अप्रैल 2026

सिविल सोसायटी – सत्यनिष्ठ आख्यान से दूरी क्यों?

संकट तब नहीं होता है, जब फंदा कसा जा रहा होता है और बेड़ियाँ डाली जा रही होती हैं और समाज से दूरियां बढ़ रही होती हैं। संकट तब होता है जब फंदे और बेड़ियों में स्वयं को संयोजित या बैठ-बिठाव किया जाने लगता है, उस व्यवस्था से समन्वय स्थापित किया जाने लगता है। फिर उस फंदे कसने वाली, बेड़ियाँ डालने वाली और समाज से दूरियां बढ़ाने के लिए मजबूर करने वाली व्यवस्था से समन्वय और मान्यता की अपेक्षा की जाने लगती है और स्वतः स्फूर्त पहल की जाने लगती है।

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आदिवासियों ने अपने खेतों के लिए मेहनत कर रास्ता बनाया

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में पोहरी से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव बसा है अहेरा मङखेड़ा। इस गांव में मुख्य रूप से आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं, जिनका जीवन खेती-किसानी और कड़ी मेहनत पर टिका है। लेकिन उनके सामने एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी थी। उनके खेतों तक पहुंचने का रास्ता।

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बकरी चराने से बीएससी तक निशा की कहानी

कोटड़ी अजमेर नागौर और जयपुर की सीमा पर बसा एक गांव है। रुपनगढ़ से 19 किलोमीटर दूर बसे इस गांव का पानी खारा है, जिससे यहां पर खरीफ सीजन की केवल एक ही फसल वर्षा के पानी से हो पाती है। ज्यादातर लोग खारे पानी की सांभर झील पर मजदूरी करने जाते हैं। वहां नमक बनाने का काम किया जाता है।

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प्राकृतिक खेती जुड़ी है मानवीय मूल्यों से

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया में कृषि का स्वरूप तेजी से बदला। रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और संकर बीज आधुनिक कृषि के आधार बन गए। खेती धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होती चली गई और उद्योगों पर निर्भर हो गई।

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