हीरा खदान के मजदूर अरविंद की पहल

समीना यूसुफ
पृथ्वी ट्रस्ट, पन्ना, मध्यप्रदेश

बहुमूल्य रत्न हीरा के लिए ख्यात मप्र के पन्ना जिले के गरीब आदिवासी मजदूरों की स्थति बहुत ही चिंताजनक है। यहां दो वक्त की रोजी रोटी के लिए सिर पर जलाऊ लकड़ी का गट्ठर धोती महिलाओं से लेकर हीरा और पत्थर खदान में अपनी किस्मत खोजते, टीबी और सिलकोसिस से जूझते पलायन करने को बेबश मजदूरों का जीवन गरीबी और दुर्व्यवस्था की कहानी कहता है। ऐसी परिस्थिति से गुजर रहे अनेकों परिवार में से एक परिवार है अरविंद गौंड का जिनकी आपबीती उन्ही की जुबानी प्रस्तुत है।

दुनियां भर में पन्ना का हीरा मशहूर है इसके साथ ही यह जिला प्राकृतिक संसाधनों एवं वन्य जीवों से भरपूर है। यहां  नैसर्गिक जंगल और केन-बेतवा नदी के बीच स्थित पन्ना टाइगर रिजर्व एवं घड़ियाल संरक्षित क्षेत्र सरकार के लिए आमदनी का बड़ा स्रोत है। 21 वर्षीय अरविंद गौंड एक खदान मजदूर युवा है। वह पन्ना जिले के गांधी ग्राम में रहता है। उसके परिवार में विकलांग मां तिरसिया बाई आदिवासी छोटी बहन सुमन गौंड और छोटा भाई सुरेंद्र गौंड है। पिता की मृत्यु के बाद परिवार को इन्होंने ही संभाल रखा है। अरविंद के दादा बीरन गौंड और पिता इमरत लाल गौंड भी खान मजदूर थे, जिनकी मृत्यु इन्हीं हीरा और पत्थर खदानों में ही काम करते-करते हुई है। अरविंद के पिता बीमार थे कई साल तक बीमारी से लड़ते रहे, इलाज चलता रहा पर कोई आराम नहीं लगा और चार साल पहले सिर्फ 45 साल की उम्र में 8 मई 2022 को उनकी मृत्यु हो गई।

अरविंद की मां तिरसिया बाई से उनके परिवार के संघर्ष और पारिवारिक स्थिति के बारे में पूछा गया तो उनकी आंखे भर आई, उन्होंने बताया कि आज जो काम मेरे बेटे कर रहें हैं उसी काम को करते हुए मेरे ससुर, पति, जेठ, जेठानी सभी की मृत्यु हो गई और अब उसी काम को करने के लिए हमारे बच्चे भी मजबूर हैं क्योंकि और कहीं कोई रोजगार नहीं है न पर्याप्त खेती किसानी। तिरसिया के ससुर के पांच बेटे और एक बेटी थी ससुर पत्थर खदान में काम करते करते सिलिकोसिस बीमारी से पीड़ित हो गए थे। साथ में सास भी पति के काम में हाथ बटाती थी, इसी काम के दौरान एक बड़ी दुघर्टना हो गई खदान में भारी पत्थर उठाते हुए एक पत्थर ससुर के ऊपर गिर गया जिससे उनका हाथ टूट गया। तब ठेकेदार ने उन्हें बिना मजदूरी दिए ही काम से निकाल दिया। चूंकि यहाँ ठेकेदार लोग  बिना पति के औरतों को भी काम पर नहीं रखते थे, तो सास को भी काम से बाहर कर दिया गया  ये  कहकर कि महिला अकेले भारी पत्थर नहीं उठा सकती। इसके बाद परिवार चलाने के लिए सास जंगल से जलाऊ लकड़ी बीनकर बेचती रही और किसी तरह से बच्चो और बीमार पति को पालती रही। 

पिता इमरत लाल के ऊपर उनके पिता बीरन के इलाज के लिए लिया गया कर्ज का बोझ भी रखा था जो उन्हें चुकाना था, तो पति पत्नी दोनों खदान में  पत्थर से चीप या पत्थर की कटिंग करके चौकोर आकार के पत्थर बनाने का काम करते थे। जिसके जितने ज्यादा पत्थर बनेंगे उसी के हिसाब से 70-120 रुपए मजदूरी का मिलता था और  सिर्फ पति को मजदूरी मिलती थी पत्नी को नहीं। यदि कोई पत्थर काटते समय सही तरीके से न बन पाए या पत्थर खराब निकल जाए तो ठेकेदार दिन भर की मजदूरी काट लिया करते थे, पूरे दिन की मेहनत का एक रुपया भी नहीं देते थे। मजदूरी मांगने पर ठेकेदार बोलते कि हमसे उधार ले जाओ फिर मजदूरी से कटवा देना, इस तरह से ये लोग और ज्यादा कर्ज के जाल में फंसते चले गए।

तिरसिया ने बताया कि अब हमारा अपना परिवार भी बढ़ गया सास ससुर के साथ तीन बच्चे भी हो गए (यानि अरविंद और उसके भाई बहन) परिवार और खर्चे तो बढ़ गए  पर मजदूरी वही की वही रही। इससे स्थितियां बहुत ज्यादा बिगड़ने लगीं। कभी-कभी तीन से चार दिन घर पर खाना नहीं बनता या एक ही टाइम बन पाता था। इधर पति इमरत लाल की तबियत दिन ब दिन खराब होने लगी, मजबूरन उसी खदान में जाकर पत्थर तोड़ना पड़ा। इतनी मेहनत करने के बाद भी पर्याप्त पोषण और खानपान न होने के कारण बड़ा बेटा अरविन्द 4 साल की उम्र में गंभीर कुपोषण का शिकार हो गया। उसका सर बहुत बड़ा और हाथ पैर बिलकुल पतले हो गए थे। जब उसे सरकारी हॉस्पिटल लेकर गए तो डाक्टर ने देखते ही बोल दिया कि बच्चा नहीं बचेगा इसका रात भर जीवित रहना मुश्किल है बच्चे के हाथ पैर चलना बंद हो गए थे, ऐसे हाल में हम दोनों पति पत्नी बच्चे को लेकर घबराते इधर उधर भागते रहे। फिर हम लोग एक वैद्य के पास पहुंचे और बच्चे को किसी तरह से भी बचाने की गुजारिश की। उस भले इंसान ने उन्हें तसल्ली देते हुए बच्चे को एक खुराक दवा पिलाई जिसके कुछ ही देर बाद उसके शरीर में हरकत हुई और अरविंद को होश आ गया और वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगा। तब वैद्य ने कहा कि जितना हो सके इसको कच्चे पपीते की सब्जी खिलाओ जिसके बाद पति इमरत इधर उधर से मांग कर बेटे को पपीता की सब्जी खिलाते रहे जिससे अरविन्द स्वस्थ हो गया।

जब अरविंद गांव के सरकारी स्कूल में पांचवीं पढ़ रहा था तब से वह भी अपने पिता के साथ पत्थर खदान मजदूरी  करने जाने लगा और पढ़ाई के साथ-साथ पिता के काम में हाथ बटाने लगा। बच्चे की तबीयर तो ठीक हुई लेकिन पिता की बीमारी बढ़ती जा रही थी और उनके काम करने की ताकत कम हो रही थी। अरविंद के 12 साल का  होते होते इमरत लाल ने पूरी तरह से बिस्तर पकड़ लिया, वे एक गिलास पानी अपने हाथ से लेकर नहीं पी पाते थे, पूरी तरह दूसरों पर आश्रित  हो गए। अरविंद की मां ने आसपास के गांव और पन्ना में काम मांगने की कोशिश की लेकिन विकलांग होने की वजह से उसे कोई स्थायी काम नहीं मिला।इससे परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा बिगड़ गयी जिससे 12 साल के अरविन्द के कंधों पर बीमार पिता समेत पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई।

अरविन्द ने 6वीं क्लास में आते ही घर की जिम्मेदारी उठाने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी जबकि अपने छोटे भाई सुरेंद्र और छोटी बहन सुमन की पढाई जारी रखी। वह अपने दादा के साथ 13 साल की उम्र में कमाने दिल्ली (नोएडा) पलायन पर चला गया। जब नोयडा में बच्चा मानकर उसे मजदूरी पर नहीं रखा गया तब उसने कबाड़ बीन कर बेचने का काम करने लगा। वहां एक साल तक वह यही काम करता रहा फिर अरविंद के पिता इमरत लाल ने उसे पन्ना वापस बुला लिया। गांव आकर वह पत्थर खदान में काम करने लगा लेकिन यहां उसे बहुत कम मजदूरी मिलती थी तो  वह दोबारा दिल्ली चला गया। इस बार उसे काम पर रख लिया गया तब तक अरविंद 16 साल का हो गया था। वह दिल्ली, नोएडा, दादरी, पानीपथ, चंडीगढ़ आदि में दो-दो महीने  रहकर गटर के ढक्कन बनाने, सीमेंट की बोरी उठाकर ऊपर चढ़ाने का काम करता रहा इससे प्रतिदिन 200 रूपए मजदूरी मिलती। अरविंद को ये काम करते दो साल हो गया था, इसी बीच एक दिन पिता इमरत का फोन आया कि अरविंद के भाई का किसी दुर्घटना में  हाथ टूट गया। यह सुनकर वह घबरा गया और घर आने के लिए ठेकेदार से मजदूरी के पैसे मांगे तो ठेकेदार ने पैसे देने से मना कर दिया। वह गिड़गिड़ाता रहा कि ये मेरे मेहनत के पैसे हैं मुझे अपने घर जाना है मेरे भाई का एक्सीडेंट हो गया है इन पैसों की मुझे बहुत जरूरत है पर ठेकेदार ने उसकी एक नहीं सुनी, उस  बच्चे की 7 महीनों की बची हुई  मजदूरी के पैसे बिना दिए ही वापस भेज दिया। आखिर बिना पैसे अरविंद दिल्ली से गांव लौट आया, पिता से आकर पलायन में बीते अपने दुख बताए तो पिता ने दिलासा देते हुए बोला कोई बात नहीं मन छोटा मत कर अब तू हमें छोड़ कर कहीं बाहर नहीं जायेगा, मेरी आंखों के सामने रहकर यहीं पर काम करना। इस तरह से एक बार फिर से अरविंद ने गांव के पत्थर और हीरा खदान में काम करना शुरू कर दिया।

लेकिन अरविंद को बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था, काम के कारण पढाई का छूट जाना उसे बहुत खल रहा था इसलिए अरविंद ने दोबारा फिर से आगे की पढ़ाई शुरू करने की ठान ली। मजदूरी और पलायन के कारण लंबा गैप होने के कारण जब सरकारी स्कूल में  एडमिशन नहीं मिला तो उसने  प्राइवेट में 30,000 जो उसके लिए एक बड़ी रकम थी खर्च करके कक्षा 8 से 10 वीं तक की पढ़ाई पूरी की। किन्तु उसकी किस्मत में मानो संघर्ष ही लिखा था, जैसे ही अरविंद ने 10 वीं पास  की तो उसके पिता इमरत लाल की मृत्यु हो गई। इस घटना से उसके परिवार की हिम्मत टूट गई, ‘एक खदान श्रमिक के जीवन का संघर्ष जो जन्म से शुरू होकर मृत्यु तक साथ रहता है’ वह जो उसके पिता ने देखा था अब वही दृश्य बेटा देख रहा था। तमाम कोशिशों और कर्जे के बाद भी वह अपने बीमार पिता को बचा नहीं सका। इस कारण से उसके आगे की पढ़ाई रुक गयी और अरविंद अपने छोटे भाई के साथ पिता के इलाज का कर्ज चुकाने के लिए खदान में कड़ी मेहनत करने लगा। 

अरविंद ने दिन दिन भर मजदूरी कर के 1 लाख 50 हजार रुपए का कर्ज  चुकाया, जो बाकी बचा हुआ कर्ज था उसके लिए बंधुआ मजदूर बनाकर ठेकेदार ने पैसा वसूल  कर लिया। अरविंद की मां तिरसिया ने बताया कि उस समय यूसुफ बेग भैया जिन्होंने हम गरीबों के हक और अधिकार  की आवाज़  उठाई और खदान मजदूरों में होने वाली बीमारी सिलिकोसिस की लंबी लड़ाई लड़ी। इसके बाद सरकार के द्वारा 3-3 लाख रुपए की सहायता राशि सिलिकोसिस से पीड़ित परिवारों को मिली और ये राशि  मेरे ससुर को भी मिली। ऐसी कठिन परिस्थिति में जब हमारे रहने की जगह गिरवी रखी हुई थी रहने का ठिकाना भी छीना जा रहा था तब इस राशि ने हमें एक बड़ा सहारा दिया। बचे हुए पैसे हम सभी देवरानी जेठानी ने आपस में  बांट लिए और कुछ पैसों से बकरी खरीदी। अरविंद की मां तिरसिया बताती है कि वह बकरी पालन के साथ ही वर्ष 2023 से पृथ्वी ट्रस्ट द्वारा संचालित मशरूम उत्पादन के काम से भी जुड़ी हुई है इससे धीरे-धीरे परिवार की आर्थिक स्थति सुधर रही है। वह बताती है कि मशरूम के अलावा वे पोषण वाटिका, वर्मी कम्पोस्ट जैसे कार्यों से भी जुड़ रही हैं।

इधर अरविंद काम के साथ ही एक छोटे से कमरे में निःशुल्क कोचिंग सेंटर खोले हुए है जिसमें वह गांव के 25-30 बच्चों को पढ़ाता है ताकि पैसे की किल्लत की वजह से किसी भी बच्चे की पढ़ाई न छूटे। अरविंद कहता है कि मैं तो अपनी पढ़ाई पूरी न कर सका और जो कुछ भी मैंने अपने जीवन में सहा है  वो कोई और बच्चा न सहे इसलिए मैं मैं इन बच्चों को पढ़ाई से जोड़ते हुए मैं अपने सपनों को बचाने की जद्दोजहद में लगा हुआ हूं।

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