पढ़ाई का सपना पूरा करने सास ने दी हिम्मत

राघवेंद्र सेवड़ा
एजुकेट गर्ल जयपुर, राजस्थान

अक्सर समाज में सास और बहू के रिश्ते को अलग नजर से देखा जाता है, लेकिन मेरे लिए मेरी सासू माँ एक सहारा बनकर सामने आईं। उन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए न केवल प्रेरित किया, बल्कि हर कदम पर मेरा साथ भी दिया, इसी का नतीजा है कि मैं आज मैं 12 वीं की पढ़ाई कर रही हूं। यह कहानी है एक ऐसी बहू की जिसे कम उम्र में विवाह के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
सपना (परिवर्तित नाम) बताती है कि मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना पढ़-लिखकर कुछ बनने का था, लेकिन परिस्थितियों ने मुझे उस रास्ते से बहुत जल्दी हटा दिया। मैंने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, पर घर की आर्थिक स्थिति और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण मेरी पढ़ाई बीच में ही छूट गई। मेरे परिवार में तीन बहनें थीं, और जैसे ही बड़ी बहनों की शादी हुई, घर की जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। इसी बीच मेरी भी कम उम्र में शादी हो गई। उस समय यह समझ ही नहीं थी कि मेरे अपने सपनों का क्या होगा, बस परिवार की परिस्थितियां ही सब कुछ तय कर रही थीं।
शादी के बाद मैं कुछ समय तक अपने मायके में रही और फिर ससुराल आ गई। यहां आकर जीवन पूरी तरह बदल गया। घर के काम, परिवार की देखभाल और बाद में बच्चों की जिम्मेदारियां -इन सबके बीच मेरा खुद का सपना कहीं पीछे छूट गया। कई बार ऐसा लगता था कि अब पढ़ाई सिर्फ एक अधूरा ख्वाब बनकर ही रह जाएगी। लेकिन दिल के किसी कोने में पढ़ने की इच्छा अब भी जिंदा थी, जो कभी-कभी मुझे सोचने पर मजबूर कर देती थी कि काश मुझे एक और मौका मिल पाता।
इसी दौरान एक दिन मेरी एक सहेली ने मुझे बताया कि हमारे गांव में “प्रगति कार्यक्रम” शुरू होने वाला है। उसने कहा कि इस कार्यक्रम के माध्यम से उन महिलाओं और लड़कियों को फिर से पढ़ने का अवसर दिया जाता है, जिनकी पढ़ाई किसी कारणवश छूट गई थी। उसने मुझे बताया कि इसके तहत स्टेट ओपन स्कूल से 10वीं की परीक्षा दी जा सकती है और गांव में इसके लिए एक कैंप भी लगाया जाएगा, जहां पढ़ाई में मदद मिलेगी। उसकी बात सुनकर मेरे मन में एक नई उम्मीद जगी, लेकिन साथ ही डर भी था-क्या मैं इतने सालों बाद फिर से पढ़ाई कर पाऊंगी? हमारी यह बातचीत मेरी सासू माँ ने भी सुन ली थी। उन्होंने मुझसे बहुत ही सरल शब्दों में कहा, “अगर तुम्हारा मन है, तो तुम्हें जरूर पढ़ाई फिर से शुरू करनी चाहिए।” उनके इन शब्दों ने मेरे अंदर जैसे नई ऊर्जा भर दी। अक्सर समाज में सास और बहू के रिश्ते को अलग नजर से देखा जाता है, लेकिन मेरे लिए मेरी सासू माँ एक सहारा बनकर सामने आईं। उन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए न केवल प्रेरित किया, बल्कि हर कदम पर मेरा साथ भी दिया।
उनकी प्रेरणा से मैंने स्टेट ओपन स्कूल में अपना नामांकन करवाया और गांव में लगने वाले प्रगति कैंप में नियमित रूप से जाने लगी। हर दिन लगभग तीन घंटे में पढ़ाई के लिए समय निकालती थी। यह आसान नहीं था, क्योंकि घर के काम और बच्चों की देखभाल के बीच पढ़ाई के लिए समय निकालना एक बड़ी चुनौती थी। कई बार थकान इतनी होती थी कि लगता था अब और नहीं हो पाएगा, लेकिन फिर अपने सपनों को याद करके मैं खुद को संभाल लेती थी।
धीरे-धीरे पढ़ाई में मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा। शिक्षकों और साथियों का सहयोग मिला, जिससे मुझे और भी प्रेरणा मिली। मैंने ठान लिया था कि इस बार मैं अपने सपनों को अधूरा नहीं छोडूंगी। मेरी मेहनत रंग लाई, जब मैंने 10वीं की परीक्षा पहली ही कोशिश में 81 प्रतिशत अंकों के साथ पास की। इतना ही नहीं, मैंने अपने जिले में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। यह मेरे जीवन का वह पल था, जब मुझे लगा कि अगर इंसान ठान ले, तो कुछ भी असंभव नहीं है।
मेरी इस उपलब्धि के लिए मुझे राज्य सरकार द्वारा “मीरा पुरस्कार” से सम्मानित किया गया। यह सिर्फ एक पुरस्कार नहीं था, बल्कि मेरे संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की पहचान थी। इस सम्मान ने मुझे यह एहसास दिलाया कि मेरी मेहनत सच में मायने रखती है और मैं भी अपने जीवन में कुछ बड़ा कर सकती हूं। आज मैं पहले से कहीं ज्यादा आत्मविश्वासी हूं। अब मेरा सपना सिर्फ खुद तक सीमित नहीं है, बल्कि मैं अपने जैसी अन्य महिलाओं और बच्चों की भी मदद करना चाहती हूं, ताकि वे भी अपने सपनों को पूरा कर सकें। मैं हाई कोर्ट में चतुर्थ श्रेणी के पद की तैयारी कर रही हूं और साथ ही 12वीं कक्षा की पढ़ाई भी जारी रखने का निर्णय लिया है।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं, तो महसूस होता है कि जीवन में कठिनाइयां जरूर आती हैं, लेकिन वे हमें रोकने के लिए नहीं, बल्कि मजबूत बनाने के लिए होती हैं। अगर उस दिन मैंने हिम्मत नहीं 1 जुटाई होती, अगर मेरी सासू माँ ने मेरा साथ नहीं दिया होता, तो शायद मैं आज भी अपने अधूरे सपनों के साथ ही जी रही होती। मेरी कहानी यही सिखाती है कि सपने कभी मरते नहीं हैं, बस उन्हें फिर से जीने के लिए एक मौके और थोड़ी हिम्मत की जरूरत होती है। अगर परिवार का साथ मिल जाए और खुद पर विश्वास हो, तो कोई भी बाधा हमें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।
