मंथन
सिविल सोसायटी – सत्यनिष्ठ आख्यान से दूरी क्यों?
संकट तब नहीं होता है, जब फंदा कसा जा रहा होता है और बेड़ियाँ डाली जा रही होती हैं और समाज से दूरियां बढ़ रही होती हैं। संकट तब होता है जब फंदे और बेड़ियों में स्वयं को संयोजित या बैठ-बिठाव किया जाने लगता है, उस व्यवस्था से समन्वय स्थापित किया जाने लगता है। फिर उस फंदे कसने वाली, बेड़ियाँ डालने वाली और समाज से दूरियां बढ़ाने के लिए मजबूर करने वाली व्यवस्था से समन्वय और मान्यता की अपेक्षा की जाने लगती है और स्वतः स्फूर्त पहल की जाने लगती है।
सामाजिक नागरिक संस्थाएं जन मुद्दों पर रचनात्मक आख्यान कैसे बना सकती हैं?
व्यापक अनुभवों के बाद अब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है। महात्मा गांधी ने एक बात कही थी। केवल साध्य (लक्ष्य) ही नहीं साधन भी महत्वपूर्ण है। वह लक्ष्य किस साधन (तरीके, संसाधनों और भाव) से प्राप्त किया जा रहा है, यह ध्यान रखना और समीक्षा करना जरूरी होता है। अगर हमारा लक्ष्य लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करना है तो यह लक्ष्य दबाव डाल, शोषण और झूठ कहकर हासिल नहीं किया जा सकता है।
सामाजिक संस्थाओं को आत्म विश्लेषण की जरूरत : भाग 1
यह माना जा सकता है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं की अवधारणा का उदय समाज की आकांक्षाओं, उसके आभासों, विरोधाभासों, संगति और विसंगतियों का एक साथ संज्ञान लेते हुए समतामूलक, न्यायपरक और मानवीय मूल्यों से संचालित होने वाला समाज बनाने के उद्देश्य से हुआ है। जब समान विचारों के कुछ लोग एक साथ मिलते हैं, संगठित होते हैं और साझा पहल करने का वायदा करते हैं, तब सामाजिक नागरिक संस्था का उदय होता है।
सामाजिक संस्थाओं को आत्म विश्लेषण की जरूरत : भाग 2
हमारा पहला अनुभव यह रहा है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं में अपने स्वयं के होने के कारण, अपनी भूमिका के बारे में सोचना बंद कर देते हैं। शायद यह भी कह सकता हूँ कि उसके बारे में सोचना शुरू ही नहीं करते हैं। जब मैं “भूमिका” शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ, तो इसका मतलब है सामाजिक नागरिक संस्थाएं अस्तित्व में क्यों आती हैं? जब राज्य है, जब बाजार है और जब समाज भी है, तब सामाजिक नागरिक संस्थाओं के होने का क्या मतलब है?
