बकरी चराने से बीएससी तक निशा की कहानी

राकेश कुमार मालवीय

सामाजिक संस्थाओं के लिए स्टोरी टेलिंग की विधा के प्रशिक्षक
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कोटड़ी अजमेर नागौर और जयपुर की सीमा पर बसा एक गांव है। रुपनगढ़ से 19 किलोमीटर दूर बसे इस गांव का पानी खारा है, जिससे यहां पर खरीफ सीजन की केवल एक ही फसल वर्षा के पानी से हो पाती है। ज्यादातर लोग खारे पानी की सांभर झील पर मजदूरी करने जाते हैं। वहां नमक बनाने का काम किया जाता है।

इसी गांव में निशा का जन्म् 1999 में हुआ। पिता को अस्थमा था। ज्यादा काम नहीं बनता था। घर की जिम्मेदारी मां पर थी। पशुपालन से ही घर चलता था। बकरियां इस क्षेत्र के लिए ज्यादा ठीक थीं। मां बकरी पालकर ही घर चला रही थी।

निशा भी मां के साथ बकरी चलाने जाती। स्कूल से उसका कोई वास्ता नहीं था। बकरियां चलाए या स्कूल जाए? जाहिर है ऐसे में बकरियां ही चरा सकती थी। निशा ऐसी अकेली लड़की नहीं थी, इस इलाके में ऐसी कई और मजबूर लड़कियां थीं जो कई वजहों से पढ़ नहीं पाती थीं।

मंथन समाजसेवी संस्था इस क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक विषयों पर काम कर रही थी। संस्था ने इस इलाके में किशोरियों की शिक्षा में आने वाली समस्याओं की पहचान की और नाइट स्कूल खोला। यह स्कूल शाम को दो घंटे चला करता। शिक्षा के साथ इसमें विभिन्न गतिविधियां भी होतीं। 

निशा 2004 में इस नाइट स्कूल में जाने लगी। दिन में घर और खेतों का काम करती और रात को दो घंटे पढ़ाई करती। 2004 से 2009 तक निशा इस स्कूल में नियमित रूप से जाती रही। उसे पढ़ना अच्छा लगता था। वह सीख रही थी।

2009 में मंथन संस्था ने नाइट स्कूल को बालिका शिक्षा निकेतन में बदलने का निर्णय लिया। इसे और बेहतर बनाने की कवायद की गई। औपचारिक कक्षाएं शुरू कीं। अब समस्या यह थी कि निशा दिन में बकरियां चराती थी—इसलिए स्कूल जाना संभव नहीं था।

एक दिन संयोग से मंथन संस्था के संरक्षक श्री तेजाराम जी को पता चला कि निशा स्कूल नहीं आ पा रही है। वे उसके घर पहुंचे। वहां मालूम हुआ कि घर की आर्थिक स्थिति कमजोर है और इसलिए निशा का काम करना जरूरी है। बालिका शिक्षा निकेतन के शिक्षक और स्टाफ भी उसके घर पहुंचे और उसकी मां को समझाने की कोशिश की कि निशा पढ़ेगी तो उसका भविष्य बदलेगा।

यह सुनना जितना आसान है, उस समय एक मां के लिए उतना ही कठोर निर्णय था। काम करने वाली बेटी को स्कूल भेजना, लेकिन निशा की जिद उसके हक में काम आई। वह स्कूल जाने लगी—कभी देर से आती, कभी थकी रहती। स्कूल ने उसकी स्थिति समझते हुए पूरा सहयोग दिया। वह पांचवी, छठी करती हुई आठवीं कक्षा तक पहुंच गई।

लेकिन यहां एक और चुनौती थी। गांव का स्कूल केवल आठवीं तक ही था। मंथन संस्था और गांव के लोगों की मदद से सभी बच्चों का प्रवेश राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में करा दिया गया। निशा ने मेहनत की, पढ़ाई जारी रखी और 2016 में कोटड़ी गांव की पहली टॉपर बनी। उसने 10वीं बोर्ड में 75.50% अंक हासिल कर गार्गी पुरस्कार प्राप्त किया।

अब समस्या नई थी—कोटड़ी में कोई वरिष्ठ विद्यालय नहीं था, और निशा को विज्ञान में आगे पढ़ना था। घर में किसी को नहीं पता था कि विज्ञान वर्ग क्या होता है, सबको लगा, अब बहुत पढ़ लिया।

लेकिन निशा की जिद कायम थी। अगर 10वीं कर ली है, तो 12वीं क्यों नहीं! घर की आर्थिक स्थिति खराब थी, इसलिए उसकी मां ने साफ मना कर दिया। निशा दो–तीन दिन रोती रही। तभी उसे मंथन स्कूल के विदाई समारोह में समन्वयक के कहे शब्द याद आए ‘अगर जीवन या पढ़ाई में कोई संकट आए, तो मंथन के दरवाज़े तुम्हारे लिए 24 घंटे खुले हैं।‘

ये शब्द उसके लिए आख़िरी उम्मीद थे। वह सीधे मंथन पहुंची। अगले ही दिन उसे खबर मिली कि उसका प्रवेश रूपनगढ़ के तेजा मेमोरियल विद्यालय (कोटड़ी से 13 किमी दूर) में हो गया है। अब वह रोज बस से स्कूल जाती और पढ़ाई करती।

दो साल में उसे कई अच्छे दोस्त मिले, और सबने उसका साथ दिया। 12वीं के बाद उन्हीं दोस्तों की मदद से उसने आरके गर्वमेंट कॉलेज में बीएससी में प्रवेश ले लिया। गांव वालों के सहयोग से उसने पढ़ाई जारी रखी और बीएससी प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की।

निशा अब संस्था में काम करना चाहती है। उसने बात की तो संस्था ने उसे यह मौका दिया। आज वह मंथन में एक मजबूत फेसीलिटेटर के रूप में काम कर रही है। उसे केरल, यूपी, दिल्ली, राजस्थान सहित कई जगहों पर जाने और सीखने का अवसर भी मिला। आज वह गांव की उन सभी आवाज़ों के लिए एक जवाब बन चुकी है—जो पूछा करती थीं— “लड़की पढ़कर क्या करेगी?” निशा कहंती है—“लड़की पढ़कर बहुत कुछ कर सकती है।

निशा न केवल खुद पढ़ी बल्कि अपने दो छोटे भाईयों को भी पढ़ा रही है। उसके पिता का जनवरी 2025 में निधन हो गया। अब वह अपने परिवार का सहारा बन गई है। एक संस्था और उसकी छोटी—छोटी पहल कैसे किसी व्यक्ति के जीवन में सहारा बनते हैं, यह निशा की कहानी से समझ आता है।

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