परंपरागत खेती और पोषण वाटिका से आत्मनिर्भर बनी रामुड़ी बाई

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के सज्जनगढ़ ब्लॉक के छोटे से गाँव पालीबड़ी में रहने वाली रामुड़ी बाई एक ऐसी ग्रामीण महिला हैं, जिन्होंने मेहनत, सीख और सामूहिकता के बल पर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की है। उनका जीवन संघर्ष, साहस और बदलाव की एक प्रेरणादायक कहानी है।
रामुड़ी बाई के परिवार में छह सदस्य हैं—पति पारसिंह मुनिया, दो बेटे और दो बेटियाँ। दोनों बेटियों का विवाह हो चुका है, बड़ा बेटा विवाह योग्य है और छोटा बेटा कक्षा 12वीं में पढ़ रहा है। सीमित संसाधनों के बावजूद यह परिवार खेती, पशुपालन और मजदूरी के सहारे अपना जीवन यापन करता है।
रामुड़ी बाई के पास लगभग 3 बीघा जमीन है, जिस पर वे खरीफ और रबी दोनों मौसमों में खेती करती हैं। खरीफ में मक्का, तुवर, उड़द, कपास और सोयाबीन जैसी फसलें उगाई जाती हैं, जबकि रबी में गेहूं, चना और मक्का की बुवाई होती है। इसके साथ ही वे पशुपालन भी करती हैं—उनके पास एक गाय, दो बैल और दो बकरियाँ हैं। गाय से मिलने वाला दूध परिवार के पोषण की जरूरतों को पूरा करता है।
वर्ष 2017-18 में रामुड़ी बाई ‘सक्षम महिला समूह’ से जुड़ीं, जो वाग्धारा संस्था के सहयोग से गठित हुआ था। उन्होंने नियमित रूप से समूह की बैठकों में भाग लेना शुरू किया। इन बैठकों में सामुदायिक सहजकर्ता द्वारा साझा किए गए विचारों—विशेष रूप से “सच्ची खेती” और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों—ने उनके सोचने के तरीके को बदलना शुरू किया।
धीरे-धीरे रामुड़ी बाई केवल सहभागी नहीं रहीं, बल्कि सक्रिय रूप से अपनी बात रखने लगीं। उन्होंने निश्चय किया कि वे भी अपने घर के आसपास उपलब्ध जमीन का बेहतर उपयोग करेंगी। इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी जमीन के एक हिस्से में पोषण वाटिका (न्यूट्री-गार्डन) विकसित करने की शुरुआत की।
“सच्ची खेती” के मार्गदर्शन से उन्होंने एक बीघा जमीन में बैंगन, मिर्च, लौकी और अन्य सब्जियों की खेती शुरू की। यह छोटा-सा प्रयोग उनके जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आया। अब उनकी पोषण वाटिका से प्रतिदिन 20 किलो से अधिक ताजी सब्जियाँ मिलने लगीं। घर की जरूरत पूरी करने के बाद वे अतिरिक्त सब्जियाँ डूंगरा बाजार में बेचने लगीं।
इससे उन्हें औसतन लगभग ₹800 प्रतिदिन की आय होने लगी। कुछ ही महीनों में उन्होंने लगभग ₹40,000 की अतिरिक्त कमाई की। इस आय ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया, बल्कि घर में पोषण, स्थिरता और खुशहाली भी लाई।
रामुड़ी बाई की इस सफलता का असर केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं रहा। उनकी मेहनत और उपलब्धि को देखकर आसपास के गांवों की अन्य महिलाएं भी प्रेरित हुईं। कई महिलाओं ने उनसे मार्गदर्शन लेकर अपनी खाली जमीन पर पोषण वाटिकाएं विकसित करना शुरू कर दिया।
इस बदलाव ने गांव में एक नई दिशा दी—अब लोग केवल फसल उत्पादन ही नहीं, बल्कि पोषण और आत्मनिर्भरता दोनों को महत्व देने लगे हैं। महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और सामूहिक रूप से विकास की एक नई सोच उभर रही है।
रामुड़ी बाई ने यह साबित कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति, परंपरागत ज्ञान और सही मार्गदर्शन का संगम हो, तो छोटे किसान भी आत्मनिर्भर बन सकते हैं। उनकी कहानी आज गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है, जो अब खेती को केवल जीविका नहीं, बल्कि सम्मान और सशक्तिकरण के माध्यम के रूप में देखने लगी हैं।
यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि—
- परंपरागत खेती और पोषण वाटिका से छोटे किसान अपनी आय और पोषण दोनों बढ़ा सकते हैं
- महिला समूहों की सक्रिय भागीदारी से गांव में जागरूकता और विकास की गति तेज होती है
- और जब समुदाय, संगठन और स्थानीय नेतृत्व साथ मिलकर काम करते हैं, तो आत्मनिर्भरता केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक वास्तविकता बन जाती है।
