उजाले की शाला

तनिष्क पंवार
संपर्क संस्था, पेटलावद, झाबुआ (म.प्र.)

सन् 1992 की बात है। झाबुआ जिला मध्यप्रदेश के छोटे से गांव “काली घाटी” में सूरज ढलते ही सब सन्नाटा हो जाता था। खेतों में दिनभर काम करने वाले बच्चों की आंखों में पढ़ने का सपना था, पर उनके हाथों में कलम की जगह हल था। स्कूल की घंटी उनके लिए पराई थी, क्योंकि सुबह होते ही उन्हें पशुओं को चराने जाना पड़ता था।
तभी गांव में “सम्पर्क संस्था” के कुछ लोग आए। उन्होंने देखा कि अंधेरे में बैठे बच्चे आसमान के तारों को घूरते हैं, मानो उनसे पूछ रहे हों – “क्या हम भी पढ़ पाएंगे?” उन्हीं बच्चों में बंटी भी था। दिनभर वह अपने पिता के साथ खेतों में काम करता, पशुओं को चराता और शाम को थका-हारा घर लौटता। जब कभी गांव के स्कूल की घंटी सुनाई देती, तो उसका मन भी पढ़ने को मचल उठता, लेकिन जिम्मेदारियों ने उसके कदम बांध रखे थे। उसी रात एक दीये की लौ जलाई गई। उसे नाम दिया गया “रात की शाला”। खेतों से लौटकर थके-मांदे बच्चे जब अलाव के पास बैठते, तो वहीं उनकी पाठशाला लग जाती। स्लेट पर लिखे अक्षर ही नहीं, खेत की मिट्टी, पशुओं की देखभाल और बांध बनाने का ज्ञान भी उनकी किताब बन गया। फिर 10 गांव में ऐसी शालाएं खुलीं, और धीरे- धीरे अंधेरे गांवों में पढ़ाई की रौशनी फैलने लगी।
फिर एक दिन गांव के ही कुछ नौजवान, जो मुश्किल से दसवीं तक पढ़ पाए थे, आगे आए। उनके हाथों में सोलर लैंप था। वे गली-गली जाते और हर घर का अंधेरा दूर करते। बंटी अब हर शाम सबसे पहले शाला पहुंच जाता। सोलर लैंप की सफेद रौशनी में बैठकर वह देर रात तक पढ़ता और जो कुछ सीखता, उसे अपने छोटे भाई-बहनों को भी सिखाता। बच्चे अब लालटेन की पीली रौशनी में नहीं, सोलर की सफेद रौशनी में पढ़ते। इसी को लोगों ने “सोलर सखी” का नाम दे दिया। बच्चों के लिए लकड़ी के बक्से बनाए गए – “भढवानू कंड़ियों”। उनमें अबेकस की गुरियों की खड़खड़ थी, चित्र कार्डों की रंगीन दुनिया थी। माचिस की तीलियों से गिनती सीखते बच्चे हंसते-हंसते गणित के उस्ताद बन गए।
फिर सन् 2004 आया। रात की शाला अब बड़ी हो गई थी। उसे “सम्पर्क बुनियादी शाला” का नाम मिला। गांधी जी के सपनों वाला स्कूल, जहां पढ़ाई सिर्फ इम्तिहान पास करने के लिए नहीं, जीवन जीने के लिए होती थी। यहां दिव्या नाम की लड़की ने पहली बार कैंची पकड़ी और अपने लिए फ्रॉक सी दी। अजय ने साबुन बनाना सीखकर अपनी माँ का हाथ बंटाया। बंटी, जो कभी स्कूल जाने का सपना देखा करता था, अब छोटे बच्चों की पढ़ाई में मदद करने लगा था। यहां की दीवारों पर विज्ञान की प्रयोगशाला सजी, पुस्तकालय में किताबों की खुशबू बसी, और स्मार्ट क्लास में दुनिया सिमट आई।
इस शाला की एक और कहानी मेरे दिल में बसती है। एक दिन उद्योग के पीरियड में मैं बच्चों को कागज से चिड़िया, बिल्ली और मेंढक बनाना सिखा रहा था। बनाते-बनाते कक्षा का एक बच्चा टकटकी लगाकर मुझे देख रहा था। जब कागज का मेंढक बनकर फुदकने लगा तो सारे बच्चे ताली बजाने लगे। तभी वो बच्चा मासूमियत से बोल उठा – “सर आप तो भगवान हो। आपने एक कागज में जान डाल दी, देखी ये कैसे फुदक रहा है।”
उस पल मेरा गला भर आया। पहली बार किसी ने मुझे भगवान कहा था। वो प्रशंसा नहीं थी, वो एक बच्चे के भोले विश्वास की ताकत थी। उसी दिन समझ आयाकरिअर पढ़ाते हम बसों को सपने दिखाते हैं। और जब काटकर करें कड़ दे. तो समझो दिया जल गया है।
आज उस काली पार्टी से निकला बंटी सरकारी शिक्षक है. दिव्या अपने गांव में ही ब्यूटी पार्लर बताकर लड़कियों को शिक्षा रहीं है। में हजार से दावों ने इस शाला की देहरी है।
सम्पर्क ने बहुत नहीं खोला उसने उसके सपने को रोशन कर दिया जो कभी अधेरे में जाने वाला था और साप रहीं किया है अपसेउजाकर एककों के हाथ में दूसरे बच्चे के हाथ तक।
