सिविल सोसायटी – सत्यनिष्ठ आख्यान से दूरी क्यों?

सचिन कुमार जैन

संकट तब नहीं होता है, जब फंदा कसा जा रहा होता है और बेड़ियाँ डाली जा रही होती हैं और समाज से दूरियां बढ़ रही होती हैं।

संकट तब होता है जब फंदे और बेड़ियों में स्वयं को संयोजित या बैठ-बिठाव किया जाने लगता है, उस व्यवस्था से समन्वय स्थापित किया जाने लगता है।

फिर उस फंदे कसने वाली, बेड़ियाँ डालने वाली और समाज से दूरियां बढ़ाने के लिए मजबूर करने वाली व्यवस्था से समन्वय और मान्यता की अपेक्षा की जाने लगती है और स्वतः स्फूर्त पहल की जाने लगती है।

यह संकट प्रासंगिकता और अस्तित्व का संकट तब बन जाता है, जब इस संयोजन और समन्वय के लिए अपनी भूमिका, अपने योगदान और मूल्यों को विस्मृत करने में न तो पीड़ा का अहसास होता है और न ही अपने असल वजूद के समाप्त होते जाने का।

हम जिस कालखंड में हैं, उसमें आख्यानों के माध्यम से मानवीय जीवन के सभी पहलुओं को नियंत्रित किया जा रहा है। संभवतः अविश्वास, भेदभाव, मानवीय लोभ, संसाधनों का अतिरेक शोषण का ‘स्वभाव’ अल्प विकसित समाज में नहीं रहा होगा। वस्तुतः उस तरह का स्वभाव इस कालखंड में विकसित किया जा रहा है। और यह स्वभाव विकसित हो रहा है नैरेटिव की प्रक्रिया से। इस दौर में मानसिक विकास में सूचनाएं और तकनीक बहुत प्रभावी भूमिका निभा रहीं हैं, लेकिन सामाजिक-राजनीति व्यवस्था लोगों में भावनात्मक उद्वेग को बहुत संरक्षण देने लगी है। इससे भौतिक विकास तो हो रहा है, लेकिन सह-अस्तित्व, परस्परता, न्याय और बंधुत्व का विकास बाधित हो रहा है। संभवतः भारतीय इतिहास में पहली बार यह तर्क इक्कीसवीं सदी में गढ़ा गया कि सामाजिक समानता, प्रकृति और पारिस्थिस्तिकी के प्रति जवाबदेही, इंसानों-कुदरत-नदियों से मैत्री, परस्परता और विविधता का संरक्षण करने वाली आवाजों को देश और समाज के विरोध करने वाली आवाज़ घोषित किया जा रहा है।

जिस समाज में जाति, लिंग, सम्प्रदाय और आस्थाओं के आधार पर विसंगतियां रही हों, उसी भारतीय समाज में सामाजिक नागरिक पहल यानी बदलाव और सुधार के लिए प्रतिकार की संगठित आवाज़ हर ऐतिहासिक कालखंड में मौजूद रही और उस आवाज़ को ख़त्म करने के कोई राजनीतिक प्रयास नहीं किये गए। यूनान-यूरोप में तो वैज्ञानिक चेतना विकसित करने और धर्म की सत्ता स्थापित करने के लिए अंध-विश्वास के प्रचलन की आलोचना करने पर दार्शनिकों को जहर दिया गया या कारावास में डाल दिया गया, निर्वासन की सजा दी गई या फिर ज़िंदा भी जला दिया गया। लेकिन भारत में प्रतिकार की दार्शनिक परंपरा का स्थान बना रहा। विडम्बना है कि जब दुनिया को इतिहास के सबसे विकसित स्वरुप में देखा जा रहा है, तब समाज और सरकारें उन आवाजों को खतरा मान रहीं हैं, जो बंधुता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, समानता और व्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल्यों को साकार रूप में स्थापित करने के लिए प्रतिबद्धता के साथ खड़ी होती हैं।

इसका अर्थ है कि भौतिक और तकनीकों का विकास होने से चेतनाशील मानवता का विकास होता है, यह दावा नहीं किया जा सकता है। देशों की राजनीतिक स्वतंत्रता से लोगों को सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता मिलती है, यह भी नहीं माना जा सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि मानवता के विकास, मानवीय मूल्यों के संरक्षण, लोकतंत्र और व्यक्तियों की सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता के लिए हर कालखंड में संघर्ष करने की जरूरत होती है और जैसे-जैसे भौतिक विकास की गति बढ़ती जाती है, मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाले व्यक्तियों-समूहों को देश-धर्म विरोधी करार दिए जाने का नैरेटिव रचा जाने लगता है। चूंकि सामाजिक नागरिक पहलों की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है, इसलिए कोई भी राजनीतिक सत्ता प्रत्यक्ष रूप से उनके अस्तित्व को चुनौती नहीं दे पाती है। ऐसे में सामाजिक नागरिक पहल के बारे में ऐसा असत्यनिष्ठ आख्यान रचा जाता है, जिससे सामाजिक नागरिक समूहों की विश्वसनीयता और मंशा पर प्रश्नचिन्ह खड़े किये जा सकें। यह प्रयास किया जाता है कि उनके प्रति व्यापक समाज का, युवाओं का भरोसा कमज़ोर हो जाए और उनके विचारों के प्रति अस्वीकार्यता का भाव पैदा हो जाए।

जब ऐसी स्थिति निर्मित हो जाती है, तब सामाजिक नागरिक संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले विश्लेषणों पर भरोसा कम होता है, तब पोषण, महिलाओं के स्वास्थ्य, बच्चों के संरक्षण, कृषि के संकट से उबारने वाले विचार और जलवायु परिवर्तन का सामना करने वाले माडलों, उनके अनुभवों और नीतिगत सुझावों की स्वीकार्यता भी घटने लगती है।
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी के शुरूआती सालों के अध्ययन से यह समझ बनती है कि शनैः शनैः सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने अपने संवाद के दायरे अपने तात्कालिक लक्षित समुदायों (जिन्हें लक्षित हितग्राही कहा जाता है) तक सीमित कर लिए। समाज के अन्य समूहों (जैसे शिक्षक, सामाजिक संगठनों या समुदाय का नेतृत्व करने वाले लोग, छात्र संगठन, लेखक, पत्रकार, अकादमिक और विषय विशेषज्ञ आदि), जो समाज का नज़रिया और मानस बनाने में प्रभावी भूमिका निभाते हैं, उनके साथ उनका संवाद, मित्रता और संबंधता सीमित होते गए। संवाद के सीमित होने के कारण एक खाली सा स्थान (स्पेस) पैदा हुआ, व्यापक समाज को सामाजिक नागरिक समूहों और पहल के मकसद, मंशा और मानस के बारे में जानकारी मिलना बंद हो गई और इसके कारण एक प्रकार के ‘रणनीतिक असत्यनिष्ठ आख्यान’ के लिए खुला स्थान बन गया।

भारत में सामाजिक बदलाव और निर्माण में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की ऐतिहासिक और रचनात्मक भूमिका रही है। भक्ति आन्दोलन से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के नवनिर्माण आन्दोलन तक स्पष्ट रूप से सामाजिक नागरिक पहल की भूमिका स्थापित रूप से दिखाई देती है। इसके बाद यह उल्लेखनीय है कि भारत में उपनिवेशवाद से मुक्ति के आन्दोलन के साथ-साथ स्त्रियों की आज़ादी, जाति-आधारित शोषण से मुक्ति, सामाजिक न्याय और गरिमा के मानव अधिकार के लिए भी समान सघनता से संघर्ष हुआ। सामाजिक बदलाव और समाज निर्माण की यात्रा में कबीर से लेकर राजा राम मोहन राय, जोतिबा और सावित्री बाई फुले, पेरियार, सर सैय्यद अहमद खान, नारायण गुरु, महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर, विनोबा भावे, अरुणा राय, मेधा पाटकर तक सजग नेतृत्वकर्ताओं की असंख्य कहानियाँ मौजूद हैं।

यह समझना भी जरूरी होगा कि भारत में प्राकृतिक परिवेशों को विनाश से बचने की पहल से लेकर शिक्षा के अधिकार क़ानून, रोज़गार के अधिकार के क़ानून, सूचना के अधिकार, खाद्य सुरक्षा, वन अधिकार, कार्य स्थल पर लैंगिक शोषण तक क़ानून बनाये गए और इन सभी की पृष्ठभूमि में सामाजिक नागरिक संस्थाओं और संगठनों की निर्णायक भूमिका रही है। लेकिन सामाजिक नागरिक संस्थाओं की पहचान, भूमिका और योगदान व्यापक समाज, राजनीतिक संस्थाओं और लोगों की स्मृति में धूमिल होने लगे हैं, हल्के पड़ गए हैं, गया या फिर लगभग मिट सा गए हैं। इसका कारण यह है सामाजिक नागरिक समूहों के दायरे निश्चित समूहों या लक्षित समूहों तक सीमित हो गए हैं। ऐसा लगता है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने जिस तरह की कार्यशैली अपनाई है, उसमें उन्होंने अपने कार्यक्रम तक अपने संवाद को सीमित कर लिया है। सामाजिक-आर्थिक समस्याएं बहुत जटिल होती हैं, स्वाभाविक है कि उन्हें हल करने वाले कार्यक्रम भी जटिल और सघन ही होते हैं, लेकिन ऐसे सघन और जटिल कार्यक्रमों के अनुभवों, सीखों, सफलताओं-असफलताओं की कहानियों को अकादमिक संवाद का हिस्सा नहीं बनाया गया या मीडिया से साझा नहीं किया गया। इससे यह धारणा बनी कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं कोई प्रभावी भूमिका निभा ही नहीं रही हैं।

शिक्षा के अधिकार क़ानून, रोज़गार गारंटी क़ानून या खाद्य सुरक्षा अधिनियम, वन अधिकार क़ानून और कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न से संरक्षण के क़ानून देश की लगभग 80 प्रतिशत आबादी के जीवन को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन समाज को यह कहानी नहीं बताई गई कि इन कानूनों के निर्माण में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की भूमिका और संघर्ष केंद्र में रहा है।

सामाजिक नागरिक संस्थाओं की भूमिका सामाजिक न्याय, समानता, गरिमा, व्यक्ति की स्वतंत्रता और बंधुता को स्थापित करने में तो महत्वपूर्ण भूमिका निभाती ही हैं, लेकिन इससे ज्यादा बड़ी भूमिका होती है राज्य व्यवस्था की जवाबदेही और आर्थिक संसाधनों पर एकाधिकार को प्रोत्साहन देने वाली नीतियों की समीक्षा और आलोचनात्मक अध्ययन करने की। इसके साथ ही सामाजिक हिंसा, विसंगतियों, असमानता, और सामाजिक-आर्थिक शोषण की पारंपरिक व्यवस्थाओं को चुनौती दी गई। पिछले पांच दशकों में सामाजिक व्यवस्था, राज्य व्यवस्था और निजी अर्थव्यवस्था, यानी व्यवस्था के तीनों स्तंभों की समीक्षा सामाजिक नागरिक संस्थाओं की भूमिका बनी रही लेकिन इस भूमिका निर्वाह से ये तीनों स्तम्भ असहज होते दिखते हैं। सच यह भी है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं की उत्पत्ति हमेशा एक विचार और एक आकांक्षा से होती है, जहाँ समाज के स्वरुप के बारे में एक नज़रिया होता है और उस नज़रिए में समानता, न्याय, बंधुता, लोकतंत्र के मूल्यों के होने की आकांक्षा होती है। इसीलिए इनका अस्तित्व तो बने ही रहना है। सामाजिक नागरिक संस्थाओं के अस्तित्व की इस अपरिहार्यता को देखते हुए यह विकल्प अपनाया गया कि उनकी पहचान, भूमिका और मंशा को सवालों के दायरे में लाकर खड़ा दिया जाए। समाज में ऐसी छवि बना दी जाए, जिससे सामाजिक नागरिक संस्थाओं में समाज का, मीडिया का, विषय विशेषज्ञों का, युवाओं का भरोसा कमज़ोर पड़ जाए ताकि वे राज्य, समाज और निजी अर्थव्यवस्था की नीतियों और व्यवहार पर कड़े प्रश्न खड़े न कर सकें या अगर प्रश्न खड़े करें भी, तो उन्हें समाज का, युवाओं का, मीडिया का, अकादमिक क्षेत्र का समर्थन और भरोसा हासिल न हो।

अब समय है, जब सामाजिक नागरिक संस्थाओं के वरिष्ठ प्रतिनिधियों और नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों को सिविक स्पेस और सिविल सोसायटी के बारे में एक रचनात्मक और सत्यनिष्ठ आख्यान के निर्माण में प्रभावी भूमिका लेने की जरूरत है। लेकिन कुछ अनुभव बता रहे हैं कि भारत में सिविल सोसायटी लीडर्स आख्यान के अर्थ और उसके निर्माण से प्रक्रिया से दूर रहना चाहते हैं। वे नैरेटिव के प्रभाव और दुष्प्रभावों के बारे में खुल कर संवाद करने से बचना चाहते हैं।

1. स्मृतिहीनता

सामाजिक बदलाव, संघर्ष और निर्माण की प्रक्रिया में एक बात बहुत महत्वपूर्ण होती है और वह बात है अपने इतिहास को स्मृति में रखने की। सामाजिक नागरिक पहल और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका शून्य से शुरू नहीं होती है। समाज के मुद्दे, समाज की समस्याएं, समाज को बेहतर बनाने के सपने पहले से मौजूद रहे हैं। पहले भी लोग, संस्थाएं, संगठन समाज को बेहतर बनाने की पहल करते रहे हैं। पहले के कार्यक्रमों, योजनाओं और संघर्षों की सीखें कहीं लिखी गई हैं क्या, कहीं दर्ज हैं या नहीं? इतिहास में जो संघर्ष हुए हैं, क्या उनकी कहानियां आज के संघर्षों में कोई योगदान दे रहीं या नहीं नहीं दे रहीं हैं? इस प्रश्न से पहले एक और प्रश्न आता है। वह यह कि क्या सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों ने अपनी कहानियाँ कहीं दर्ज की भी हैं या नहीं? अगर उन्होंने अपनी कहानियां दर्ज नहीं की हैं, तो स्वाभाविक है कि उनके अनुभवों, सीखों, नीतियों-रणनीतियों की समझ वर्तमान की सिविल सोसायटी को नहीं मिल पाएगी। आज की सामाजिक नागरिक संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह समझना होगा कि उनकी जड़ें, उनका जुड़ाव ऐतिहासिक सामाजिक नागरिक संघर्षों और कार्यक्रमों से है। उस जुड़ाव को स्मृति और योजनाओं में निहित कार्यक्रमों को केंद्र में रखना जरूरी है। इसी बिंदु का एक अन्य आयाम है। वह आयाम यह है कि मौजूदा पीढ़ी में सक्रिय सामाजिक नागरिक संस्थाएं और सामाजिक कार्यकर्ता क्या स्वयं अपने सामाजिक संघर्ष और समाज निर्माण के जीवन के अनुभवों, सीखों और स्मृतियों की कहानियों, तथ्यों, सफलताओं-असफलताओं को दर्ज करते हैं क्या? क्या वह कहानियां लिखी गई हैं? कहीं दर्ज की गईं है क्या? अगर वे दर्ज नहीं की गई हैं तो बहुत हद तक संभव है कि आज के सामाजिक कार्यकर्ता अपने स्वयं के जीवन और कार्यक्रमों के अनुभवों से भी सीख नहीं ले रहे होंगे। इसका दूसरा अर्थ यह है कि आने वाले समय में जो नव-सामाजिक कार्यकर्ता सामाजिक नागरिक संस्थाओं से जुड़ेंगे या उनका नेतृत्व करेंगे, उन्हें अपने से पहले के सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों के अनुभवों से सीखने का अवसर नहीं मिलेगा। यही कारण है कि भारत में अब ज्यादातर सामाजिक नागरिक कार्यक्रम ‘शून्य’ से ही शुरू किये जाते हैं और रणनीतिक संचार की नीतियों के अभाव और कहानी कहन की कला की उपेक्षा के कारण अकसर मज़बूत और स्थाई बदलाव पैदा नहीं कर पाते हैं। जिन सामाजिक नागरिक कार्यकर्ताओं ने वन अधिकार अधिनियम या शिक्षा के अधिकार अधिनियम या सूचना के अधिकार के लिए संघर्ष किया, उनकी कहानियों, उनके अनुभवों से वर्तमान पीढ़ी के सामाजिक कार्यकर्ता वाकिफ नहीं हो पा रहे हैं। जब वे वाकिफ नहीं होंगे, तो राज्य व्यवस्था के लिए ऐसे कानूनों और नीतियों को असामयिक साबित करके समाप्त कर देना हमेशा बहुत आसान काम रहेगा, इसी तरह क्या सामाजिक नागरिक कार्यकर्ता समाज की स्मृति में सच्चाई और संघर्ष से भरी उस कहानी को स्थापित करते हैं कि जिस क़ानून से उनके बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार मिला या पोषण का अधिकार मिल रहा है, वह सामाजिक नागरिक संघर्ष, सामाजिक नागरिक पहल के कारण हासिल हुआ है। जब यह कहानी कही ही नहीं जायेगी, तो सिविल सोसायटी समाज की स्मृति, समाज के मन का हिस्सा कैसे बनेगी? जब वह समाज की स्मृति और मन का हिस्सा नहीं बनेगी, तब उसके अस्तित्व, उसकी प्रासंगिकता को समाप्त करने के लिए की जा रही राजनीतिक कोशिशों का प्रतिकार करने समाज खड़ा कैसे और क्यों होगा? जब सिविल सोसायटी के वरिष्ठ सदस्य छात्र-छात्राओं, युवाओं को अपने सपने, अपने अनुभवों, अपनी सीखों, सफलताओं-असफलताओं से वाकिफ नहीं करवाएंगे, तो पांच-दस-बीस सालों बाद उनकी पहल को अगले मुकाम तक कौन लेकर जाएगा?

2. रणनीतिक संचार की कला

भारत में सिविल सोसायटी लीडर्स ने कहानी कहन (स्टोरीटेलिंग) की रणनीतिक कलात्मक परंपरा का पूरी तरह से संरक्षण नहीं किया है। वे यह भूलते गए हैं कि जब हम अपने अनुभवों, सीखों, चुनौतियों और योगदान को सत्यनिष्ठ संवेदनशील कहानियों के माध्यम से व्यक्त करते हैं, तब लोग, युवा, बच्चे, पत्रकार, शिक्षक, जनप्रतिनिधि सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी जुड़ते हैं, सामाजिक नागरिक संस्थाओं से भी और समाज के उन मुद्दों से भी उनका रिश्ता कायम होता है। लेकिन पिछले तीन दशकों में सामाजिक नागरिक कार्यकर्ताओं का संवाद नीरस और तात्कालिक लक्ष्यों तक सीमित होता गया है। यह एक सच्चाई है कि सत्यनिष्ठ और संवेदनशील कहानियाँ तभी कही जा सकती हैं, जब समाज के साथ, समुदाय के साथ, इकोलाजी के साथ सामाजिक नागरिक कार्यकर्ताओं की रिश्ता गहरा होता है। जब कहानियाँ कही जाती हैं, तब इससे सामाजिक मुद्दों, समस्याओं और उनके आयामों के बारे में समझ साफ़ होती है। जब सामाजिक नागरिक कार्यकर्ता मध्यम वर्ग के सामने या अकादमिक विशेषज्ञों के सामने कहानियों के माध्यम से समाज और लोगों की आकांक्षाओं को पेश करते हैं, तो मध्यम वर्ग, नीति बनाने वाले समूह और विशेषज्ञ वास्तव में समाज और लोगों की स्थिति, उनकी आकांक्षाओं को महसूस कर पाते हैं। कहानी कहन से कल्पनाशीलता का विकास होता है। सामाजिक नागरिक संस्थाओं के नेतृत्व करने वाले लोग यह समझने में नाकाम हो रहे हैं कि वे तकनीक आधारित आँखों को चौंधियाने वाले प्रस्तुतिकरणों, नीरस डाटा के प्रयोग से नहीं, बल्कि जीवंत कहानी कहन से पहचाने जायेंगे।

3. भयों को पहचानना

सत्यनिष्ठ आख्यान की प्रक्रिया से जुड़ने के लिए सिविल सोसायटी को सबसे पहले उन भयों को पहचानना होगा, जो बाधा बनते हैं। ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि अपनी ऐतिहासिक और सामाजिक भूमिका और योगदान को फिर से जानना चाहिए। उससे प्रतिबद्धता और प्रेरणाओं के अर्थ को महसूस करना चाहिए, इससे उन भयों से उबरने में मदद मिलेगी जो ‘पंजीयन और राज्य की मान्यता’ के दबाव से पैदा होते हैं।

4. अपराध-बोध को पहचानना

यह अध्ययन करना जरूरी है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं किस-किस तरह के अपराध बोध से ग्रसित हो रहीं हैं? सच तो यह है कि अपराध-बोध से ग्रसित हुए बिना ऐसे आख्यान के प्रति सहज हुआ ही नहीं जा सकता है जिसमें उनकी मंशा और देश-समाज के प्रति प्रतिबद्धता पर नित-नए प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। शायद सामाजिक नागरिक संस्थाओं को यह अहसास है कि वे समाज के मुद्दों और समस्याओं का प्रभावी और वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं कर रहीं है? शायद उन्हें यह अपराध-बोध सा होने लगा है कि जिस तरह के आधुनिक प्रबंधन और तकनीकी कार्यशैली को आधुनिक बाज़ार ने अपनाया है, वे उन्हें नहीं अपना पा रहीं हैं? शायद कानूनी और वैधानिक झंझावातों से गुज़रते हुए उन्हें अपने अपराधी होने का अहसास होने लगा है और वे यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि प्रशासनिक या मानवीय त्रुटियाँ अपराध नहीं होती हैं। ऐसे में सामाजिक नागरिक संस्थाओं को नयी सूचना तकनीकों को जानने, सीखने और उपयोगिता के अनुसार अपनाने की तैयारी रखना चाहिए।

5. जवाबदेहिता को अपनाना

हम जिस कालखंड में आ गए हैं, उसमें सामाजिक नागरिक समूहों को जवाबदेय होना ही होगा। केवल यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि वे तो समाज के लिए, वंचितों के लिए, गरीबों और मजलूमों की सेवा का काम कर रहे हैं, इसलिए उनसे किसी तरह के सवाल नहीं होंगे। स्वाभाविक रूप से अब समाज में व्यवस्था, उत्पादों, संस्थाओं और घटनाओं के बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ रही है तो स्वाभाविक है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं भी इससे अछूती नहीं रहेंगी। लोग जानना चाहते हैं कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं क्यों गांवों में या बस्तियों में जाकर लोगों को जागरूक करने का काम करती हैं? इससे उन्हें क्या हासिल होता है? उनके क्या हित हैं? सामाजिक नागरिक संस्थाओं की अपनी व्यवस्था कैसे चलती हैं? उनके पास धन कहाँ से आता है? जो उन्हें आर्थिक मदद देते हैं, वे सामाजिक बदलाव के काम के लिए आर्थिक सहायता क्यों देते हैं? सत्यनिष्ठ नैरेटिव के निर्माण की प्रक्रिया में ऐसे कई प्रश्न पूछे जायेंगे। शायद इसीलिए सामाजिक नागरिक संस्थाओं का नेतृत्व इस प्रक्रिया में शामिल होने का साहस नहीं जुटा पा रहा है।

6. बंधन, परिणाम और मूल्यों के बीच सामंजस्य

सिविल सोसायटी में इक्कीसवीं शताब्दी में आया नया नेतृत्व उसकी भूमिकाओं और कार्यशैली को नए रूप में देखता-समझता है। ऐसा आभास मिलता है कि सामाजिक नागरिक पहल अब एक महज पेशेवर भूमिका के रूप में अपनाई जाने लगी है। यही कारण है कि सिविक स्पेस की सामाजिक-राजनीतिक महत्ता का अंदाज़ नहीं लग पा रहा है। हम यह देख रहे हैं कि सामाजिक नागरिक पहल के लिए दिया जाने वाला अनुदान अब ‘निवेश’ माना जाने लगा है, जिसका लाभ हर साल के अंत में आवश्यक रूप से उत्सर्जित होने का लक्ष्य तय किया जाता है। जब यह नज़रिया स्थापित हो जाता है तो समाज में न्याय, बंधुता, समता, परस्परता, सशक्तिकरण सरीखे पहलुओं की उपेक्षा होना स्वाभाविक ही है। क्या सामाजिक नागरिक संस्थाएं प्रबंधन, परिणाम और मूल्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की तैयारी कर रही हैं?

7. संस्थागत संस्कृति और मानक

सत्यनिष्ठ आख्यान को बनाने के लिए संस्थागत व्यवस्थाओं, संस्कृति और मानकों को ठोस रूप देने, पारदर्शी और समावेशी बनाने की पहल अनिवार्य रूप से करना होती है। सामाजिक नागरिक संस्थाओं के अपने व्यवहार और कार्यशैली से संस्थाओं के मकसद का सन्देश प्रसारित होता है। संस्थाओं और संस्थाओं के व्यक्तियों की भाषा से उनके नज़रिए और विषय के बारे में उनकी समझ का ठोस अनुमान लगता है। सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि जिस तरह के समाज का निर्माण किये जाने की अपेक्षा है, उसमें बंधुता, लोकतंत्र, समता, व्यक्ति की स्वतंत्रता, जवाबदेही और पारदर्शिता के मूल्यों का बहुत महत्व होता है। इसका दूसरा अर्थ यह हुआ कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं की अपनी स्वयं की संस्कृति में इन मूल्यों को स्थापित करने के विचार को भुलाया नहीं जाना चाहिए।

8. क्षमतावृद्धि की उपेक्षा

यह एक विडम्बनापूर्ण विरोधाभास है कि एक तरफ तो भारत में सत्यनिष्ठ आख्यान पर संवाद और क्षमतावृद्धि की जो सीमित पहलें हो रही हैं, उनमें सामाजिक नागरिक संस्थाओं में नेतृत्व की भूमिका निभाने वाले व्यक्ति भागीदारी नहीं कर रहे हैं। उनके स्थान पर सामुदायिक कार्यकर्ता या जिला समन्वयक या कार्यक्रम अधिकारी भागीदारी कर रहे हैं। इससे ऐसा लगता है कि सामजिक नागरिक संस्थाएं इस विषय की संवेदनशीलता को महसूस नहीं कर पा रही हैं।

9. क्या सत्यनिष्ठ आख्यान के लिए बड़े आर्थिक संसाधन चाहिए?

यह भी एक बड़ी चुनौती है कि छोटी और मध्यम संस्थाएं सामाजिक नागरिक संस्थाओं के बारे में बन रहे आख्यान के प्रभाव को समझ और महसूस कर पा रहीं हैं, लेकिन इस विचार पर आकर टिक जा रहीं है कि शायद सत्यनिष्ठ आख्यान की प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका निभाने के लिए उन्हें अतिरिक्त आर्थिक संसाधनों की जरूरत पड़ेगी, जो उनके पास नहीं हैं। बस यहीं आकर उनका मनोबल टूट सा जा रहा है। इसके दूसरी तरफ जिन बड़ी संस्थाओं के पास वृहद् आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं, वे नैरेटिव को एक पचड़ा मानती हैं। उन्हें यह लगता है कि कथानक या आख्यान के तार को छूने से उन्हें किसी क़ानून या राजनीतिक सवाल का करंट लग सकता है। उनका ज्यादातर प्रयास शासन व्यवस्था से सराहना का प्रमाण पत्र हासिल करने पर केन्द्रित रहता है। इससे एक बात साफ़ उभर कर आ रही है कि अब आर्थिक सहायता प्रदान करने वाली संस्थाओं (यानी डोनर्स) को बहुत शिद्दत से विचार करना होगा कि वे सामाजिक नागरिक संस्थाओं को उन विषयों/मुद्दों पर प्रभावी आख्यान बनाने के लिए और जिन मुद्दों पर वे प्रोजेक्ट्स का संचालन कर रहीं हैं, सहायता देना क्यों ज़रूरी है। समाज के मुद्दों पर रचनात्मक आख्यान के निर्माण से भी सामाजिक नागरिक संस्थाओं की पहचान में सकारात्मक बदलाव आएगा। लेकिन इन सबसे बड़ी बात यह है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं को अपने मौजूदा कार्यक्रमों और टीमों के साथ कहानी-कहन और रणनीतिक संचार के कौशल और रणनीति को जोड़ने की पहल करना चाहिए। सामाजिक नागरिक संस्थाएं विशेषज्ञों, समाचार पत्रों या टीवी चैनलों पर विज्ञापन प्रसारित करके आख्यान नहीं बना सकती हैं और उन्हें बनाना भी नहीं चाहिए।

10. अपने दायरे से बाहरी दुनिया के संवाद

जाने-अनजाने में सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने अपने संवाद का दायरा बहुत सीमित कर लिया है। उनकी सोच, कार्यक्रमों और नीतियों में यह विचार कहीं खो गया है कि अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केवल वंचित समुदायों के समूह बनाते रहना, उनसे बचत करवाते रहना, उनका प्रशिक्षण करते रहना ही पर्याप्त नहीं है। वास्तव में सामाजिक, आर्थिक और नीतिगत व्यवस्थाओं में बदलाव और संशोधन के बिना समाज के समीकरणों में बदलाव नहीं आ सकता है। साथ ही इन समीकरणों को बदलने के लिए देश के मध्यम वर्ग और प्रभावशाली कुलीन समुदायों को भी समाज के वंचित वर्गों के जीवन के प्रति संवेदनशील बनाने की महती आवश्यकता है। यह आवश्यकता कहानी-कहन और रणनीतिक संचार से पूरी हो सकती है। सामजिक नागरिक संस्थाओं की ही यह जिम्मेदारी है कि वे समाज के मुद्दों और सामाजिक बदलाव के लिए पहल करने के लिए नयी पीढ़ी को तैयार करती रहें और इसके लिए उन्हें छात्र-छात्राओं, युवाओं से संवाद करते रहने, उन्हें समाज के मुद्दों की संरचना से शिक्षित करते रहने की जरूरत है। इसके लिए भी उनके साथ प्रभावी संवाद स्थापित करने की जरूरत है। देश में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की समाज के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच और उपस्थिति है। वहां काम करते रहने से सामजिक नागरिक संस्थाओं ने गहरे अनुभव, सीखें और प्रमाण जुटाए हैं, लेकिन ये अनुभव, सीखें और प्रमाण अकादमिक अनुसंधानों का हिस्सा नहीं बनते हैं क्योंकि शोधकर्ताओं और अकादमिक विशेषज्ञों से सामाजिक नागरिक संस्थाओं का संवाद बहुत सीमित है। वर्तमान अनुभव तो यही बताते हैं कि अब भी सामाजिक नागरिक संस्थाओं में नेतृत्व की भूमिका निभाने वाले लोग संस्थाओं के भीतर रणनीतिक संचार की नीति, टीम की क्षमतावृद्धि और मानक संचालन प्रक्रियाओं (स्टेंडर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर्स) को बनाने की जरूरत को महसूस नहीं कर पा रहे हैं।

11. जन-पैरवी से आगे का मुकाम है सत्यनिष्ठ आख्यान

यह वक्त जन-पैरवी (पीपुल-सेंटर्ड एडवोकेसी) से आगे जाने का वक्त भी है। सामान्य तौर पर जन-पैरवी का दायरा समाज के मुद्दों के बारे में नीति निर्धारकों को संवेदनशील बनाना, जन-हितैषी नीतियों को आकार देना और उन पर राजनीतिक संवाद कायम करना रहा है, लेकिन जन-पैरवी से मुद्दों और लोकहित के बारे में जन-मानस नहीं बन सकता है। उसके उद्देश्य नीतिगत बदलाव पर आकर रुक जाते रहे हैं। यही कारण है कि पैरवी (एडवोकेसी) से ऐसे स्थाई बदलाव के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता है, जो व्यापक समाज के मानस में बदलाव से पैदा होते हों। जब समाज के मानस में लैंगिक अन्याय का अर्थ और पीड़ा स्थापित होगी, तभी लैंगिक न्याय की नीति का लागू हो पाना संभव होगा। अन्यथा यह तो हमने देखा ही है कि जन-पैरवी की प्रक्रियाओं से कई नीतियों और कानूनों ने जन्म लिया है, लेकिन उनका क्रियान्वयन इतना लचर रहा कि उनसे अपेक्षित बदलाव हासिल नहीं हो सके। इतना ही नहीं अब तो ये अनुभव भी सामने हैं कि व्यवस्था तंत्र लोक अधिकारों के लिए बने कानूनों को बाकायदा समाप्त करने के लिए तैयार है और उनकी ऐसी कोशिशों पर जनता कोई सवाल नहीं करती हैं, उन्हें ऐसे कानूनों को समाप्त करने से नहीं रोकती है। जन-पैरवी से ‘नीतियाँ’ बन सकती हैं, लेकिन मुद्दों पर सत्यनिष्ठ आख्यान से ‘नीयत’ का निर्माण होता है और जनता का यह ‘मानस’ भी बनता है कि वह नीति और नीयत की ‘निगरानी’ करने के लिए तैयार हो।

एक बेहतर समाज के निर्माण में सिविल सोसायटी की भूमिका प्रासंगिक और अपरिहार्य रही है, बस यह देखना होता है कि वह सिविल सोसायटी सत्ता और रूढ़िवादी समाज के पक्ष में होती है या फिर जनता और प्रगतिशील समाज के पक्ष में। समझना यह होता है कि क्या सामाजिक नागरिक संस्थाएं ऐसे विकास के पक्ष में हैं, जो इकोलाजी, समानता, न्याय, बंधुत्व, जवाबदेही, लोकतंत्र के पक्ष में हैं या विपक्ष में हैं। सामाजिक नागरिक संस्थाओं में नेतृत्व करने वाले लोगों को गंभीरता से उस आख्यान को जानने-समझने की कोशिश करना होगी, जो उनकी अपनी भूमिका, प्रासंगिकता और स्वीकार्यता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करने के लिए रचा जा रहा है। यह केवल सामाजिक नागरिक संस्थाओं की छवि का प्रश्न नहीं है, बल्कि उनकी विश्वसनीयता और प्रभाव के सीमित होते जाने का प्रश्न भी है। सिविल सोसायटी लीडर्स के सामने अभी सबसे महत्वपूर्ण विकल्प यही है कि वे रणनीतिक संचार और कहानी-कहन को संस्थाओं की संस्कृति, योजना, क्षमता और रणनीति विकास का केंद्रीय हिस्सा बनायें क्योंकि रणनीतिक संचार और कहानी-कहन के बिना न तो उनकी परियोजनाओं का कोई प्रभाव होगा और न ही उनकी भूमिका और योगदानों की स्वीकार्यता होगी।

नागरिक समाज के नेतृत्व को सकारात्मक और सतत परिवर्तन के लिए आख्यानों को परत-दर-परत वृहद समाज तक पहुँचाना है। स्थानीय अनुभव से लेकर राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर तक एक ही सुदृढ़ संदेश निरंतरता और सामंजस्य के साथ पहुँचाये जाने की नितांत आवश्यकता है। नेतृत्व को यह भी देखना होगा वह स्वयं को मज़बूत रखे। आख़िर नेतृत्व कमजोर हो तो संदेश के बिखरने में देर नहीं लगती। सामाजिक नागरिक नेतृत्व को वह वास्तुकार बनना है जो परिवर्तनों को सहज और स्थायी बना सके।

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