आदिवासियों ने अपने खेतों के लिए मेहनत कर रास्ता बनाया

अजय यादव

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में पोहरी से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव बसा है अहेरा मङखेड़ा। इस गांव में मुख्य रूप से आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं, जिनका जीवन खेती-किसानी और कड़ी मेहनत पर टिका है। लेकिन उनके सामने एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी थी। उनके खेतों तक पहुंचने का रास्ता।
गांव के पास ‘कछार’ नाम का एक इलाका है जहां ग्रामीणों के खेत हैं। यहां पहुंचने के लिए ऊंचे पहाड़, पथरीली घाटियों और घने झाड़-झंखाड़ों से होकर गुजरना पड़ता था। बरसात के दिनों में तो स्थिति और भी बदतर हो जाती थी। रास्ता इतना दुर्गम और खराब था कि वहां कोई भी वाहन, यहां तक कि ट्रैक्टर भी नहीं पहुंच पाता था। मजबूरन किसानों को अपनी पूरी खेती पुराने ढंग से बैलों के सहारे करनी पड़ती थी, जिसमें बहुत अधिक समय और मेहनत बर्बाद होती थी।
सबसे ज्यादा परेशानी तब होती थी जब फसल तैयार हो जाती। कोई रास्ता न होने के कारण पुरुषों और महिलाओं को अनाज की भारी बोरियां अपने सिर पर लादकर, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों से होते हुए मुख्य मार्ग तक लानी पड़ती थीं। ग्रामीणों ने कई सालों तक शासन और प्रशासन से इस रास्ते को बनवाने की गुहार लगाई, लेकिन जब कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई, तो गांव के हर इंसान ने ठान लिया कि अब वे अपनी किस्मत खुद बदलेंगे।
इस बदलाव की नींव गांव के ‘विकास समूह’ की बैठकों में रखी गई। समूह के सक्रिय सदस्य तेज सिंह आदिवासी ने सबको समझाया कि अगर हम मिलकर रास्ता बना लें, तो ट्रैक्टर नीचे खेतों तक पहुँचने लगेंगे और हमारी आधी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी। विकास समूह की ही दूसरी सदस्य तारा बाई ने गांव की महिलाओं को एकजुट किया। उन्होंने कहा कि सिर पर अनाज ढोने की सबसे ज्यादा मार महिलाओं पर पड़ती है, इसलिए हम सबको मिलकर इस रास्ते को सुधारना ही होगा।
रास्ता बनाने का यह काम पिछले 5 सालों पहले भी समुदाय के द्वारा बनाया गया था। लेकिन हाल ही में, जब बारिश ने पुराने रास्ते को फिर से काट दिया, तो गांव वालों ने आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला किया। लम्पी आदिवासी जैसे बुजुर्गों ने युवाओं का हौसला बढ़ाया और मार्गदर्शन किया।
गांव के हर घर से लोग निकल आए। हाथों में गेंती, फावड़े और सब्बल लेकर आदिवासियों ने लगातार 6 दिनों तक जी-तोड़ मेहनत की। उन्होंने रास्ते में आने वाली कंटीली झाड़ियों को साफ किया, बड़े पत्थरों को हटाया और पहाड़ की कठोर मिट्टी को खोदकर उसे समतल बनाया। यह केवल शारीरिक श्रम नहीं था, बल्कि पूरे गांव के मान-सम्मान की लड़ाई थी।
6 दिनों के उस अथक परिश्रम के बाद वह शुभ दिन भी आ गया, जब घाटियों और चट्टानों के बीच से एक साफ रास्ता निकल आया। अब अहेरा मङखेड़ा के खेतों तक ट्रैक्टर आसानी से पहुंच सकते हैं। किसानों को अब सिर पर बोझ ढोने की जरूरत नहीं पड़ती और वे कम समय में आधुनिक तरीके से अपनी खेती कर पा रहे हैं।
इस गांव में सामाजिक संस्था विकास संवाद कई सालों से समुदाय के साथ स्वास्थ्य, पोषण, पर्यावरण और अन्य विषयों कई सालों से काम कर रही है।
