बंधुआ मजदूरी के खिलाफ एक मुहिम जारी है!

आंचल गार्डिया
जन जागृति केंद्र, महासमुंद, छतीसगढ़

लगभग पांच  दशक पहले कुछ युवाओं ने अपने समाज की पीड़ा को बहुत करीब से महसूस किया। तब दलित समुदाय के लोग छुआछूत, अपमान और अमानवीय जीवन जीने को मजबूर थे। भूमिहीनता और आर्थिक कमजोरी ने उन्हें जमींदारों का गुलाम बना दिया था, जहां  वे पीढ़ियों तक बंधुआ मजदूरी करने को विवश थे। जीवन की बुनियादी जरूरतों और परिवार में जन्म, विवाह या मृत्यु से जुड़े सामाजिक रिवाजों को निभाने के लिए यह समुदाय बंधुआ मजदूरी और पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्ज के जाल में फंसा हुआ था। इन अमानवीय परिस्थितियों को बदलने के संकल्प के साथ ‘जन जागृति केंद्र’ की स्थापना हुई। 

संस्था से जुड़े युवाओं ने जमीनी हकीकत को समझने के लिए सीधे समुदाय के बीच जाना शुरू किया। दिन में काम में बंधे होने के कारण वे रात में परिवारों से मिलते, उनकी समस्याएं  सुनते और उनकी जीवन परिस्थितियों को समझते। इन चर्चाओं में यह सामने आया कि 500 से 5000 रुपये के छोटे कर्ज के लिए पूरे परिवार को पीढ़ियों तक बंधुआ मजदूरी करनी पड़ रही है। यहां  परिवार का हर सदस्य अपनी क्षमता से अधिक काम करता था-बुजुर्ग और बच्चे मवेशियों की देखभाल करते, युवा खेतों और बाहरी कार्यों में लगे रहते, और महिलाएं  घर के सभी काम करतीं, सिवाय खाना बनाने के। दिनभर की कठोर मेहनत के बदले उन्हें मात्र एक ‘टामी’ धान मिलता था, जो एक किलो से भी कम होता था। इसी से उनका जीवन-यापन होता था। यह स्थिति केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय गरिमा का भी हनन थी।

जन जागृति केंद्र की पहल 

80-90 के दशक में बंधुआ मजदूरों के हक में जन जागृति केन्द्रों की स्थापना हुई। इसका विस्तार छत्तीसगढ़ राज्य के महासमुंद,कसडोल,बिलासपुर,रायगढ़ और बलौदा बाजार जिले में हुआ। समान विचारधारा वाली संस्थाओं के सहयोग से हजारों खेतिहर बंधुआ मजदूरों का दस्तावेजीकरण किया गया और एक सामाजिक वकील के माध्यम से याचिकाएं दायर की गईं। इस लंबी प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप शासन के सहयोग से लगभग 5000 बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया गया और उनका पुनर्वास सुनिश्चित किया गया। यह पुनर्वास केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि जीवन को नई दिशा देने का प्रयास था। पुरुषों को विभिन्न रोजगार उपकरण और प्रशिक्षण दिए गए, बच्चों को स्कूलों में दाखिला मिला, और महिलाओं को बिना मजदूरी के काम करने से मुक्ति मिली। उनके दैहिक शोषण पर रोक लगी और उन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य मिलने लगा।

मथुरा दीदी का जीवन संघर्ष 

बंधुआ मजदूरों की स्थिति को समझने के लिए मथुरा दीदी का जीवन संघर्ष एक सशक्त उदाहरण है। महासमुंद जिला अंतर्गत सरायपाली ब्लॉक के बेलमुंडी गांव  की58 वर्षीयमथुरा बताती हैं कि उनके परिवार ने शादी के लिए एक मालगुज़ार से  5000 रुपये कर्ज लिया था जिसे चुकाने के लिए पूरे परिवार को बंधुआ मजदूरी करनी पड़ी। उनके परिवार का हर सदस्य मालगुज़ार के लिए दिनभर काम करता था, ससुर मवेशियों को चराने ले जाते, पति खेतों और बाहरी कामों में लगे रहते, और मथुरा दीदी घर का पूरा काम संभालतीं थी। 

मालगुजार परिवार के कुछ पुरुषों की बुरी नजर मथुरा दीदी पर पड़ी और उन्होंने अनुचित प्रयास भी किए, लेकिन उन्होंने साहस से खुद को सुरक्षित रखा। इसी दौरान जन जागृति केंद्र के साथी सर्वेक्षण कर रहे थे। जानकारी मिलने पर मथुरा दीदी और उनके पति ने संस्था से मदद मांगी और चल रहे आंदोलन में शामिल हो गए। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप उनका परिवार भी मुक्त हुआ और पुनर्वास मिला। संस्था के कार्य से प्रेरित होकर दोनों ने संगठन से जुड़कर अन्य साथियों के अधिकारों की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की और आज भी पूरी प्रतिबद्धता के साथ इस संघर्ष का हिस्सा हैं।

मजदूरों के सुरक्षित पलायन के लिए पैरवी

पांच दशकों के इस सफर में संस्था के कार्यों में समय के साथ बदलाव आया। मुक्ति और पुनर्वास के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि लोग दोबारा उसी जाल में न फँसें। इस दिशा में महिलाओं के अधिकार, मजदूरों के अधिकार, समान काम के लिए समान मजदूरी और मानवाधिकारों पर व्यापक कार्य हुआ। लोगों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी शुरू की। इसी दौरान खेती में मशीनीकरण बढ़ा और रोजगार के अवसर कम होने लगे, जिससे लोगों को पलायन करना पड़ा। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ क्षेत्र के मजदूरों को अकुशल मानकर ईंट-भट्टों, सड़क निर्माण और भवन निर्माण में काम करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में बंधुआ मजदूरी का स्वरूप बदल गया-दलाल अग्रिम पैसे देकर मजदूरों को दूर-दराज़ के क्षेत्रों में ले जाने लगे, जहां उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में रहना और काम करना पड़ता था। इस चुनौती से निपटने के लिए संस्था ने सुरक्षित पलायन और बंधुआ मुक्ति पर फिर से ध्यान केंद्रित किया। कार्य की पद्धति में बदलाव आया, लेकिन उद्देश्य वही रहा वंचित समुदाय के समता और गरिमा के लिए रचनात्मक पहल करना।

संस्थागत चुनौतियों से आगे बढ़ते हुए

वर्ष 2019 में ‘एफसीआरए’ रद्द होने के कारण संस्था के कार्यों पर गहरा प्रभाव पड़ा, लेकिन साथियों ने अपने स्तर पर प्रयास जारी रखे। इसी दौरान एक नई सोच ने जन्म लिया मजदूरों को उनके ही गांव में रोजगार उपलब्ध कराया जाए, ताकि उन्हें पलायन न करना पड़े। इसके लिए समुदाय के साथ संवाद किया गया और यह समझने की कोशिश की गई कि गांव का पारंपरिक आर्थिक चक्र क्यों टूट गया। पाया गया कि खेती में मजदूरी के अवसर कम हो गए हैं और जंगल आधारित संसाधन भी समाप्त हो रहे हैं। ऐसे में लोगों के पारंपरिक कौशलों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता महसूस हुई।

इस क्रम में बुनाई, झाड़ू निर्माण, प्राकृतिक खेती और जंगल उत्पादों पर आधारित आजीविका के छोटे-छोटे प्रयास शुरू किए गए। आज कुछ परिवार कपड़ा बुन रहे हैं, कुछ झाड़ू बनाकर बाजार में बेच रहे हैं, और कुछ किसान प्राकृतिक खेती अपनाकर अपनी आजीविका को मजबूत बनाने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। उनका यह प्रयास भले ही छोटे स्तर पर हों, लेकिन आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। पांच दशकों की इस यात्रा में हजारों संघर्ष और सफलताएं जुड़ी हुई हैं। यह केवल एक संस्था की कहानी नहीं, बल्कि उन लोगों की कहानी है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी।

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