लड़कियों के स्वास्थ्य को लगे पंख

अल्पना शर्मा
उन्नयन समिति, रोहतक

यह कहानी किशोरी बालिका के स्वास्थ्य के लिए लड़ी गई जंग पर है। इसमें बालिका के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी यात्रा पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उनके जीवन में घटित घटनाओं से परियोजना तरंगिणी के पहले और बाद की स्थिति को बताया गया है। इस कहानी में बताया गया है कि किस तरह से उनके जीवन में स्वास्थ्य में परिवर्तन आया।
हरियाणा के रोहतक जिले के बालियाना, भालोट, बोहर और खेड़ी साध गांव में उन्नयन समिति की परियोजना तरंगिणी के तहत 15 से 19 वर्ष तक की 1000 किशोरियों को पोषण और स्वास्थ्य कार्यक्रम में लाभार्थियों के रूप में चुना गया। इस कार्यक्रम के तहत किशोरियों में स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जागरूकता लाने पर ध्यान दिया गया।
कार्यक्रम के दौरान यह सामने आया कि किशोरियों में कई स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जिन्हें वे किसी से साझा नहीं कर पाती थीं। कुछ समस्याएं ऐसी थीं जिन पर खुलकर बात करना शर्म का विषय माना जाता था। विशेषकर माहवारी और UTI जैसी समस्याओं पर बात करना एक बड़ी चुनौती थी।
इन्हीं चुनौतियों का सामना कर रही एक किशोरी थी – निशा। वह अपने माता-पिता और तीन भाई-बहनों के साथ एक छोटे से घर में रहती थी। उसके माता-पिता मजदूरी करते थे और परिवार की मासिक आय लगभग ₹7000 थी। निशा नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पाती थी, क्योंकि उसे थकान और तनाव रहता था।
परियोजना के दौरान जब टीम के सदस्य निशा से मिले, तब वह 15 वर्ष की थी और 9वीं कक्षा में पढ़ती थी। धीरे-धीरे उनसे उसकी दोस्ती हुई और उसने अपनी समस्याएं साझा करनी शुरू कीं। जांच में पता चला कि उसका हीमोग्लोबिन 9.2 था, यानी वह गंभीर एनीमिया से पीड़ित थी।

एक दिन पता चला कि निशा ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। जब टीम उसके घर गई, तो उसकी मां ने कहा कि अब पढ़ाई की जरूरत नहीं है, घर का काम ही उसके काम आएगा।
टीम ने कई बार समझाने के बाद परिवार को स्वास्थ्य और शिक्षा के महत्व के बारे में समझाया। उन्हें पोषण, साफ-सफाई, माहवारी के दौरान सावधानियां और संतुलित आहार के बारे में जानकारी दी गई। साथ ही, आयरन की गोलियां और स्थानीय पोषक खाद्य पदार्थों के सेवन की सलाह दी गई।
लगभग 6 महीनों में निशा के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा। उसका हीमोग्लोबिन बढ़कर 12.1 हो गया। अब उसे थकान नहीं होती थी और वह बेहतर महसूस करने लगी।
सिर्फ निशा ही नहीं, बल्कि अन्य किशोरियों में भी बदलाव देखने को मिला। अब वे अपने स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात करने लगी हैं। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मियों के अनुसार, किशोरियों और महिलाओं में जागरूकता बढ़ी है और उनके स्वास्थ्य में सुधार आया है।
अब ये किशोरियां अपने जीवन में आगे बढ़ने और नई ऊंचाइयों को छूने के लिए तैयार हैं।
