कंचन की हरी उम्मीद

डॉ. नरेंद्र कुमार गर्वा
अलखा फाउंडेशन, किशनगढ़ रेनवाल, जयपुर, राजस्थान

जयपुर जिले के किशनगढ़ रेनवाल की एक साधारण महिला कंचन ने अपनी बीमारी और कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया। एक बीमारी के कठिन अनुभव ने उसे न सिर्फ खुद बदलने के लिए प्रेरित किया, बल्कि पूरे समुदाय में एनीमिया को खत्म करने के लिए पोषण बाग आंदोलन चलाने का रास्ता दिखाया। कंचन ने 155 परिवार में पोषण बाग तैयार कराने में भूमिका निभायी है जिससे महिलाओं और किशोरियों का स्वास्थ्य बेहतर हो रहा है।
जयपुर जिले के छोटे से शहर किशनगढ़ रेनवाल की एक ऊबड़- खाबड़ बस्ती में रहने वाली कंचन की जिंदगी कभी बहुत साधारण और संघर्षों से भरी थी। 33 वर्षीय कंचन दो बच्चों की माँ है-8 साल का राहुल और 5 साल की प्रिया। आज दोनों बच्चे स्वस्थ और खुशहाल दिखते हैं, लेकिन कंचन के मन में एक दर्दनाक याद हमेशा ताजा रहती है। जुलाई 2021 में जब प्रिया का जन्म हुआ था, तब कंचन की हालत बेहद गंभीर थी। डॉक्टरों ने साफ शब्दों में कहा था कि उसके शरीर में खून की भारी कमी है और तुरंत खून चढ़ाना पड़ेगा। अस्पताल के उस पलंग पर लेटी कंचन के मन में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था-अगर उसने पहले अपने खान-पान और पोषण पर ध्यान दिया होता, तो क्या आज यह दिन देखना पड़ता?
उस एक घटना ने कंचन के भीतर गहरा बदलाव ला दिया। उसने ठान लिया कि अब वह सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि अपनी बस्ती की हर महिला के लिए कुछ करेगी, ताकि कोई और महिला उस पीड़ा से न गुजरे जिससे वह गुजरी थी। जनवरी 2023 में कंचन की जिंदगी को नई दिशा मिली, जब वह अलखा फाउंडेशन के साथ जुड़ी और “अलखा सखी के रूप में काम करने लगी। अब उसका हर दिन एक मिशन बन गया था। सुबह बच्चों को स्कूल भेजने के बाद वह अपने छोटे-से थैले में आयरन की गोलियां, पोषण चार्ट और बीज लेकर निकल पड़ती। धीरे-धीरे बस्ती की महिलाएं उसे पहचानने लगीं और सम्मान से “अलखा सखी” कहकर बुलाने लगीं।
22 अगस्त 2023 की एक शाम, मंदिर के सामने कंचन ने बस्ती की महिलाओं की एक बैठक बुलाई। करीब चालीस महिलाएं वहां इकट्ठा हुईं। कंचन जब खड़ी हुई तो उसकी आवाज़ में अब झिझक नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और दृढ़ता साफ झलक रही थी। उसने महिलाओं को समझाया कि गलत खान-पान और पोषण की कमी ही उनकी कमजोरी की सबसे बड़ी वजह है। उसने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे वह खुद एनीमिया से जूझती रही, लेकिन अब अपने घर में लगाए गए जैविक पोषण बाग की वजह से उसका हीमोग्लोबिन 12 तक पहुंच गया है।
कंचन ने महिलाओं को एक सरल लेकिन प्रभावी समाधान सुझा-हर घर में “पोषण बाग” लगाना। उसने बताया कि थोड़ी-सी जगह में भी पालक, मेथी, सरसों, चुकंदर, मूली, अमरूद, अनार और करी पत्ता जैसी पौष्टिक चीजें उगाई जा सकती हैं। उसने यह भी जोर दिया कि यह सब जैविक तरीके से उगाया जाएगा-गोबर की खाद और नीम की खली के साथ, बिना किसी केमिकल के। शुरुआत में कुछ महिलाएं हिचकिचाईं। किसी ने जगह की कमी बताई, तो किसी ने परिवार के समर्थन को लेकर चिंता जताई। लेकिन कंचन ने हार नहीं मानी। उसने हर घर जाकर खुद गड्ढे खोदे, खाद तैयार की और बीज बोए। उसने महिलाओं के परिवार वालों को भी समझाया कि एक स्वस्थ माँ ही स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है। अलखा फाउंडेशन ने भी इस पहल में सहयोग किया, बीज, टोकरियां और पोषण से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई। धीरे-धीरे यह छोटा-सा प्रयास एक बड़े बदलाव में बदलने लगा।
करीब छह महीने बाद बस्ती का दृश्य पूरी तरह बदल चुका था। जहां पहले सूनी जमीन थी, वहां अब हर घर के आंगन में हरे-भरे छोटे-छोटे बाग दिखाई देने लगे। महिलाएं सुबह मिलकर ताजी सब्जियां तोड़तीं, बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन बनातीं और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने लगीं। गर्भवती महिलाओं को कंचन खुद आयरन की गोलियां देती और उन्हें नियमित सेवन के लिए प्रेरित करती। एक दिन उसकी छोटी बेटी प्रिया ने मासूमियत से पूछा कि वह अब इतनी तेज़ क्यों दौड़ती है। कंचन ने उसे गोद में उठाकर मुस्कुराते हुए कहा कि अब उसके खून में ताकत है-और यही ताकत वह पूरे गांव में बांट रही है। आज कंचन का यह प्रयास एक आंदोलन का रूप ले चुका है। उसने अपनी बस्ती और आसपास की कॉलोनियों में लगभग 155 जैविक पोषण बाग स्थापित कर दिए हैं। उसका सपना है कि किशनगढ़ रेनवाल को एनीमिया मुक्त क्षेत्र बनाया जाए।
हर सुबह जब सूरज की पहली किरणें हरे पत्तों पर पड़ती हैं, कंचन अपने बच्चों के साथ अपने पोषण बाग में खड़ी होकर उस सफर को याद करती है, जिसने उसे कमजोर से मजबूत बनाया। अब उसका एक ही संकल्प है-जो दर्द उसने झेला, वह किसी और महिला को न झेलना पड़े। कंचन की यह कहानी सिर्फ एक महिला के बदलाव की नहीं, बल्कि उस उम्मीद की है जो हर घर में हरियाली और हर दिल में सेहत की रोशनी जगा सकती है।
