लडवारी की महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण

शबनम मंजरी
फाउंडेशन धौलपुर, राजस्थान

बुंदेलखंड अंचल के गांवों में जहां जनजीवन कर्ज के जाल में फंसा हुआ है वहीं लडवारी गांव की महिलाएं मंजरी फाउंडेशन से जुड़कर स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। टीकमगढ़ जिले के लडवारी और आसपास के गांवों में 273 स्वयं सहायता समूह कार्यरत हैं।
इनसे जुड़ी 2,500 महिलाओं ने 23 लाख रुपये से अधिक की सामूहिक बचत की है और 46 लाख रुपये का ऋण प्रवाह सुनिश्चित किया है।
बुंदेलखंड के उस धूसर और उदास अंचल में बसा लडवारी गांव, जहां की हवाओं में निर्धनता की महक और अभावों की धूल उड़ा करती थी। भौगोलिक रूप से मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले का यह हिस्सा अपनी कठोर ग्रेनाइट चट्टानों, पथरीली लाल मिट्टी और अत्यधिक ढाल वाली भूमि के लिए जाना जाता है। यहां की जमीन की जलधारण क्षमता इतनी कम है कि वर्षा का जल रुकने के बजाय बह जाता है, जिससे खेती करना यहां के किसानों के लिए एक निरंतर और थका देने वाला संघर्ष रहा है। यहां की जमीन जितनी सख्त है, यहां की पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना उससे भी कहीं अधिक गहरी और जड़ रही है।
गांव का भूगोल दो हिस्सों में बंटा था-एक ओर लडवारी खास की लगभग 872 प्राणों की धड़कनें थीं, तो दूसरी ओर लडवारी ताल के किनारे बसे 56 लोगों का छोटा सा संसार। किंतु इन दोनों ही आंकड़ों के भीतर एक मौन व्यथा छिपी थी। जनगणना की सूखी फाइलों में दर्ज 806-900 का वह संकुचित लिंगानुपात, साथ ही महिला साक्षरता (मात्र 32-40%) राज्य के औसत से काफी नीचे होना केवल एक संख्या मात्र नहीं था, बल्कि उस समाज का क्रूर दर्पण था जिसने सदियों से बेटियों के अस्तित्व को संशय की दृष्टि से देखा था। पुरुषों के वर्चस्व वाले इस समाज में महिलाओं की भूमिका केवल चूल्हे-चौके और खेतों में बेगार मजदूरी तक सीमित थी।
इसी गांव की एक संकरी गली के आखिरी छोर पर पान बाई का छोटा सा घर था। पचास बसंत देख चुकी पान बाई के मुख पर झुर्रियों की वे रेखाएं अंकित थीं, जो केवल उम्र ने नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की 45°C तक तपती धूप और जीवन की निष्ठुर चोटों ने उकेरी थीं। जब उनकी सात वर्षीय मासूम बेटी एक भीषण दुर्घटना का शिकार हुई, तो उनके सामने दो पहाड़ थे-एक आर्थिक तंगी और दूसरा समाज का वह संकुचित नजरिया जो महिला को ‘निर्णय लेने वाला’ नहीं मानता था।
गांव की सहानुभूति तो मिली, पर किसी ने घाव पर मरहम रखने के लिए आर्थिक हाथ आगे नहीं बढ़ाया।
विवश होकर उन्हें गांव के उस कठोर हृदय साहूकार की चौखट पर माथा टेकना पड़ा। वह कर्ज नहीं था, मानो एक अदृश्य बेड़ी थी जो उनके आत्म-सम्मान को हर दिन कसती जा रही थी। 3% से 5% प्रति माह की दर वाला वह सूद इतना ऊंचा था कि रात की नींद और दिन का चैन, दोनों ही उस साहूकार के बहिखाते में गिरवी रख दिए गए थे। किंतु नियति के क्रूर खेल के बीच वर्ष 2021 के उन धुंधले दिनों में एक मूक क्रांति का उदय हुआ, जब ‘मंजरी फाउंडेशन’ की एपीपीआई (APPI) परियोजना ने गांव की औरतों को एक सूत्र में पिरोना शुरू किया। शुरुआत में जब पान बाई ने ‘कुंडी शाह महाराज महिला समूह’ की चौखट लांघी, तो गांव के पुरुषों और बुजुर्गों ने इसे शक और उपहास की निगाह से देखा। लडवारी की गलियों में कानाफूसी होने लगी कि “अब औरतें घर चलाएं गी?” या “पैसे का हिसाब-किताब क्या ये अनपढ़ औरतें संभालेंगी?” पितृसत्तात्मक समाज के इस मूक प्रतिरोध के बावजूद पान बाई डटी रहीं।
पान बाई की इस व्यक्तिगत जिद के पीछे असल में मंजरी फाउंडेशन की वह व्यापक सोच थी, जो आज राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा के लगभग 900 से अधिक गांवों में 90,000 से अधिक महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों और किसान फेडरेशन के माध्यम से संगठित कर रही है। ‘महिला केंद्रित उद्यमिता विकास कार्यक्रम’ से पान बाई जैसी अनगिनत महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से मुक्त कराकर बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने और ‘कटोरी’ व ‘झुलकी’ जैसे ब्रांड्स के जरिए उनके उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने में संगठन ने जो आधार तैयार किया, उसी ने पान बाई को खड़े होने का हौसला दिया।
इसी क्रम में समूह के माध्यम से पान बाई को 50,000 रुपये का ऋण मिला, जो केवल कागज के टुकड़े नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म- उद्यमी (Micro-entrepreneur) के रूप में उनके नए जन्म का प्रमाण थे। उन्होंने पूरी तन्मयता से मुर्गी पालन का कार्य आरंभ किया। छोटे- छोटे चूजों की चहक में उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की किलकारी सुनाई देने लगी। यह केवल एक महिला की सफलता नहीं थी, बल्कि मंजरी फाउंडेशन द्वारा जलवायु संरक्षण, सौर ऊर्जा के विस्तार और ‘सेकंड चांस एजुकेशन’ जैसे नवाचारों से लिखी जा रही उस आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की एक जीवंत गाथा थी, जो सिद्ध करती है कि जब नेतृत्व महिलाओं के हाथ में होता है, तो पूरा समाज प्रगति करता है।
धीरे-धीरे, अपनी अथक मेहनत और समूह की सखियों के संबल से उन्होंने न केवल साहूकार का ऋण चुकाया, बल्कि पशुपालन और खेती के लिए ट्रैक्टर जैसे संसाधनों में भी अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित की। पान बाई की यह व्यक्तिगत विजय वास्तव में एक विशाल सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा थी।
आज लडवारी और आसपास की स्त्रियां 273 स्वयं सहायता समूहों का नेतृत्व कर रही हैं, जिनमें 2,500 से अधिक सदस्य शामिल हैं। इन महिलाओं ने मिलकर 23 लाख रुपये से अधिक की सामूहिक बचत की है और 46 लाख रुपये का ऋण प्रवाह सुनिश्चित किया है। शासन, वित्तीय प्रबंधन और नेतृत्व के प्रशिक्षण ने उन्हें गांव के बड़े निर्णयों में बोलने का साहस दिया। अब जब पान बाई या उनके समूह की कोई महिला बैंक जाती है या बाजार में सौदेबाजी करती है, तो गांव के लोग उन्हें ‘बेबस’ नहीं, बल्कि ‘सक्षम कारोबारी’ के रूप में देखते हैं। उनकी वित्तीय समझ ने गांव की उन रूढ़िवादी दीवारों को ढहा दिया है जो स्त्रियों को घर की चारदीवारी तक सीमित रखती थीं।
यह क्रांति केवल तिजोरियों तक सीमित नहीं रही; लडवारी की प्यासी धरती ने भी अपना रंग बदला। टीकमगढ़ की अर्ध-शुष्क जलवायु की भौगोलिक विषमताओं को चुनौती देते हुए परियोजना के तहत 10 खेत तालाबों और चेक डैम्स का निर्माण हुआ, जिससे जल स्तर में सुधार हुआ और 300 एकड़ बंजर भूमि पर सिंचाई की हरियाली छा गई। खेती की पैदावार में 40% की वृद्धि हुई और पशुपालन, विशेषकर बकरी पालन में 29% का सुधार देखा गया। घर के पिछवाड़े बनी ‘पोषण वाटिकाओं’ ने बच्चों और महिलाओं की थाली में सेहत के रंग भर दिए। जब कोविड-19 की महामारी ने दुनिया को थाम दिया, तब भी ये महिला संगठन नहीं डिगे। उन्होंने राशन वितरण और स्वास्थ्य जागरूकता के जरिए न केवल अपनों को बचाया, बल्कि समुदाय के बंधनों को और गहरा किया।
आज पान बाई उस धूल भरी गली की साधारण स्त्री मात्र नहीं हैं; वह उस महासंघ का गौरव हैं जहां सैकड़ों स्त्रियां अपनी नियति खुद लिख रही हैं। उनकी बेटी ने 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की और उसका विवाह बिना किसी अपमानजनक कर्ज के संपन्न हुआ। पान बाई ने सिद्ध कर दिया कि जब एक महिला का ‘अभिमान’ उसकी ‘आत्मशक्ति’ और ‘वित्तीय निर्णय’ में बदलता है, तो वह पूरे समाज का अंधकार सोखने की क्षमता रखती है।
पान बाई के शब्दों में, “मंजरी फाउंडेशन की एपीपीआई (APPI) परियोजना ने पान बाई को ना सिर्फ एक नायिका की भांति खुद को सिद्ध करने में मदद की बल्कि यह भी सिखाया कि स्त्री का ‘अभिमान’ जब ‘आत्मशक्ति’ में बदलता है, तो वह पूरे समाज का अंधकार सोखने की क्षमता रखती है।” यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस विरासत की है जो जल संरक्षण और सूक्ष्म उद्यमिता के मेल से एक नए ग्रामीण भारत का निर्माण कर रही है।
