थार के रेगिस्तान में दोपहर का समय केवल गर्मी नहीं, बल्कि जीवन की कठिन परीक्षा जैसा होता है। हवा में धूल घुली रहती है, तापमान 45–50 डिग्री तक पहुंच जाता है और दूर-दूर तक फैली रेत के बीच छोटे-छोटे घर जीवन की जिद का प्रतीक बनकर खड़े दिखाई देते हैं।
फलोदी के सिंधीपुरा गांव में भाई खान अपने घर के सामने बने टांके पर बैठे हैं। उनकी छत पर तिल की फसल सूख रही है और घर के अंदर मूंग की फलियां भरी हैं। यह दृश्य बताता है कि यहां हर बूंद और हर दाना कितना कीमती है।
भाई खान कहते हैं —“हमारे यहां खेती बारिश के भरोसे है। बारिश हुई तो दो फसल, नहीं तो एक भी नहीं। बोरिंग 600-800 फीट करने पर भी पानी खारा निकलता है। इसलिए बारिश का पानी ही जीवन है।” उनके बुजुर्ग पिता, जिनकी उम्र 100 वर्ष से अधिक बताई जाती है, धीरे-धीरे अतीत की स्मृतियां साझा करते हैं —“हमारे समय में पानी 30-35 किलोमीटर से लाया जाता था। पूरी प्यास बुझाकर पानी पीना भी मुश्किल था।”
यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि पूरे मरुस्थल का साझा अनुभव है — जहां पानी केवल संसाधन नहीं, जीवन का केंद्र है।
परंपरा की बुद्धिमत्ता: जब पानी रोकना ही खेती बन गया
सिंधीपुरा के खेतों में खड़ीम बनी हुई है — लंबी मेड़ जैसी संरचना जो बारिश के पानी को रोककर जमीन में समाने देती है। भाई खान बताते हैं —“पहले पानी बह जाता था। अब खड़ीम से रुकता है और खेतों में नमी रहती है। इसी से दूसरी फसल की उम्मीद बनती है।”
खड़ीम ही नहीं, टांका, नाडी और बेरी जैसी संरचनाएं भी यहां के जीवन का अभिन्न और अहम हिस्सा हैं। इन सबकी भूमिका अलग है। टांका घर के स्तर पर, यानी निजी तौर पर पानी का सुरक्षित भंडार है। नाडी सामुदायिक तालाब की तरह है। वहीं, बेरी भूमिगत जल तक पहुंचने का पारंपरिक तरीका है।
खेंगासर की ढाणी में ताज मोहम्मद अपने टांके का ढक्कन खोलकर पानी दिखाते हैं —“पहले पीने का पानी भी नहीं था। अब यह टांका है तो 3-4 महीने आराम रहता है। बाकी समय मजदूरी करते हैं।” यह दृश्य बताता है कि पानी केवल खेती नहीं, बल्कि सम्मान और स्वास्थ्य से भी जुड़ा है।
ग्रेविश की पदयात्रा: गांधीवादी दृष्टि से जल आंदोलन तक
इन बदलावों के पीछे ग्रामीण विकास विज्ञान समिति (ग्रेविश) की कहानी है। यह संस्था किसी परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि गांधीवादी पदयात्रा के अनुभव से उभरी। 1983 में संस्थापक एल.सी. त्यागी और शशि त्यागी ने गांव-ढाणियों में पदयात्राएं कीं। उन्होंने स्थानीय जीवन को समझा, महिलाओं के संघर्ष को देखा और महसूस किया कि समाधान बाहरी तकनीक में नहीं, बल्कि स्थानीय परंपरा में है।
जब ग्रेविश की टीम पहली बार पश्चिमी राजस्थान की ढाणियों में पहुंची तो लोगों की पहली प्रतिक्रिया उत्साह नहीं, संदेह थी। ग्रेविश के सीनियर प्रोग्राम कॉर्डिनेटर राजेंद्र कुमार बताते हैं —“लोगों ने पूछा—पहले भी कई लोग आए, फोटो खींचे, कागज भरवाए, फिर गायब हो गए। तुम क्या नया करोगे?”
संस्था ने तुरंत कोई निर्माण शुरू भी नहीं किया। पहले बैठकी हुईं। ढाणी-ढाणी जाकर चौपाल में बातचीत हुई। महिलाओं से अलग बैठकर पूछा गया कि पानी का असली संकट क्या है।
एक महिला ने कहा था —“साहब, हम पानी लाते-लाते बूढ़ी हो जाती हैं। आप टंकी बना दोगे तो उसे भरने का इंतजाम कौन करेगा?” यहीं से समझ आया कि समाधान केवल ढांचा नहीं, बल्कि व्यवस्था भी है।
स्वयं सहायता समूह: पानी से पहले भरोसे की खेती
सबसे पहले स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाए गए। लेकिन यह भी आसान नहीं था। ढाणियों में बिखरी बसावट, आपसी जातीय विभाजन और गरीबी — सबने शुरुआत को कठिन बनाया। महिलाएं कहती थीं —“हम बचत कैसे करेंगे? रोज कमाते हैं, रोज खाते हैं।”
ग्रेविश की टीम ने समझाया कि बचत केवल पैसे की नहीं, भरोसे की भी होती है। छोटे-छोटे समूह बने — 10-12 महिलाएं एक साथ बैठीं। हर महीने 50 या 100 रुपये की बचत शुरू हुई। धीरे-धीरे इन बैठकों ने नया असर दिखाया। महिलाएं पहली बार सामूहिक निर्णय लेने लगीं। जल संरचना कहां बनेगी — इस पर उनकी राय महत्वपूर्ण मानी गई।
राजेंद्र कहते हैं —“जब महिलाओं को लगा कि निर्णय में उनकी आवाज सुनी जा रही है, तभी जल संरचनाओं को स्वीकृति मिली।”
ग्राम संगठन और प्राथमिकता तय करने का संघर्ष
पश्चिमी रेगिस्तान की एक बड़ी समस्या है — बिखरी ढाणियां। कई जगह तो एक गांव की जमीन दूसरे जिले में पड़ती है। मांगीदान बताते हैं —“हम बीकानेर में हैं, जमीन जोधपुर में। दोनों ने कहा—तुम्हारा गांव हमारे यहां नहीं आता। इसलिए जलकुंड नहीं बने।”
ऐसे में ग्राम संगठन बनाना जरूरी था। पहले ग्राम विकास समितियां बनीं। हर ढाणी से प्रतिनिधि चुना गया। ग्राम बैठक में पहला सवाल यही उठता था —“पहले टांका किसे?” यह निर्णय आसान नहीं था। जो परिवार पंचायत के पास था, वह पहले चाहता था। दूर ढाणी वाले कहते थे —“हमारे यहां टैंकर भी नहीं आता।”
अंततः सहमति बनी कि सबसे दूर और सबसे जरूरतमंद को प्राथमिकता मिलेगी। यह केवल संरचना नहीं, बल्कि सामुदायिक न्याय की प्रक्रिया थी।
फार्मर क्लब: खेती का नजरिया बदलने की चुनौती
रेगिस्तान में खेती जोखिम भरा काम है। लोग कहते थे —“बारिश नहीं होगी तो क्या करेंगे?” फार्मर क्लब की बैठकों में किसानों को समझाया गया कि जल संरचना और खेत की मेढ़बंदी मिलकर नमी बचा सकती है।
फार्मिंग डाइक्स और खडीम का मॉडल समझाया गया।
शुरू में कई किसानों ने संदेह जताया। एक किसान ने कहा था —“मेढ़ बनाकर क्या होगा? पानी तो बह जाएगा।” पहले साल जिन खेतों में डाइक्स बनीं, वहां नमी 15–20 दिन ज्यादा रही। दूसरे किसानों ने खुद देखा —
“अरे, इनके खेत में तो हरियाली है!” नतीजा यह हुआ कि उनका भरोसा बना, बढ़ा। धीरे-धीरे फार्मर क्लब बढ़ते गए। खेती में फसल चक्र और देसी बीजों की वापसी पर चर्चा होने लगी।
चरागाह विकास: सामूहिक जमीन पर सामूहिक जिम्मेदारी
पशुपालन यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन सामुदायिक चरागाह अक्सर उपेक्षित या विवादित रहे। जब चरागाह विकास की बात उठी तो पहला सवाल था — “यह जमीन किसकी?”

कुछ लोग कहते थे पंचायत की, कुछ कहते थे निजी दावेदारी है। अंतत: बैठकों में तय हुआ कि चरागाह सामुदायिक संपत्ति है। वहां, सेवण घास, घाणम घास और स्थानीय झाड़ियां लगाई गईं। लेकिन पहली बारिश के बाद जो कुछ लगाया था, कुछ पशु चर गए। तब निर्णय हुआ कि कुछ समय के लिए चराई पर सामूहिक नियंत्रण रखा जाए।
लेकिन यह आसान नहीं था। कई बार विवाद भी हुए। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को समझ आया कि आज रोकेंगे तो कल चारा बचेगा। इस तरह चरागाह भी बचा और बना।
बीज बैंक: भरोसे और परंपरा की पुनर्स्थापना
दासोडी की लक्ष्मी अपने घर में मिट्टी के मटकों में रखे बीज दिखाती हैं। ज्वार, मोठ, ग्वार —सब, राख के साथ सुरक्षित रखे गए हैं। बीज बैंक की शुरुआत में भी संदेह था। लोग पूछते थे —“अगर बीज वापस न किया तो?”
आखिरकार प्रक्रिया तय हुई — बीज सवाया लौटाना होगा। यदि फसल खराब हुई तो ग्राम समिति निर्णय लेगी। धीरे-धीरे किसानों को लगा कि यह केवल बीज नहीं, सुरक्षा है। हाइब्रिड बीजों की जगह स्थानीय बीजों का भरोसा लौटा। लक्ष्मी कहती हैं — “बीज बैंक बनने के बाद, अब किसी को बाहर से महंगा बीज नहीं खरीदना पड़ता।”
संरचना से संस्कृति तक: असली बदलाव
ग्रेविश ने हजारों टांके, नाडियां, बेरियां और फार्मिंग डाइक्स बनवाए। जोधपुर के संस्थान के मुख्यालय में रखी तमाम फोटो दिखाते हुए राजेंद्र कुमार बताते हैं, “हम लोगों ने 1000 से ज्यादा सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाए हैं। 100 से ज्यादा फार्मर क्लब बनाए हैं, एफपीओ, ग्रामीण विकास कमेटियां, आई केयर कमेटियां बनाईं। जल संचयन के लिए 8 हजार से ज्यादा टांके, 800 से ज्यादा बेरियां, 1000 से ज्यादा नाडियां कम्युनिटी तालाब, बनाए गए। इसी तरह से 6000 फार्मिंग डाइक्स बनाए गए हैं, ताकि फूड (खाद्य सुरक्षा) या फोडर सिक्योरिटी (पशु चारा) बढ़े, पशुधन बढ़े।
लेकिन राजेंद्र साफ कहते हैं —“यदि केवल ढांचा बनता और समुदाय साथ न होता, तो सब टूट जाता।” आज कई गांवों में जल, चारा और खाद्य सुरक्षा का स्तर बेहतर हुआ है।
पलायन कुछ हद तक कम हुआ है। पानी के लिए महिलाओं की दूरी घटी है। और सबसे महत्वपूर्ण — लोगों को लगा कि समाधान बाहर से नहीं, अपने ही अनुभव से निकला है।
यह पूरी प्रक्रिया क्या बताती है?
यह बताती है कि विकास केवल निर्माण नहीं है। वह संवाद है। वह विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया है। वह सामुदायिक सहमति का अभ्यास है। वह स्थानीय स्वशासन का जीवंत रूप है। और शायद यही वजह है कि थार में बनी ये संरचनाएं केवल मिट्टी-पत्थर की नहीं, बल्कि भरोसे की दीवारें हैं।
जल से आजीविका तक: खेती, पशुपालन और सामुदायिक अर्थव्यवस्था
जल संरचनाओं का प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। भाई खान बताते हैं —“पहले एक फसल मुश्किल थी, अब दो की उम्मीद है।” चरागाह विकास से पशुपालन मजबूत हुआ। सेवण घास और स्थानीय वनस्पतियां उगाई गईं।
बीज बैंक से देसी बीजों का संरक्षण हुआ।
लक्ष्मी अपने बीज बैंक के मटकों को दिखाते हुए कहती हैं —“किसान बीज लेते हैं और फसल के बाद बढ़ाकर लौटाते हैं। इससे बीज खत्म नहीं होते।” अब्दुल मजीद बताते हैं —“टांके के पानी से बीमारियां कम हुई हैं। पहले खुले तालाब से पानी लाते थे, जानवर भी पीते थे।” यह परिवर्तन केवल खेती का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन का भी है।
जलवायु परिवर्तन और स्थानीय अनुकूलन की सीख
राजेंद्र कुमार बताते हैं कि थार में जलवायु परिवर्तन का असर स्पष्ट है —यहां अचानक भारी बारिश हो जाना या
लंबे समय तक सूखे मौसम का बना रहना अब आम बात है। साथ ही अत्यधिक तापमान की वजह से फसलों का जोखिम भी पहले से कई गुना बढ़ चुका है।
ऐसे में खड़ीम और फार्मिंग डाइक्स जैसी संरचनाएं जलवायु अनुकूलन का व्यवहारिक उदाहरण बनती हैं। वे कहते हैं —“यदि कोई तकनीक जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कारगर है, तो वह परंपरागत तकनीक है।” खड़ीम खेत में नमी बनाए रखती है। नाडी पानी का सामुदायिक भंडार बनती है। और टांका घर या निजी स्तर पर सुरक्षा देता है। इससे सूखे के बाद भी खेती की संभावना बनी रहती है।
समुदाय और संवैधानिक अधिकार: स्थानीय स्वशासन का व्यवहारिक मॉडल
इस पूरी पहल का केंद्र समुदाय है। मांगीदान बताते हैं —“ग्राम बैठक में तय होता है कि टांका किसे मिलेगा। दूर ढाणी वाले को पहले देते हैं।” यह प्रक्रिया स्थानीय स्वशासन की उस भावना को दर्शाती है जिसमें संसाधन प्रबंधन का निर्णय समुदाय करता है।
पानी तक पहुंच और सुरक्षित आजीविका गरिमामय जीवन के अधिकार से जुड़ती है। सामुदायिक संसाधनों का संरक्षण स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक भावना को व्यवहार में लाता है।
यह मॉडल बताता है कि जब समुदाय को निर्णय का अधिकार मिलता है, तो संसाधनों का प्रबंधन अधिक न्यायपूर्ण और टिकाऊ बनता है।
