ठुकराई गई, लेकिन हारी नहीं

ईशा टंडन
संस्थापक और डायरेक्टर – आसरा फाउंडेशन, महासमुंद, सिरपुर, छतीसगढ़

बचपन में ही अपने पिता द्वारा ठुकरा दी गई एक लड़की। हालात ऐसे थे कि कोई भी टूट सकता था। लेकिन ईशा टंडन ने हार नहीं मानी। उन्होंने न सिर्फ खुद को खड़ा किया, बल्कि सैकड़ों लोगों के लिए सहारा बन गईं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के एक छोटे कस्बे में NGO शुरू किया। यह संस्था महिलाओं के सशक्तिकरण, कौशल विकास, शिक्षा और कई सामाजिक मुद्दों पर काम करती है।

ईशा चाहतीं तो एक आरामदायक जिंदगी जी सकती थीं। उनका परिवार ओडिशा से था। उनके पिता छत्तीसगढ़ (तब मध्य प्रदेश का हिस्सा) में फॉरेस्ट रेंजर थे। उनकी अच्छी कमाई थी और जीवन भी ठीक चल रहा था। लेकिन ईशा को जन्म से पहले ही ठुकरा दिया गया था। ईशा बताती हैं कि उनकी मां, उनके पिता की दूसरी पत्नी थीं। पिता की पहली शादी से बेटियां पहले से थीं।

वह कहती हैं, “जब मैं मां के गर्भ में थीं, तो कुछ ज्योतिषियों ने पिता से कहा कि फिर बेटी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह बेटी उनके लिए अच्छी नहीं होगी।”“इसके बाद पिता ने मां को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उन्हें मजबूर होकर मायके लौटना पड़ा। वहीं मेरा जन्म हुआ।”ईशा के पिता ने कभी उनकी खबर तक नहीं ली। न ही मिलने आए। कुछ दिन बाद मामा उन्हें पिता के घर ले गए। लेकिन वहां हालात और खराब हो गए। सिर्फ 15 दिन के भीतर उनकी मां को फिर से मायके लौटना पड़ा।

ईशा बताती हैं, “मैं अपने पिता के घर सिर्फ 15 दिन ही रह पाई।”ननिहाल में भी हालात आसान नहीं थे। आर्थिक तंगी थी। मां की तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी। सब कुछ तब और खराब हो गया, जब ईशा 15 साल की थीं। वह 10वीं में पढ़ रही थीं। इसी दौरान उनकी मां का निधन हो गया। इसके बाद उनका जीवन और कठिन हो गया। वह कहती हैं, “मौसियों का व्यवहार बदल गया। मैं खुद को अनचाहा और अकेला महसूस करने लगी।”

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने आगे पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया। ईशा महासमुंद शहर चली गईं। वहां उन्होंने हायर सेकेंडरी की पढ़ाई शुरू की। उनकी नानी ने उनका साथ दिया। उन्होंने अपनी थोड़ी-सी सोने की ज्वेलरी बेचकर ईशा को शुरुआती पैसे दिए। ईशा शहर में एक छोटे और खराब कमरे में किराए पर रहने लगीं। इसी दौरान एक महिला पड़ोसी ने उन्हें एक NGO में नौकरी के बारे में बताया। यह संस्था विकास समिति थी।

ईशा उस संस्था में गईं। काफी इंतजार के बाद उनकी मुलाकात संस्थापक अश्विनी कुमार टोंड्रे से हुई। उनकी उम्र कम थी और वह पढ़ाई कर रही थीं। इसलिए शुरुआत में उन्हें काम देने से मना कर दिया गया। लेकिन ईशा ने हार नहीं मानी। आखिरकार उन्हें एक छोटा काम मिला। उन्हें inward-outward रजिस्टर संभालने की जिम्मेदारी दी गई। इसके लिए उन्हें 1500 रुपए महीने मिलते थे।

इस नौकरी को निभाने के लिए उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। धीरे-धीरे उन्होंने काम सीखना शुरू किया। जो भी काम मिलता, वह खुद आगे बढ़कर करती थीं। कुछ ही सालों में उन्हें प्रमोशन मिला। उन्हें माइक्रोफाइनेंस का काम संभालने की जिम्मेदारी दी गई। वह जरूरतमंद लोगों को आजीविका के लिए लोन दिलाने में मदद करने लगीं। इसके बाद उन्हें लोन रिकवरी का काम भी दिया गया।

ईशा बताती हैं,  “शुरुआत में कोई मुझे गंभीरता से नहीं लेता था। जब मैं पैसे लेने जाती थी, तो लोग मुझे डांटते थे, अपमान करते थे। मैं कई बार रोते हुए लौटती थी। तब अश्विनी सर ने कहा कि अगर आगे बढ़ना है, तो अंदर से मजबूत बनना होगा। धीरे-धीरे मैं मजबूत होती गई।” उन्होंने सरकारी अधिकारियों से भी संपर्क करना शुरू किया। वह फंड और बिल पास कराने का काम करने लगीं। धीरे-धीरे महासमुंद के सरकारी दफ्तरों में लोग उन्हें पहचानने लगे। उनका काम आसान होने लगा।

ईशा को लगने लगा कि वह संस्था का बड़ा हिस्सा संभाल रही हैं। उस समय उनकी सैलरी 15 हजार रुपए थी। उन्होंने बढ़ाने की मांग की, लेकिन मना कर दिया गया। इसके बाद 2013 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने कुछ समय के लिए अलग-अलग जगहों पर काम किया। इसमें ब्लड बैंक और शेयर मार्केट एजेंसी भी शामिल थीं। अपने अनुभव के आधार पर वह NABARD और अन्य बैंकों के लिए SHG (स्वयं सहायता समूह) की ट्रेनर बन गईं।

जैसे-जैसे उनका अनुभव बढ़ा, उन्होंने समाज की समस्याओं को गहराई से समझना शुरू किया। तब उन्होंने तय किया कि अब खुद कुछ करना है। 2015 में आसरा फाउंडेशन की शुरुआत हुई। इसमें उनकी सहयोगी थीं—भुवनेश्वरी ध्रुव, जो खुद भी SHG ट्रेनर थीं। उन्होंने तय किया कि छोटे क्षेत्र में काम करेंगे। इसलिए सिरपुर को चुना गया। संस्था महिलाओं के सशक्तिकरण, आजीविका, कौशल विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा पर काम करती है। यह स्कूल छोड़ चुके बच्चों के लिए भी काम करती है। इसके अलावा पर्यावरण, घरेलू हिंसा और नशा मुक्ति जैसे मुद्दों पर भी काम किया जाता है।

ईशा बताती हैं कि सरकारी विभागों की समझ और पुराने संपर्क उनके काम आए। इससे उन्हें लगातार फंडिंग मिलती रही। 2016 में उनकी संस्था को स्किल इंडिया मिशन के Recognition of Prior Learning (RPL) प्रोजेक्ट में शामिल किया गया। व्यक्तिगत जीवन में भी उन्होंने नई शुरुआत की। उन्होंने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की और 2018 में ग्रेजुएशन पूरा किया।

जो कभी बिना स्थायी घर के थीं, आज उनका अपना घर है। आगे उनका सपना और बड़ा है। वह एक वृद्धाश्रम और अनाथालय खोलना चाहती हैं। ऐसे लोगों के लिए, जिनके पास कोई सहारा नहीं है। साथ ही, वह नई तकनीकों के आधार पर महिलाओं को सशक्त बनाना चाहती हैं। ताकि वे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहें।

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