अपनी विज़िबिलिटी बढ़ाने का सोच रहे हैं, पहले यह पढ़ें

पिछले दिनों मुझे स्टोरी टेलिंग के एक सेशन में संस्थाओं की  विज़िबिलिटी पर बात करने का अवसर मिला। बातचीत अच्छी रही, जो कुछ कह पाया, वह यहां भी शेयर कर रहा हूं। आशा है आपको उपयोगी लगेगा।  

राकेश कुमार मालवीय

एक संस्था की डिजिटल विज़िबिलिटी उसकी वेबसाइट, सोशल मीडिया, वीडियो, पॉडकास्ट और दूसरे डिजिटल माध्यमों से बन सकती है। उसकी मीडिया विज़िबिलिटी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के साथ उसके संबंधों तथा सार्वजनिक मुद्दों पर उसकी उपस्थिति से बनती है। सामुदायिक विज़िबिलिटी लोगों के बीच संस्था की विश्वसनीय पहचान से बनती है। सरकार, प्रशासन, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, दाताओं और साझेदारों के बीच संस्था की पहचान और विश्वसनीयता से विज़िबिलिटी का दायरा समृद्ध होता है। पर, इससे आगे एक और महत्वपूर्ण आयाम है आपके समाज के साथ काम करते हुए बने नॉलेज और विचारों की विज़िबिलिटी। संस्था के अनुभव, सीख, मॉडल और विचार जब विमर्श का हिस्सा बनते हैं, तब संस्था केवल दिखाई नहीं देती, बल्कि विमर्श को प्रभावित भी करती है। इसलिए शायद हमें यह पूछने की जरूरत कम है कि ‘हम कितने दिखाई दे रहे हैं?’ ज्यादा यह पूछने की जरूरत है कि “हम किन लोगों के बीच दिखाई दे रहे हैं और किस रूप में दिखाई दे रहे हैं?” यही सवाल विज़िबिलिटी को संचार (या कई मर्तबा केवल प्रचार) या संचार से निकालकर रणनीतिक संचार के दायरे में ले जाता है।

सीएसओज के संदर्भ में विज़िबिलिटी को अक्सर सोशल मीडिया, वेबसाइट या मीडिया में दिखाई देने तक सीमित कर दिया जाता है। जबकि वास्तविकता में विज़िबिलिटी की अवधारणा इससे कहीं ज्यादा व्यापक है। किसी संस्था का दिखाई देना केवल इस बात से तय नहीं होता कि उसके कितने फॉलोअर हैं, कितनी पोस्ट प्रकाशित हुई हैं या उसे कितनी मीडिया कवरेज मिली है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि संस्था किन लोगों के बीच दिखाई दे रही है, किस रूप में दिखाई दे रही है और उसके दिखाई देने से उसके काम, उसके आइडिया, उसके विचार और कुल जमा भूमिका की क्या और कैसी समझ बन रही है। याद रखें, विज़िबिलिटी केवल एक नंबर भर नहीं है।

सूचना से आख्यान की ओर

सामाजिक क्षेत्र में हमारे संचार का एक पारंपरिक तरीका रहा है समस्या, आंकड़े, गतिविधियां और रिपोर्ट। इसमें यह बताया जाता है कि समस्या क्या है, कितने लोग प्रभावित हैं, संस्था ने कितनी गतिविधियां कीं और कितने लोगों तक पहुंच बनाई। यह जानकारी जरूरी है, लेकिन अपने आप में यह लोगों को उस बदलाव से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है, जिसके लिए संस्था काम कर रही है।

यहीं स्टोरीटेलिंग महत्वपूर्ण हो जाती है। संचार का केंद्र केवल समस्या और गतिविधि न होकर इंसान, उसका अनुभव, संघर्ष, पहल, बदलाव, सीख और आगे का रास्ता बनना चाहिए। मसलन ‘हमने 500 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया’ एक महत्वपूर्ण सूचना है, लेकिन यह अपने आप में बदलाव की कहानी नहीं है। इसके बजाय यदि हम यह दिखा पाएं कि ‘महिलाओं ने कैसे प्रशिक्षण और सामूहिक प्रयास के बाद पहली बार पंचायत में अपने अधिकारों और योजनाओं को लेकर सवाल उठाना शुरू किया’, तो वहां सूचना के साथ अनुभव, प्रक्रिया और बदलाव का कथानक भी सामने आता है। यह अंदाज हमें बताता है कि क्या हुआ, जबकि एक अच्छी कहानी हमें समझाती है कि वह बदलाव लोगों के जीवन में किस तरह आया और उसका अर्थ क्या है।

कहानी का नायक कौन है?

सीएसओज के संचार में एक और महत्वपूर्ण बदलाव की जरूरत है। अक्सर संस्था स्वयं अपनी कहानी की नायक बन जाती है ‘हमने यह किया’, ‘हमने यह बदलाव लाया’, ‘हमने इतने लोगों तक पहुंच बनाई।‘ इससे संस्था की भूमिका तो सामने आती है, लेकिन समुदाय, उसकी अपनी पहल और बदलाव की वास्तविक प्रक्रिया पीछे छूट सकती है।

हमें कहानी का केंद्र संस्था से हटाकर समुदाय और बदलाव की ओर ले जाने की जरूरत है। इसका अर्थ यह नहीं कि संस्था की भूमिका को छिपाया जाए, बल्कि यह है कि संस्था अपने योगदान को उस व्यापक प्रक्रिया के संदर्भ में रखे, जिसमें समुदाय स्वयं बदलाव का भागीदार और कई बार नेतृत्वकर्ता होता है। इसलिए “हमने क्या किया” के साथ-साथ यह दिखाना अधिक महत्वपूर्ण है कि लोगों ने क्या बदला, उन्होंने कैसे बदला, इस प्रक्रिया में क्या कठिनाइयां आईं और इससे क्या सीख मिली। ऐसा कथानक संस्था को अधिक विश्वसनीय और मानवीय बनाता है। जब किसी पहल में सारे संबंधित लोगों को जोड़ा जाता है तो उसकी विश्सनीयता उतनी ही बढ़ती जाती है।

केवल रोज पोस्ट डालना सोशल मीडिया नहीं

सोशल मीडिया ने सीएसओज के लिए संचार की संभावनाओं को बहुत बढ़ाया है, लेकिन अभी भी कई संस्थाओं के लिए सोशल मीडिया का अर्थ नियमित रूप से पोस्ट डालना भर है। सोशल मीडिया संस्था के लिए केवल सूचना प्रसारित करने का माध्यम नहीं, बल्कि संवाद, समुदाय से जुड़ने, युवाओं तक पहुंचने, संस्थागत पहचान बनाने, विचार और दृष्टिकोण रखने तथा साझेदारी और सहयोग विकसित करने का माध्यम भी हो सकता है। इसके लिए केवल नियमितता पर्याप्त नहीं है। प्रभावी सोशल मीडिया संचार के लिए निरंतरता, गुणवत्ता और सहभागिता तीनों जरूरी हैं। महत्वपूर्ण यह है कि जो सामग्री साझा की जा रही है वह उपयोगी, विश्वसनीय, प्रासंगिक हो और लोगों को सोचने, प्रतिक्रिया देने या संवाद करने के लिए प्रेरित करे।

संस्था की अपनी संचार पूंजी

हर सामाजिक—नागरिक संस्था के पास एक व्यवस्थित कम्युनिकेशन बैंक होना चाहिए। संस्था के वर्षों के काम में ऐसी सामग्री निकलती है, जिसे अक्सर अलग-अलग फाइलों, मोबाइल फोन, रिपोर्टों और व्यक्तिगत कंप्यूटरों में बिखरा हुआ छोड़ दिया जाता है। एक व्यवस्थित संचार बैंक में अच्छी कहानियां, फोटो, छोटे वीडियो, समुदाय की आवाज, महत्वपूर्ण आंकड़े, उपलब्धियां, बदलाव की कहानियां, संस्थागत इतिहास, महत्वपूर्ण दस्तावेज, विशेषज्ञों की राय तथा सीख और अनुभव सुरक्षित रखे जा सकते हैं। इससे जब भी किसी रिपोर्ट, सोशल मीडिया पोस्ट, मीडिया स्टोरी, प्रस्तुति या प्रस्ताव की जरूरत हो, संस्था के पास अपनी विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध होगी। धीरे-धीरे यही संग्रह संस्था की स्मृति, नॉलेज और संचार की पूंजी बन सकता है।

विज़िबिलिटी को संस्थागत बनाने की जरूरत

यदि किसी संस्था को अपनी विज़िबिलिटी और संचार को मजबूत करना है, तो इसे किसी एक व्यक्ति या किसी एक माध्यम पर निर्भर नहीं रखा जा सकता। इसके लिए एक स्पष्ट संचार एवं विजिबि​लिटी योजना की जरूरत है। संस्था को पहले यह स्पष्ट करना होगा कि वह कौन है और किस बदलाव के लिए काम करती है। इसके बाद उसे अपने तीन-चार प्रमुख संदेश तय करने होंगे वह किन लोगों तक पहुंचना चाहती है, उनके लिए कौन से माध्यम उपयुक्त हैं, किस तरह की कहानियां और सामग्री नियमित रूप से तैयार करनी हैं, इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी और कितनी नियमितता से काम किया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समय-समय पर यह भी देखा जाए कि संचार केवल पहुंच बढ़ा रहा है या वास्तव में विश्वास, संवाद, पहचान और प्रभाव भी बढ़ा रहा है।

असली कहानी ट्रेनिंग के बाद

केवल एक-दो प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं होते। कहानी कहने, लेखन, फोटो और वीडियो, सोशल मीडिया, डिजिटल संचार, मीडिया से संवाद, कथानक निर्माण और संचार रणनीति जैसे क्षेत्रों में लगातार क्षमता निर्माण की जरूरत है। लेकिन प्रशिक्षण के बाद असली चुनौती शुरू होती है जब वह इसे व्यवहार में अपनाते हैं। संस्था के लोगों को अपने वास्तविक काम से जुड़ी सामग्री तैयार करने, उस पर प्रतिक्रिया पाने और फिर उसे बेहतर बनाने के अवसर मिलने चाहिए।

संस्था के कल्चर का हिस्सा

आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि संचार को संस्था के भीतर एक व्यक्ति की जिम्मेदारी से निकालकर संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बनाया जाए। अक्सर संस्था में संचार की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति दे दी जाती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि संस्था के हर काम में संचार की संभावना होती है। जब संस्था का हर व्यक्ति यह समझने लगे कि “हम जो कर रहे हैं, उसे केवल करना नहीं है; उसे समझना, दर्ज करना और सही तरीके से साझा भी करना है,” तब संचार किसी विभाग का काम न रहकर संस्था की संस्कृति बनना शुरू होता है।

यह काम साझेदारी से ही आगे बढ़ेगा

संचार की इस नई समझ को विकसित करना किसी एक संस्था के बूते का काम नहीं है। सीएसओज के साथ-साथ मीडिया, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों, तकनीकी विशेषज्ञों, डिजाइन और डिजिटल क्षेत्र, फाउंडेशन और दाताओं, सरकार और प्रशासन तथा युवाओं और नए मीडिया निर्माताओं के बीच सहयोग की जरूरत होगी। यह सहयोग केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं होना चाहिए। ज्ञान, तकनीक, प्रशिक्षण, मेंटरिंग, मंच और संसाधन—इन सभी प्रकार के सहयोग मिलकरसंचार क्षमता को मजबूत कर सकते हैं।

अंततः सीएसओज के पास कहानियों की कोई कमी नहीं है। उनके पास गांवों, समुदायों, संघर्षों, पहलों, बदलावों और सीखों का विशाल अनुभव संसार है। जरूरत केवल इतनी है कि हम इन अनुभवों को पहचानें, उन्हें दर्ज करें, उनके भीतर के अर्थ को समझें और उन्हें ऐसे कथानक में बदलें जो लोगों तक पहुंचे और सार्वजनिक विमर्श को समृद्ध करे।

लेखक के बारे में ..

संप्रति : एसोसिएट डायरेक्ट, स्ट्रेटजिक कम्युनिकेशन एंड स्टोरीटेलिंग, विकास संवाद

9977958934, rakesh@vssmp,org

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