बाल स्वराज : बालमित्र दुनिया का एक सपना

मधु सिंह
वाग्धारा, जयपुर

बाल स्वराज यूं तो वाग्धारा संस्था द्वारा संचालित बच्चों के समूह का एक नाम है। इसके पीछे एक बालमित्र दुनिया बनाने का वह व्यापक सपना है जहां हर बच्चे को उसका अधिकार मिल सके। जहां कम उम्र में लड़के-लड़कियों को ब्याहा न जाए उनसे उनके सपने, उनकी पढ़ाई उनका स्वास्थ्य न छीना जाये। बांसवाड़ा राजस्थान के आदिवासी अंचल में इसी दिशा में जारी है जागरूकता की एक सामुदायिक पहल।
अप्रैल का महीना और बांसवाड़ा का आदिवासी अंचल, जैसे जीवन के कई रंगों को एक साथ समेटे हुए आता है-सुबह की हल्की ठंडक और दोपहर की तेज धूप के बीच एक किसान परिवार की दिनचर्या बदलती दिखाई देती है। खेतों में पकी फसल की कटाई के साथ पूरे परिवार के हाथ काम में लगे होते हैं, तो वहीं जंगलों में बिखरे महुआ के फूल इन परिवारों के लिए उम्मीद और आजीविका दोनों बन जाते हैं। इसी बीच गांवों में शादी-विवाह का मौसम भी पूरे उल्लास के साथ जीवंत हो उठता है। ढोल-मांदल की थाप, रंग-बिरंगे परिधान और संस्कृति को जीवंत करते हुए सामूहिक नृत्य-गीत, थकान भरे दिनों में भी खुशियों का संचार करते हैं। लेकिन इन उत्सवों के पीछे एक सच्चाई भी चलती है-सूखते कुएं, दूर होते जलस्रोत और बढ़ती गर्मी, जो खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए चुनौतियाँ बढ़ा देती है। भौगोलिक कठिनाइयों से घिरा हुआ पहाड़ी भू-भाग, बिखरी बसाहट की परिस्थितियाँ यहाँ लोगों के जीवन, आजीविका, परंपराओं और सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित करती हैं।
अप्रैल माह की सुबह ही थी, 10:30 बजे के आस-पास का समय रहा होगा, वाग्धारा द्वारा संचालित चाइल्ड लाइन की टीम अपने दैनिक व्यस्तताओं में लीन थे। कार्यालय में फोन की आवाज़ ने सबका ध्यान फोन की घंटी की ओर आकर्षित किया, फोन उठाकर बात करने वाले ने सुना, यह आवाज़ एक घबराई हुई बालिका की थी जिसने पूरे परिदृश्य के पीछे छिपे एक कड़वे सच को सामने ला दिया। मैं पार्वती बोल रही हूँ मेरी उम्र 14 वर्ष है और मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती हूँ। घाटोल पंचायत के मेमखोर गाँव में मेरा घर है। कल मेरा विवाह है और मैं अभी शादी नहीं करना चाहती मेरे परिवार के लोग ज़बरदस्ती मेरा विवाह करवा रहे हैं जबकि मैं अभी पढना चाहती हूँ । कुछ चीजें शब्दों से परे होती हैं, सुनने वाले ने बताया कि आदिवासी भील परिवार की बालिका की आवाज़ में डर, गोपनीयता की गुजारिश, और अपने भविष्य को बचाने की जिद और उम्मीद को भी महसूस किया । एक ओर परिवार की आर्थिक मजबूरी, समाज का दबाव और परंपराओं की बेड़ियाँ थीं-जहां पिता एक मजदूर हैं और विवाह के बदले मिलने वाले पैसों को सहारा समझ रहे थे-तो दूसरी ओर एक नन्हीं लड़की का सपना था, जो किताबों से जुड़ा रहना चाहती थी। चाइल्ड हेल्प लाइन नंबर 1098 पर आये इस कॉल पर बालिका पार्वती को गोपनीयता और उनका साथ दिए जाने के लिए आश्वासत किया गया।
वाग्धारा, चाइल्ड लाइन की टीम ने तुरंत प्रभाव से पुलिस से सम्पर्क स्थापित किया और विस्तार पूर्वक उनके साथ जानकारियाँ साझा की गयी, पुलिस और टीम इस कार्य में जुट गए क्योंकि सबके लिए यह महत्वपूर्ण था कि बाल विवाह को रुकवा सकें। चाइल्ड लाइन की पूरी टीम और पुलिस निरीक्षक बालिका के घर मौके पर पहुंचे, मौके पर पहुँची टीम ने बिल्कुल वही पाया जैसा पार्वती ने कॉल करके बताया था । गाँव में अचानक पहुँची पुलिस और 1098 की टीम से समुदाय में हलचल हो गयी, समुदाय के सभी लोग भीड़ के रूप में जिज्ञासु बनकर खड़े हो गए। पार्वती के परिवार में डर, घबराहट, बदनामी और चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी।
पूरी टीम ने उपस्थित जन समुदाय और पार्वती के परिवार की काफी धैर्यपूर्वक कानूनी जानकारी, बालिका की शिक्षा बीच में रुक जाने से, उसके विवाह के बाद समय से पूर्व माँ बनने के नुकसान, कम उम्र में माँ बनने से माँ और बच्चे दोनों की जान को खतरा आदि इत्यादि के साथ समझाइश के साथ संवाद स्थापित किया। उन्हें यह हवाला दिया गया की खेलने कूदने की उम्र में बालिका को अनावश्यक ज़िम्मेदारियों में बांध देना ठीक नहीं।
मां असमंजस में थी-समाज की परंपराओं और अपनी बेटी के भविष्य के बीच उलझी हुई थी लेकिन अचानक माँ की आँखों में एक तरह की राहत झलकने लगी-जैसे किसी ने उनकी अंदरूनी दुविधा को आवाज़ दे दी हो। समाज का दबाव, आर्थिक रूप से मजबूर और विवश पिता के मन में अब अपनी बेटी के भविष्य की चिंता और सुरक्षा का भाव भी उभरने लगा। समुदाय के कुछ बुजुर्ग शुरुआत में इसे “परंपरा में दखल” मान रहे थे, तो कुछ युवा और महिलाएँ चुपचाप यह सुन रहे थे कि टीम क्या समझा रही है। लोगों के भीतर जो डर पहले पुलिस को देखकर था, वह धीरे-धीरे समझ और सोच में बदलने लगा-खासतौर पर जब यह बताया गया कि बाल विवाह करने पर सज़ा भी हो सकती है। अंततः एक नई समझ और राहत के अहसास के साथ विवाह रोकने का निर्णय लिया गया। यह घटना गाँव के लिए भी एक सीख बनकर उभरी, जहाँ लोगों ने पहली बार परंपरा और कानून के बीच संतुलन को समझना शुरू किया।

अगले माह वाग्धारा के समुदाय सहजकर्ता ने बाल स्वराज समूह की मासिक बैठक के दौरान पार्वती को भी बैठक से जुडा हुआ पाया। बैठक के दौरान आयोजित गतिविधियों के दौरान बालिका के अंतर्मन की खुशी को उसकी आँखों की चमक बयान कर रही थी। बैठक के बाद एकांत में बालिका ने खुलकर समुदाय सहजकर्ता को बताया कि वह नियमित रूप से विद्यालय जा रही है, और परिवार जनों को यह समझ में आ गया कि कम उम्र में शादी करने से जेल भी हो सकती है। बालिका ने यह भी बताया कि विवाह रोक दिए जाने की बात पूरे गाँव में फ़ैल गयी थी और विद्यालय का शिक्षक समूह उसके घर पर मिलने के लिए आया और परिवार के लोगों को समझाया था ।
बालिका ने बताया कि मेरे साथ मेरी कक्षा में पढने वाली मेरी सहेली जो कि गाँव में गठित बाल स्वराज समूह से पहले से ही जुडी हुई है। ग्राम स्तर पर आयोजित मासिक बैठक में चर्चाओं के दौरान उसे 1098 और बाल विवाह के नुकसान के बारे में समझ बनाई थी और वो मेरी मदद कर पाई। उसने जब मेरे विवाह के बारे जाना, मेरी मन: स्थिति को भी समझा, उसके दिमाग में यह विचार आया और उसके सहयोग से बनी योजना से ही यह संभव हो सका। विवाह न करने के निर्णय से परिवार बहुत खुश है, और मानते हैं कि समाज और समुदाय की संकुचित सोच और अपनी मजबूरियां ही उन्हें बाल विवाह करने को विवश कर देती है।
अपने गाँव के बाल स्वराज समूह की सक्रिय सदस्य यह बालिका नियमित रूप से बैठकों में सक्रिय भूमिका निभाती है और गाँव के अन्य बच्चों को आ रही समस्याओं को समूह की मासिक बैठक में सामने लाकर समाधान निकालने में अहम् भूमिका निभाती है। पार्वती के गाँव मेमखोर की ही तरह वाग्धारा ने भारत के दक्षिणी राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के आदिवासी बहुलता के त्रि-संगम/ट्राइ-जंक्शन पर 1500 से अधिक गाँवों में (8-18 वर्ष की आयुवर्ग) 10-बालक और 10 बालिकाओं को मिलाकर 20 बच्चों के बाल स्वराज समूह, समुदाय से 10 महिला और 10 पुरुषों को मिलाकर 20 सदस्यों के ग्राम स्वराज समूह और महिला किसानो के नेतृत्व को सशक्त करने के क्रम में 20 महिला किसानों का सक्षम समूह भी बना हुआ है। वाग्धारा की ग्राम स्वराज की संकल्पना को सुनिश्चित करने के क्रम में सभी संगठन स्थानीय, पारम्परिक ज्ञान, समझ और प्रथाओं को एकीकृत समुदाय में स्थायी आजीविका सुनिश्चित करने और बचपन के अहसास को साकार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
पार्वती का नियमित रूप से विद्यालय से जुड़ना केवल उसकी व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि वाग्धारा संस्था का आदिवासी क्षेत्र के 0-18 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के लिए बाल स्वराज अर्थात “बाल हितैषी गाँव” की संकल्पना को साकार करने की दिशा में उठने वाला एक ठोस कदम है, एक ऐसा गाँव जहाँ 0-18 वर्ष तक की आयु का प्रत्येक बच्चा अपने अधिकारों के साथ, सुरक्षित और आनंदपूर्वक जीवन जी सके। ट्राइ-जंक्शन के आदिवासी क्षेत्र के इन सभी गांवों में वाग्धारा के 2 दशक से भी अधिक वर्षों के निरंतर प्रयासों के साथ, यह भरोसा और भी मजबूत होता है कि स्वराज की दिशा में बढ़ते कदम एक दिन ऐसे समाज का निर्माण करेंगे, जहाँ हर पार्वती बिना डर के अपने सपनों को जी सकेगी। और अपने सच्चे बचपन का आनंद उठा सकेगी।
समुदाय के विचार
समाज के दबाव और गरीबी के कारण बिटिया का जल्दी विवाह करने का फैसला लिया था, हमें इसके नुकसान और कानून की जानकारी नहीं थी। आज समझ में आ गया कि बेटी की पढ़ाई और आत्मनिर्भर भविष्य ज्यादा जरूरी है-अब हम उसकी पढ़ाई जारी रखेंगे और सही उम्र में ही विवाह करेंगे।
— राजू ढिंढोर, पिता
वाग्धरा ने हमारे गाँव में आकर हमें बच्चों के अधिकार की सुरक्षा करने को लेकर जागरूक किया है। पहले हम बाल विवाह को परंपरा मानकर नजरअंदाज कर देते थे, लेकिन अब हमें समझ आ रहा है कि बच्चों का बचपन एक स्वर्णिम अवसर होता है जिसे संरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।
— प्रभुलाल गरासिया, समुदाय सदस्य
हमें बाल स्वराज समूह की बैठकों के माध्यम से अपने अधिकारों, बाल विवाह के नुकसान और चाइल्ड लाइन 1098 के बारे में जानकारी मिली। जब पार्वती ने अपनी समस्या बताई, तो मुझे लगा कि अब चुप रहने का समय नहीं है-हमने मिलकर हिम्मत की और सही कदम उठाया, ताकि उसकी पढ़ाई और बचपन दोनों सुरक्षित रह सकें।
— सोना, सहेली
क्षेत्र के आदिवासी परिवारों में सामाजिक दबाव और आर्थिक परिस्थितियों के कारण कम उम्र में बच्चों की शादी कर देते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई बीच में छूट जाती है। हम लगातार अभिभावकों को समझाने की कोशिश करते हैं कि शिक्षा और सही उम्र में विवाह ही बच्चों के बेहतर भविष्य की कुंजी है। इस काम में वाग्धारा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
— मंजूलता, शिक्षिका
आदिवासी समाज में बाल विवाह और शिक्षा को लेकर जागरूकता तो आ रहा है लेकिन इस कुरीति को जड़ से खत्म करने के लिए पहल में समाज, सरकार और संस्थाओं को निरंतर की जरूरत है।
— रमेश ताबियार, समुदाय सहजकर्ता
