कहानियां

आदिवासियों ने अपने खेतों के लिए मेहनत कर रास्ता बनाया

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में पोहरी से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव बसा है अहेरा मङखेड़ा। इस गांव में मुख्य रूप से आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं, जिनका जीवन खेती-किसानी और कड़ी मेहनत पर टिका है। लेकिन उनके सामने एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी थी। उनके खेतों तक पहुंचने का रास्ता।

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बकरी चराने से बीएससी तक निशा की कहानी

कोटड़ी अजमेर नागौर और जयपुर की सीमा पर बसा एक गांव है। रुपनगढ़ से 19 किलोमीटर दूर बसे इस गांव का पानी खारा है, जिससे यहां पर खरीफ सीजन की केवल एक ही फसल वर्षा के पानी से हो पाती है। ज्यादातर लोग खारे पानी की सांभर झील पर मजदूरी करने जाते हैं। वहां नमक बनाने का काम किया जाता है।

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प्राकृतिक खेती जुड़ी है मानवीय मूल्यों से

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया में कृषि का स्वरूप तेजी से बदला। रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और संकर बीज आधुनिक कृषि के आधार बन गए। खेती धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होती चली गई और उद्योगों पर निर्भर हो गई।

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लड़कियों के स्वास्थ्य को लगे पंख

यह कहानी किशोरी बालिका के स्वास्थ्य के लिए लड़ी गई जंग पर है। इसमें बालिका के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी यात्रा पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उनके जीवन में घटित घटनाओं से परियोजना तरंगिणी के पहले और बाद की स्थिति को बताया गया है। इस कहानी में बताया गया है कि किस तरह से उनके जीवन में स्वास्थ्य में परिवर्तन आया।

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रेगिस्तान में पानी की स्मृति और हरियाली की वापसी

थार के रेगिस्तान में दोपहर का समय केवल गर्मी नहीं, बल्कि जीवन की कठिन परीक्षा जैसा होता है। हवा में धूल घुली रहती है, तापमान 45–50 डिग्री तक पहुंच जाता है और दूर-दूर तक फैली रेत के बीच छोटे-छोटे घर जीवन की जिद का प्रतीक बनकर खड़े दिखाई देते हैं।

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बदलाव की बयार कटोरी

राजस्थान के एक छोटे से गांव में, जहाँ समय मानो ठहर सा गया था। वहां की महिलाओं के लिए जीवन किसी संघर्ष से कम नहीं था। सदियों से चली आ रही परंपराओं और सामाजिक दबावों ने महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद कर रखा था। उनके सपनों और महत्वाकांक्षाओं को समाज की दकियानूसी सोच ने दबा दिया था।

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चौका प्रणाली ने बदल दी लोगों की तकदीर…

चौका प्रणाली ने लोगों के चेहरों से गुम हुई हंसी ओर मुस्कुराहट को वापस लौटाया है। जब यह गांव ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा था, तब चौका ने इसे प्रेम की माला में संजोने जैसा कार्य किया है। इतना ही नहीं, लोगों को प्रकृति से जोड़ने की दिशा भी प्रदान की है। साथ ही, गांव के हर प्राणी को खुशी से जीवन जीने का आधार दिया है। गोचर को हरा-भरा करके पर्यावरण को संरक्षण और वन्य जीवों को सुरक्षा दी है। गांव में शांतिमय वातावरण बनने के साथ सब का विकास हुआ है आईये जानें, यह अद्भुत काम कैसे हुआ।

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गोपालपुरा गांव के चारागाह की दास्तान

कभी-कभी कुछ कहानियां छोटी होती हैं, लेकिन वो कम शब्दों में भी अपनी पूरी दास्तां बया कर देती है। ऐसी ही एक छोटी कहानी राजस्थान के जयपुर जिले के पास खारे पानी की सांभरलेक के किनारे बसे गांव गोपालपुरा की है। इस गांव का गौचर बंजर हो चुका है और शेष गौचर निजी स्वार्थों के कारण अतिक्रमण की भेंट चढ़ गया।

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हलमा से निकला समुदाय की समस्याओं का हल!

राजस्थान की अरावली पठार के बाँसवाड़ा जिले की तहसील घाटोल में बसा है पहाड़ी क्षेत्र वाला गांव मियासा। यहां रहने वाली जनजाति यहां की जैव-विविधता पर पूरी तरह निर्भर है। इसलिए यह जनजाति अपनी पुरातन परंपराओं और कुदरती ज्ञान को अपने अंदर समेटे हुए है। इसके चलते जंगल भी बचे हुए हैं और जनजाति समुदाय भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं।

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बंजर धरती ने यूं ओढ़ी हरियाली की चादर

राजस्थान के करौली जिले में चंबल नदी के किनारे बीहड़ में बसे गांव ओंड के छोटे और सीमांत किसान बारिश पर निर्भर थे। मिट्टी कटाव के कारण केवल 20% जमीन ही खेती लायक बची। लेकिन गांव वालों और सृजन संस्था के संयुक्त प्रयास से आज ओंद एक पुनर्जीवित गांव है।

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