हार नहीं मानूंगी, ठहर नहीं जाउंगी

यह कहानी कमला बेन की है, जिन्होंने बाल विवाह के बावजूद आत्मनिर्भरता, पारंपरिक खेती, बीज संरक्षण और महिला सशक्तिकरण के जरिए समाज में प्रेरणादायक बदलाव लाया।

ग्रामीण भारत में जब किसी लड़की की शादी कम उम्र में हो जाती है, तो आम तौर पर उसकी शिक्षा, स्वतंत्रता और सपनों पर विराम लग जाता है। मगर कुछ लोग होते हैं जो इन रुकावटों को चुनौती देते हैं और न सिर्फ अपने जीवन की दिशा बदलते हैं बल्कि पूरे समाज के लिए एक नई राह बना देते हैं। ऐसी ही एक प्रेरणास्पद महिला हैं – कमला बेन। आज उन्हें राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में घाटोल खंड के हनुमानपुरा गांव में सभी लोग “बीज काकी” के नाम से जानते हैं।

कमला बेन की कहानी न केवल आत्मनिर्भरता की मिसाल है, बल्कि यह सामाजिक बदलाव, पारंपरिक ज्ञान और टिकाऊ विकास के मूल्यों की एक गूंजती हुई आवाज़ है। यह कहानी हमें बताती है कि संसाधनों की कमी और सामाजिक सीमाओं के बीच भी यदि जज़्बा और समर्पण हो, तो बदलाव संभव है।

शुरुआती जीवन और चुनौतियाँ

कमला बेन का जन्म सन 1988 एक ग्रामीण परिवार में हुआ जहाँ परंपराएं और सामाजिक मान्यताएं लड़कियों के सपनों से बड़ी मानी जाती थीं। शिक्षा का महत्व बहुत सीमित था, खासकर बेटियों के लिए। केवल 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह एक किसान परिवार में कर दिया गया। विवाह के बाद घरेलू जिम्मेदारियों और सामाजिक अपेक्षाओं ने शिक्षा के द्वार लगभग बंद कर दिए।

हालाँकि किस्मत ने उन्हें एक ऐसा साथी दिया, जिसने उनकी क्षमता को पहचाना और प्रोत्साहित किया। उनके पति कांतिलाल मईड़ा ने हर मोड़ पर उनका समर्थन किया, और यही साथ उनके जीवन की दिशा को बदलने वाला साबित हुआ। पति-पत्नी ने साथ मिलकर खेती की जिम्मेदारियाँ संभालीं, कठिनाइयों का सामना किया, और समय-समय पर दिहाड़ी मजदूरी तक भी करनी पड़ी। लेकिन कमला बेन के भीतर हमेशा कुछ नया सीखने और समाज के लिए कुछ करने की ललक बनी रही।

सक्षम समूह से जुड़ाव और प्रेरणा का आरंभ

साल 2019 में, जब वाग्धारा संस्था ने हनुमानपुरा गांव में सक्षम समूह की शुरुआत की, तब कमला बेन की जिज्ञासा ने उन्हें इस पहल से जोड़ दिया। इस समूह का उद्देश्य था – गांव को पारंपरिक खेती और स्वराज की ओर ले जाना। यह पहल बाजार-निर्भरता को कम करने और समुदाय के आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक मजबूत कदम थी। कमला बेन ने इस मंच को एक अवसर की तरह लिया। उन्होंने खेती से जुड़े पारंपरिक तरीकों, बीजों के संरक्षण, खाद निर्माण, पशुपालन और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने जैसी चीजों पर गहरी समझ विकसित करनी शुरू की। वाग्धारा के सहयोग से उन्होंने कृषि को केवल जीविका नहीं, बल्कि एक आंदोलन के रूप में अपनाया।

कृषि में नवाचार: विविधता, देसी ज्ञान और जैविक बदलाव

हनुमानपुरा गांव की कमला बेन ने पारंपरिक खेती की एकरूपता को चुनौती देकर खेती में क्रांति लाई। उन्होंने अपने 2.5 बीघा खेत में विविध फसलें जैसे सब्जियाँ, अनाज, औषधीय पौधे और देसी बीज उगाने शुरू किए। रासायनिक खादों की जगह जैविक खाद का उपयोग कर उन्होंने न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई, बल्कि आय भी दोगुनी कर ली। अब वे हर महीने ₹4000 से अधिक कमाती हैं और सालाना ₹40,000–₹50,000 तक का लाभ होता है। उनकी सफलता देखकर गांव के अन्य किसान भी जैविक व विविध खेती अपनाने लगे हैं। यह बदलाव एक प्रेरणादायक मॉडल बन गया है।

“बीज वाली काकी” की उपाधि

कमला बेन ने खेती की मूलभूत समस्या—बीजों की अनुपलब्धता—को पहचानकर एक महत्वपूर्ण पहल की। उन्होंने देसी और पोषक बीजों के संरक्षण की जिम्मेदारी उठाई, जो समय के साथ लगभग लुप्त हो चुके थे। उन्होंने देशी बीजों का संग्रह कर उन्हें उगाना शुरू किया, जैसे बाजरा, ज्वार, उड़द, चना, मूंग, मक्का, कोदरा, लाल भिंडी, लौकी, करेले, हल्दी, लहसुन आदि। आज उनके पास 32 से अधिक देसी बीजों की किस्में संरक्षित हैं। कमला बेन इन बीजों को न सिर्फ स्वयं उपयोग करती हैं, बल्कि जरूरतमंद किसानों को इन्हें निःशुल्क या बहुत कम कीमत पर देती हैं। उनकी यह पहल गांव में बीज आत्मनिर्भरता का आधार बन गई है। अब किसान बाजार पर निर्भर न रहकर कमला बेन से संपर्क करते हैं। इसी समर्पण और सेवा भावना के कारण गांववाले उन्हें स्नेहपूर्वक “बीज वालि काकी” कहते हैं। उनका यह योगदान सतत कृषि और जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक प्रेरणास्पद कदम है।

पारंपरिक औषधीय ज्ञान का पुनरुद्धार

खेती के साथ-साथ कमला बेन ने पारंपरिक औषधीय ज्ञान को भी अपनाया और उसे पुनर्जीवित किया। उनके पति कांतिलाल ने अपनी दादी और माँ और पिता से आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का ज्ञान प्राप्त किया था। इस जोड़ी ने उस ज्ञान को गांव की महिलाओं और बच्चों तक पहुंचाने का काम शुरू किया।

कमला बेन अब महिलाओं को यह सिखाती हैं कि कैसे तुलसी, गिलोय,नवली, नीम, सहजन, हल्दी,जैसी औषधियाँ साधारण बीमारियों में कारगर होती हैं। और आगे बताती हैं कि किस तरह घरेलू उपायों से दवाइयों पर निर्भरता कम की जा सकती है।

महिला सशक्तिकरण की नायिका

कमला बेन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है – गांव की महिलाओं में आत्मविश्वास और नेतृत्व की भावना का संचार। उन्होंने 19 महिलाओं को साथ लेकर “सक्षम महिला समूह” का गठन किया। इस समूह की महिलाएं अब न केवल खेती में सहयोग करती हैं, बल्कि बीजों का संरक्षण, खाद निर्माण, घरेलू औषधियों का उपयोग और गाँव के अन्य परिवारियो को ज्ञान देने की भी जिम्मेदारी संभाल रही हैं।

अब कमला बेन ग्राम पंचायत की बैठकों में भाग लेती हैं, जहाँ वे शिक्षा, महिला स्वास्थ्य, स्वच्छता, और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर खुलकर बात करती हैं। जहाँ कभी महिलाएं पंचायत तक नहीं पहुंचती थीं, वहां अब कमला बेन जैसी महिलाएं नीतियों और निर्णयों में भागीदारी निभा रही हैं।

समाज पर प्रभाव और व्यापक परिवर्तन

कमला बेन की इस यात्रा ने कई स्तरों पर गहरा प्रभाव डाला है। उनकी पहल ने न केवल उनके परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत किया, बल्कि पूरे गांव में एक सामूहिक बदलाव की नींव रखी:

  • पारंपरिक और जैविक खेती को पुनर्जीवित किया गया
  • देशी बीजों का संरक्षण और वितरण सुनिश्चित हुआ
  • महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को बढ़ावा मिला
  • स्वास्थ्य और पोषण के प्रति जागरूकता फैली
  • स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली

कमला बेन की कहानी यह दर्शाती है कि सीमित संसाधनों के बीच भी असाधारण बदलाव संभव है – बशर्ते आत्मविश्वास, सीखने की इच्छा, और सामुदायिक सहयोग हो। उन्होंने न केवल बाल विवाह जैसे सामाजिक बंधनों को तोड़ा, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि महिलाएं यदि चाहें, तो खेती, नेतृत्व और नवाचार में अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं।

निष्कर्ष: कमला बेन की कहानी साधारण परिस्थितियों में असाधारण कार्य करने की प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित किया है कि एक महिला, यदि ठान ले, तो खेती को भी आंदोलन बना सकती है, बीजों को भी समाज की नींव बना सकती है, और अपने सीमित खेत से भी एक समाज को संस्कार, स्वराज और संबल दे सकती है।

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