सभा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 70 प्रतिशत तक हो गई थी। यह एक ऐतिहासिक बदलाव था, जिसने पूरी पंचायत की कार्यप्रणाली को बदलकर रख दिया। जहां पहले ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) में महिलाओं से जुड़े केवल 2-3 मुद्दे शामिल होते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 10-12 तक पहुंच गई।
अब ग्राम सभा में पेयजल की समस्या, आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थिति, स्कूलों में शौचालय, स्वच्छता और महिलाओं के लिए आजीविका के अवसर जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाने लगे। इन मुद्दों पर न केवल चर्चा होती थी, बल्कि उनके समाधान के लिए ठोस योजनाएं भी बनाई जाने लगीं। पंचायत स्तर पर अब काम भी दिखने लगा-जहां सड़क की जरूरत थी, वहां सड़क बनाई गई; जहां पानी की समस्या थी, वहां चापानल और जल मीनार लगाए गए। इन कार्यों में महिलाओं की निगरानी और भागीदारी भी बढ़ी, जिससे कार्यों की गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित हुई।
अब ग्राम सभा केवल एक औपचारिक बैठक नहीं रह गई थी। यह एक ऐसा मंच बन चुका था, जहां निर्णय किसी एक या दो व्यक्तियों द्वारा नहीं लिए जाते थे, बल्कि सामूहिक रूप से, विशेषकर महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के साथ लिए जाते थे। इस बदलाव को सबसे अच्छी तरह एक महिला, चंचला देवी, के शब्दों में समझा जा सकता है। उन्होंने एक ग्राम सभा में खड़े होकर कहा, “पहले हम यहां सिर्फ बैठने आते थे, अब हम अपनी बात रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि वह योजना में शामिल हो।” यह वाक्य केवल एक भावना नहीं, बल्कि पूरे परिवर्तन की कहानी बयां करता है। आज बच्छई पंचायत की ग्राम सभा एक जीवंत और सशक्त मंच बन चुकी है, जहां महिलाएं न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं, बल्कि विकास की दिशा भी तय करती हैं।
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जब सही मार्गदर्शन, निरंतर प्रयास और समुदाय का सहयोग मिलता है, तो सबसे बड़ी सामाजिक चुप्पी भी आवाज़ में बदल सकती है।
