मिट्टी से अपनी नई पहचान गढ़ रही हैं महिलाएं

प्रेमशिला बघेल
उन्नयन जन विकास समिति, महासमुंद

महासमुंद शहर के वार्ड क्रमांक 26 में रहने वाली कुम्हार समाज की महिलाएं आज अपनी मेहनत, कला और एकजुटता के दम पर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। कभी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाली इन कुम्हार समाज की महिलाओं ने खोते जा रहे अपने परंपरागत पेशे को पुनर्जीवित किया है। इससे उनकी पहचान मिट्टी के कारीगर के रूप में बनी है, साथ ही उनकी आजीविका समृद्ध हो रही है।

अनीता प्रजापति बताती हैं कि कुम्हार समाज से जुड़े परिवारों का पारंपरिक काम मिट्टी से दीपक,मटके और देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाना रहा है, लेकिन उनका यह काम कुछ त्योहारों तक ही सीमित था। स्टील और प्लास्टिक के बढ़ते चलन से मिट्टी के बर्तन का उपयोग घटा है जिसका विपरीत असर हमारी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान पर पड़ा है। पहले जहां अपने आसपास ही हमारे बर्तन बिक जाते थे वहीं अब इसके लिए बाजार की उपलब्धता भी कम हुई है। इसी हालात को देखते हुए सामाजिक संस्था उन्नयन जन विकास समिति ने इस समुदाय के कौशल विकास और योजनाओं से जुड़ाव की दिशा में विशेष पहल की है।

संस्था के कार्यकर्ताओं ने जब इस समुदाय के महिलाओं से संपर्क किया और उनकी स्थिति को समझने की कोशिश की तब उन्होने महसूस किया कि इन परिवारों में परंपरागत काम कमजोर होने से उनपर जीवन यापन को लेकर मानसिक दबाव बढ़ा है। कई महिलाओं के मन में आत्महत्या के बुरे ख्याल भी आते रहे हैं। शुरुआत में वे अपनी बात साझा करने में संकोच करते,यह सोचकर कि चर्चा करने से क्या होगा ? लेकिन संस्था के कार्यकर्ता ने इन महिलाओं को समूह के रूप में संगठित करना और बातचीत करना जारी रखा। फिर धीरे-धीरे मन की बातें साझा होने लगीं। कुम्हार समाज की महिलाओं ने अपने परंपरागत काम को मजबूती देने के लिए कहीं से आर्थिक सहायता और कुछ नए प्रशिक्षण दिलाने की मांग की।

इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले देविका महिला स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया जिससे 10 महिलाएं जुड़ी। इस समूह का बैंक खाता बैंक ऑफ बड़ौदा, महासमुंद में खोला गया और सभी सदस्य प्रतिमाह 100 रुपये की बचत करने लगे। इससे बैठकों का सिलसिला नियमित हुआ और सदस्यों के बीच आपसी सहयोग और विश्वास बढ़ने लगा। फिर संस्था के मार्गदर्शन में महिलाओं के पारंपरिक हुनर को और मजबूत बनाने के लिए छत्तीसगढ़ शासन के माटी कला बोर्ड से जुड़ाव स्थापित किया गया। समूह की महिलाओं को बोर्ड के सहयोग से मिट्टी से विविध कलाकृतियां तैयार करने को लेकर 1 सप्ताह का निशुल्क कौशल प्रशिक्षण मिला। इस प्रशिक्षण की खास बात यह रही कि सभी को परंपरागत भारी चाक की बजाय आसानी से चलने वाले आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक चाक पर काम करने का मौका मिला। प्र्शिक्षण के समापन पर सभी को एक-एक इलेक्ट्रॉनिक चाक भी दिया गया जिससे कुम्हार समाज की इन महिलाओं के मन में नई ऊर्जा और हुनर के साथ काम करने का उत्साह बढ़ा।

निखरता हुनर, मजबूत होती आजीविका

इस पहल का नतीजा यह हुआ कि घर-घर में रंग-बिरंगे विविध आकार के दीप,कलश, गणेश व लक्ष्मी माता की मूर्तियां, नांदिया-बैला, गुड्डा-गुड़िया आदि अनेक वस्तुएं बनने लगीं। इलेक्ट्रॉनिक चाक पर इन कलाकृतियों को तैयार करने की गति तेज हुई और उनके हुनर में निखार आने से बाजार में अच्छी कीमत मिलने लगी है । महिलाओं के सीखने की लगन और परिवार की मेहनत से धीरे-धीरे ये उत्पाद महासमुंद के स्थानीय बाजार से निकलकर अब रायपुर के हाट बाजार और सरकारी मेलों तक पहुंचने लगे हैं। जब देविका समूह के इस प्रयास की आसपास सराहना होने लगी तो अनीता प्रजापति ने अपने आसपास की अन्य कुम्हार महिलाओं को भी इस काम से जुडने के लिए प्रेरित किया। इस कोशिश से लक्ष्मी नारायण, महाप्रभु और गायत्री महिला स्वयं सहायता समूह जैसे तीन और समूह तैयार हो गए। इस तरह से करीब 40 कुम्हार परिवारों की महिलाएं मिट्टी की कारीगरी से अपनी नई पहचान गढ़ने और परिवार की आजीविका को मजबूत बनाने में साथ हो चुकी हैं।

संस्था के समन्वय और मार्गदर्शन से देविका महिला समूह को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत एक लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ जिससे यह समूह मिट्टी के अपने काम को लघु उद्योग के रूप में आगे बढ़ाते हुए रापुर शहर में लगने वाले विभिन्न मेलों और हाट बाजार तक पहुंचाने का काम कर रहा है। समूह की महिलाएं नियमित रूप से मिट्टी के उत्पाद तैयार करने , बेचने और अपनी बचत राशि को महिला समूह के खाते में जमा करने का काम कर रही हैं। दीपावली के मौके पर लगभग 1 लाख दीपक बेच चुकी अनीता उत्साहित होकर बताती हैं कि बाजार में उनके बनाए बर्तन की मांग पहले से काफी अधिक बढ़ गयी है, इससे कभी गरीबी और निराशा का सामना करने वाले महिलाओं को अपनी नई पहचान बनाने और आजीविका को मजबूत बनाने के लिए स्थायी  जरिया मिल गया है। महासमुंद के कुम्हार समाज की महिलाओं के जीवन में आए इस सकारात्मक बदलाव की प्रक्रिया में महिलाओं की अपनी लगन, उन्नयन जन विकास समिति के जमीनी कार्यकर्ताओं द्वारा निरंतर संवाद और माटी कला बोर्ड के साथ बेहतर जुड़ाव की महत्वपूर्ण भूमिका है।

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