उसके न दिखने की खुशी और सुकून

निधि तिवारी
विकास संवाद

आज फिर इतने सालों के बाद वैसा ही मंजर सामने आया। अपने ऑफिस जाने के लिए मैं रोज एक ही रास्ते से जाती हूं। आज मुझे रास्ते में एक चौराहे पर एक महिला दिखी, उम्र लगभग 30 साल होगी, इससे पहले मैंने उसे वहां कभी नहीं देखा था। कुछ सूदबुदाई सी वो महिला रास्ते पर अजीब तरीके से बैठी थी। उसके पास एक गंदे कपड़ों का पोटला था और एक गंदा गद्दा, जिस पर वो बैठी थी। मैंने उसे मेरी चलती गाड़ी में से एक नजर से बस देखा था, और मैं वहां से गुजर गई। लेकिन उस एक नजर में ही मानो सब कुछ हो गया।
मैं अब भोपाल में रहती हूं। रोज ही घर से दफ्तर और दफ्तर से घर के रास्ते में कई तरह की बातें, घटनाएं लोग सामने आते जाते हैं। पर आज जो कुछ सेकंड के लिए मेरी आंखों के सामने से गुजरा उसने जैसे मुझे अगले सेकंड में बीस साल पहले पहुंचा दिया। उस बात को याद करके आज भी मेरी रूह कांप जाती है।
बात उन दिनों की है जब मैंने समय कार्य में अपना मास्टर्स करने के बाद जमीनी काम सीखने की शुरुआत की थी। पढ़ाई के दौरान भी हमेशा की तरह कुछ नया सीखने के लिए मैं इंदौर के ही एक महिला स्वाधार केंद्र में जाया करती थी। यूं तो हमें अपनी पढ़ाई के दौरान काउंसिलिंग करना बखूबी सिखाया जाता है। empathy और sympathy का अंतर बताया जाता है, लेकिन उस दिन मेरे लिए मानो सब कुछ ठहर सा गया था।
उस दिन वहां सुबह लैंड्लाइन फोन पर रिंग आई और इतिफाक से मैंने ही वो फोन उठाया, पता चला कि एक महिला चोईथराम चौराहे पर संदिग्ध हालत में बैठी है। चूंकि स्वाधार केंद्र का काम विक्षिप्त और बेबस महिलाओं को आश्रय देना था, स्वाधार केंद्र की गाड़ी उसे ले जाने के लिए तैयार थी। हमारी डायरेक्टर ने कहा कि मैं भी साथ चली जाऊं, और मैं चल दी।
चौराहा के एक हिस्से में छोटी-सी खाली जगह थी, यहां कभी पार्क हुआ करता था लेकिन रखरखाव की कमी के कारण वो पूरा जर्जर हो चुका था। एक फटी-पुरानी चादर-गद्दे पर वो महिला वहां बैठी दिखी। वहां आस-पास के लोगों ने बताया कि ये महिला बहुत समय से यही बैठी है, वो अपनी जगह से उठती भी नहीं, किसी ने इसे घूमते नहीं देखा। हमें लगा शायद पैरों में परेशानी होगी, हमने उससे साथ चलने को कहां लेकिन वो महिला उठना ही नहीं चाहती थी।
बात करते हुए समझ आया उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। हमारी टीम ने तय किया किया उसे लेकर चलना ही होगा। उस महिला की उम्र लगभग 40 साल रही होगी। हमने बात करते हुए उसे पहले सहज किया, जैसे तैसे उसे साथ चलने को हां करवाया। थोड़ा लड़खड़ाते हुए वो उठी, हमारी टीम के लोगों ने उसे सहारा देकर उठाया। हमने देखा वो जिस गद्दे पर बैठी थी वहां छोटे-छोटे बहुत सारे कीड़े थे, जो निश्चित रूप से उसे काट रहे होंगे, लेकिन अपनी मानसिक स्थिति के चलते शायद वो समझ नहीं पायी। उसके पैरों में अकड़न के साथ बहुत से घाव थे।
मैं पूरी तरह से घबरा गई, उस महिला को देखकर मेरे हाथ-पैर कांपने लगे। शायद ये मेरा इस तरह का पहला अनुभव था इसलिए मैं थोड़ी बैचेन हो गई। खैर, हम लोग उस महिला को लेकर केंद्र पर पहुंचे। उसे अच्छे से नहलाकर, नए कपड़े पहनाकर खाना खिलाया गया। कुछ देर बाद डॉक्टर आए और उन्होंने उसके घाव का इलाज शुरू किया, साथ ही कुछ रूटीन टेस्ट किए। शाम तक रिपोर्ट आई, रिपोर्ट सुनकर सब हैरान हो गए। मुझे टीम से पता चला कि वो महिला जिसे हम सुबह लेकर आए थे वो गर्भवती है। मैं घर जाने के लिए निकल ही रही थी लेकिन ये खबर सुनकर मैं एकदम शून्य हो गई थी। मैं शायद ये मानने के लिए तैयार ही नहीं थी कि एक महिला की इस हालत में भी कोई पुरुष उसके साथ ऐसी हरकत कैसे कर सकता है? मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी, अपनी भावनाओं पर कंट्रोल नहीं कर पा रही थी। मैं रोज शाम को घर जाते हुए वहां सभी महिलाओं को बाय बोलते हुए जाती थी, कहती थी- “कल मिलती हूं, अच्छे से रहना।” उस दिन किसी से कुछ नहीं कह पाई।
एक तरफ गुस्सा आ रहा था, वही दूसरी ओर कुछ ना कर पाने की बेबसी थी। उस दिन के बाद मैं 2-3 दिन तक वहां जा नहीं सकी
लेकिन उसका चेहरा मेरी आंखों के आगे से जा नहीं रहा था। आज भी वो चेहरा आंखों में है। बहुत समय लगा मुझे खुद को उस बात को भूलाकर आगे बढ़ने में।
आज फिर इतने सालों के बाद वैसा ही मंजर सामने आया। अपने ऑफिस जाने के लिए मैं रोज एक ही रास्ते से जाती हूं। आज मुझे रास्ते में एक चौराहे पर एक महिला दिखी, उम्र लगभग 30 साल होगी, इससे पहले मैंने उसे वहां कभी नहीं देखा था। कुछ सूदबुदाई सी वो महिला रास्ते पर अजीब तरीके से बैठी थी। उसके पास एक गंदे कपड़ों का पोटला था और एक गंदा गद्दा, जिस पर वो बैठी थी। मैंने उसे मेरी चलती गाड़ी में से एक नजर से बस देखा था, और मैं वहां से गुजर गई। लेकिन उस एक नजर में ही मानो सब कुछ हो गया।
ऑफिस पहुंच कर भी मुझे उस महिला का चेहरा ही दिख रहा था। मैंने एक मित्र से पता किया कि इस स्थिति में क्या किया जा सकता है। उनकी सलाह पर मैंने 112 नंबर पर कॉल किया, उन्हें उस महिला की जानकारी दी। फिर कुछ देर बाद मेरे पास एक कॉल आया कि ये क्षेत्र हमारे थाने में नहीं आता, आप संबंधित थाना क्षेत्र बताइए फिर हम कुछ कर सकेंगे। मैंने इस क्षेत्र के थाने का पता किया और फिर से कॉल करके उन्हें बताया।
इस बार उन्होंने मेरी बात तुरंत क्षेत्र के अधिकारी से करवाई। मैंने पूरी बात उन्हें विस्तार से बताई और उनसे निवेदन किया कि वे उस महिला को जल्द से जल्द किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचाएं। उन्होंने मुझे आश्वासन दिया कि वे लोग पहुंच रहे हैं। मेरे मोबाइल पर एक भी मैसेज आया कि हम लोग 11:30 पर उस महिला तक पहुंच जाएंगे, लेकिन फिर भी मन अशांत था। थोड़ी देर बाद मेरे पास कॉल आया, एक महिला ने बताया आपने जिस महिला के बारे में बताया हम लोग उसे शिवाजी नगर के वन स्टॉप सेंटर पर ले आए है। मैंने राहत की सांस ली, शायद मैं इसी कॉल का इंतज़ार कर रही थी।
शाम को घर लौटते हुए मेरी आंखें उस चौराहे के आने के पहले से चौकन्नी हो गई थी, चौराहा पर पहुंच कर मैंने चारों ओर देखा, मुझे वो महिला नहीं दिखी। उसे वहां ना देखकर मुझे बहुत ही सुकून मिला। किसी के ना दिखने से भी सुकून मिल सकता है, ये मैंने उस दिन जाना।
