‘हाथ सिर्फ मेहंदी नहीं, अब ऑइल से भी सना करेंगे’

निशांत फितूरी
स्पंदन समाजसेवा समिति, खंडवा, मध्यप्रदेश

खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक के छोटे से गांव सांवलीखेड़ा की रहने वाली गायत्री कासदे आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हौसले, आत्मनिर्भरता और नारी सशक्तिकरण की मिसाल बन चुकी हैं।
मात्र 8वीं तक पढ़ी गायत्री ने समाज की उन सोचों को चुनौती दी, जो यह मानती थीं कि लड़कियों का काम केवल घर संभालना है। आज वही गायत्री बड़े आत्मविश्वास से कहती हैं –
लड़कियां सिर्फ चूड़ियां पहनने के लिए नहीं बनीं, उनके हाथ औजार उठाकर जिंदगी बदलने की ताकत भी रखते हैं।
खालवा ब्लॉक का अधिकांश हिस्सा आज भी रोजगार के सीमित अवसरों से जूझ रहा है। यहां हर साल बड़ी संख्या में परिवार मजदूरी की तलाश में महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। गायत्री का परिवार भी उन्हीं हजारों परिवारों में शामिल था, जिनकी जिंदगी रोज कमाने और रोज खाने के संघर्ष में बीतती थी।
गायत्री भी अपने परिवार के साथ पलायन पर जाती थीं।
कभी ईंट-भट्टों पर काम, कभी खेतों में मजदूरी और कभी निर्माण स्थलों पर कठिन श्रम- यही उनकी जिंदगी बन चुकी थी। लेकिन वर्ष 2020 में कोरोना महामारी ने इस संघर्ष को और भयावह बना दिया।
कोरोना लॉकडाउन ने पलायन करने वाले परिवारों की जिंदगी पूरी तरह रोक दी। काम बंद हो गया, मजदूरी छिन गई और हजारों लोग दूर राज्यों में फंस गए। महिलाओं की स्थिति सबसे ज्यादा कठिन थी।
कई महिलाओं के सामने परिवार के भोजन की व्यवस्था करने तक का संकट खड़ा हो गया। छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, बीमारी का डर, पैदल सफर की मजबूरी और आर्थिक असुरक्षा ने उन्हें मानसिक रूप से भी तोड़ दिया।गायत्री बताती हैं कि उस समय कई दिनों तक ठीक से भोजन नहीं मिल पाता था। बाहर के राज्यों में रहने वाली महिलाओं को असुरक्षा, भेदभाव और असहायता का सामना करना पड़ा। मजदूरी बंद होने से परिवारों के पास घर लौटने तक के पैसे नहीं थे।
इसी दौर ने गायत्री को यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर जिंदगी बदलनी है, तो दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद हुनर सीखना होगा। इसी कठिन समय में स्पंदन समाज सेवा समिति की डायरेक्टर सीमा प्रकाश ने पलायन और बेरोजगारी से जूझ रही लड़कियों के लिए ‘कर्मयोगिनी’ कार्यक्रम शुरू किया।
इस पहल का जय उन लड़कियों को हुनर देना था, जिन्होंने किसी कारण से पढ़ाई छोड़ दी थी और जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहती थीं।
कार्यक्रम के तहत लगभग 70 लड़कियों को मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिशियन, ब्यूटी पार्लर और मोटर साइकिल मैकेनिक जैसी ट्रेनिंग दी गई। जहां अधिकांश लड़कियों ने पारंपरिक कोर्स चुने, वहीं गायत्री ने सबसे अलग रास्ता चुना मोटर साइकिल मैकेनिक बनने का।
जब गायत्री ने गैराज में ट्रेनिंग लेने की कोशिश की, तो खालवा के कई गैराज संचालकों ने साफ मना कर दिया।
किसी ने कहा –
“लड़कियां गाड़ी रिपेयर नहीं कर सकतीं।”
तो किसी ने कहा –
“यह लड़कों का काम है।”
लेकिन गायत्री ने हार मानने से इनकार कर दिया। आखिरकार एक मैकेनिक ‘बाबू भैया ने उनकी लगन को पहचाना और अपने गैराज में उन्हें काम सीखने का मौका दिया।
दो महीने तक गायत्री ने दिन-रात मेहनत की। ग्रीस से सने हाथ, भारी औजार और लोगों के ताने कुछ भी उनके हौसले को नहीं रोक पाया।
ट्रेनिंग पूरी होने के बाद स्पंदन संस्था ने गायत्री को टूल किट उपलब्ध कराई। पंचायत से मिली जगह पर उन्होंने अपना छोटा सा गैराज शुरू किया।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत और काम की गुणवत्ता ने लोगों का भरोसा जीत लिया।
आज गायत्री का गैराज पूरे खालवा ब्लॉक के सबसे उन्नत और चर्चित गैराजों में गिना जाता है। दूर-दूर के गांवों से लोग अपनी मोटर साइकिल और गाड़ियां ठीक कराने उनके पास आते हैं। वे प्रतिदिन 800 से 900 रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं।
सबसे खास बात यह है कि अब गायत्री सिर्फ खुद तक सीमित नहीं रहीं। वे दूसरी लड़कियों को भी मैकेनिक का काम सिखा रही हैं, ताकि और महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें। जिस परिवार को कभी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में भटकना पड़ता था, आज वहीं परिवार अपने गांव में सम्मान के साथ जीवन जी रहा है।
गायत्री ने अपने गैराज के साथ एक छोटी चाय की टपरी भी शुरू की है, जिसे उनकी भाभी संचालित करती हैं। इससे परिवार की आय और बढ़ी है और घर की दूसरी महिलाओं को भी रोजगार मिला है। आज स्थिति यह है कि उनके परिवार का कोई सदस्य पलायन पर नहीं जाता। गांव में रहकर ही वे सम्मानजनक आय कमा रहे हैं और दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर तैयार कर रहे हैं।
गायत्री की यह प्रेरणादायक यात्रा सिर्फ खालवा या खंडवा तक सीमित नहीं रही। उनकी कहानी को BBC News सहित देश के कई प्रमुख मीडिया संस्थानों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। उनकी सफलता आज इस बात का प्रमाण है कि अवसर और समर्थन मिले, तो गांव की बेटियां भी बड़े बदलाव की अगुवाई कर सकती हैं।
गायत्री कासदे की कहानी केवल एक महिला मैकेनिक बनने की कहानी नहीं है। यह कहानी है उस साहस की, जो सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ता है। यह कहानी है उस आत्मविश्वास की, जो कहता है कि हुनर का कोई लिंग नहीं होता। और यह कहानी है उस बदलाव की, जहां एक लड़की खुद आगे बढ़कर पूरे समाज की दिशा बदल देती है।
