एक ठंडी रात ने बदल दी जिंदगी

नरेंद्र कुमार गर्वा
अलखा फाउंडेशन, किशनगढ़ रेनवाल,जयपुर

2016 में 41 वर्षीय नरेंद्र की जिंदगी सामान्य थी। वह एक बुक शॉप चलाते थे। उनके पिता रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी थे। परिवार के साथ उनका जीवन आराम से चल रहा था। उन्होंने कभी किसी बड़े उतार-चढ़ाव का सामना नहीं किया था। लेकिन किस्मत ने कुछ और तय कर रखा था। उन्होंने कभी सामाजिक क्षेत्र के बारे में सोचा भी नहीं था। लेकिन 2016 की एक कड़ाके की ठंड वाली रात ने सब कुछ बदल दिया। उसी रात नरेंद्र कुमार गर्वा की जिंदगी ने नया मोड़ लिया। जनवरी 2016 की एक ठंडी रात थी। करीब साढ़े आठ बजे नरेंद्र अपने घर से निकले। उन्हें एक रिश्तेदार के यहां पारिवारिक कार्यक्रम में जाना था। यह जगह लगभग 50 किलोमीटर दूर थी। वह बाइक से जा रहे थे। ठंड से बचने के लिए उन्होंने गर्म कपड़े पहने थे। हेलमेट भी लगाया हुआ था। रास्ते में उन्हें बहुत ठंड लगने लगी तो एक ढाबे पर रुककर गर्म अंडा खाने का फैसला किया।

जैसे ही वह खाना खा रहे थे, उनकी नजर एक महिला पर पड़ी। वह एक छोटे बच्चे का हाथ पकड़े हुए थी। महिला ने सिर्फ पतले कपड़े पहने थे। बच्चे की हालत और भी खराब थी। उसने सिर्फ एक पतली शर्ट और अंडरवियर पहन रखा था। यह दृश्य देखकर नरेंद्र असहज हो गए। उन्होंने जल्दी से खाना खत्म किया और उनके पीछे चल दिए। थोड़ी दूर जाकर उन्होंने देखा कि महिला और बच्चा एक बंद दुकान के बाहर बैठे हैं।

नरेंद्र ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें ठंड नहीं लग रही? वह बताते हैं, “मेरे सवाल पर महिला ने अपनी फटी हुई चुनरी से बच्चे को ढक लिया। उसने कहा कि उनके पास अच्छे कपड़े खरीदने के पैसे नहीं हैं। वे फुटपाथ पर रहते हैं।” यह सुनकर मैं अंदर से हिल गया। मैंने तुरंत पास की दुकान से बच्चे के लिए गर्म कपड़े खरीदे।” महिला ने जिस तरह धन्यवाद दिया, वह नरेंद्र को अंदर तक छू गया। वह कहते हैं, “मुझे लगा जैसे मैंने उनके लिए बहुत बड़ा काम कर दिया लेकिन सच में वह एक छोटी-सी मदद थी।”जब वह रिश्तेदार के घर पहुंचे, तो वहां का माहौल भी उन्हें अच्छा नहीं लगा। वह पूरी रात सो नहीं पाए। अगले दिन उन्होंने अपने दोस्तों से इस बारे में बात की। सबने मिलकर एक फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वे जरूरतमंद लोगों के लिए कपड़े इकट्ठा करेंगे और उन्हें बांटेंगे। यह काम तुरंत शुरू हो गया। लोगों से पुराने कपड़े लिए जाते थे। फिर उन्हें जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाता था। नरेंद्र बताते हैं “मेरे परिवार वाले इस काम से हैरान थे। उन्हें यह भी अजीब लगता था कि मैं दूसरों के इस्तेमाल किए कपड़े घर में रख रहा हूं।” इसके बाद उन्होंने बाजार में एक स्टोर रूम लिया। वहीं कपड़े रखने लगे।

लेकिन उन्होंने कभी इस काम को बंद करने के बारे में नहीं सोचा। धीरे-धीरे इस काम ने उन्हें एक नई दुनिया से परिचित कराया। वह कई गरीब महिलाओं से मिले। उन्होंने देखा कि वे और उनके बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इसके बाद उन्होंने एक और कदम उठाया। 2018 में उन्होंने अलखा फाउंडेशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण पर काम करना था।

शुरुआत आसान नहीं थी। वह बताते हैं, “एक बार मैं जिला कलेक्टर से मिलने गया। मैं महिलाओं में एनीमिया कम करने के बारे में बात करना चाहता था।” “लेकिन उन्होंने मुझे डांट दिया। उन्होंने कहा कि सरकार आंगनवाड़ी के जरिए पहले से काम कर रही है। मुझे चिंता करने की जरूरत नहीं है।” इस घटना के बाद नरेंद्र ने तय किया कि वह अपने दम पर काम करेंगे।

उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर महिलाओं को जोड़ना शुरू किया। उन्होंने स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) बनाए। इसके बाद उन्होंने मुंबई के सहायक ट्रस्ट से ट्रेनिंग ली। यह ट्रेनिंग किचन गार्डन के जरिए पोषण सुधार पर थी। उन्होंने महिलाओं को अपने घरों में किचन गार्डन बनाने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे काम का असर दिखने लगा।

आज करीब 400 महिलाएं एसएचजी से जुड़ी हैं। इनमें से 150 से ज्यादा किचन गार्डन बन चुके हैं। महिलाएं ऑर्गेनिक तरीके से सब्जियां उगा रही हैं। कुछ महिलाओं को आगे की ट्रेनिंग दी गई। उन्हें ‘अलखा सखी’ बनाया गया। उनका काम अन्य महिलाओं को प्रेरित करना है। नरेंद्र बताते हैं, “करीब 15 स्वयं सहता समूह की लगभग 150 महिलाएं अब एनीमिया से मुक्त हो चुकी हैं।”

उन्होंने महिलाओं की आदतों में भी बदलाव किया। वह कहते हैं, “मैंने करीब 150 महिलाओं को खाली पेट चाय पीने की आदत छोड़ने के लिए प्रेरित किया। अब वे पहले कुछ खाती हैं, फिर चाय पीती हैं।” नरेंद्र ने अपने काम के साथ खुद भी बदलाव किया। उन्होंने बुक शॉप का काम छोड़ दिया। अब वह मोती की खेती और व्यापार कर रहे हैं।

उन्होंने करीब 150 किसानों को इस काम से जोड़ा है। वह खुद भी मोती खेती के मास्टर ट्रेनर हैं। इससे किसानों की आय बढ़ी है। संस्था महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर भी काम कर रही है। इसके लिए ‘गुदड़ी’ (पारंपरिक रजाई) बनाने का काम शुरू किया गया है। एसएचजी की महिलाएं इसे तैयार करती हैं। संस्था उन्हें ट्रेनिंग देती है। बाजार तक पहुंचाने में मदद करती है। इससे मिलने वाली आय से संस्था के काम को भी सहयोग मिलता है।

फिलहाल 15-20 महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं। आगे और महिलाओं को जोड़ने की योजना है। आने वाले समय में संस्था और बड़े लक्ष्य पर काम करना चाहती है। नरेंद्र ‘एनीमिया फ्री स्कूल’ और ‘एनीमिया फ्री गांव’ अभियान शुरू करना चाहते हैं। वह कहते हैं, “जब तक लोगों को सही पोषण नहीं मिलेगा, तब तक वे गरीबी के चक्र से बाहर नहीं निकल पाएंगे। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे कि इस स्थिति को बदला जा सके।”

नरेंद्र के लिए सबसे बड़ी खुशी क्या है? वह कहते हैं, “मेरे काम की सबसे बड़ी ताकत है लोगों का भरोसा। खासकर महिलाओं का। मैं इसे कभी टूटने नहीं दूंगा।”

नरेंद्र कुमार गर्वा, जयपुर जिले के किशनगढ़ रेनवाल में अलखा फाउंडेशन के संस्थापक और सीईओ हैं

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