प्राकृतिक खेती जुड़ी है मानवीय मूल्यों से

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया में कृषि का स्वरूप तेजी से बदला। रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और संकर बीज आधुनिक कृषि के आधार बन गए। खेती धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होती चली गई और उद्योगों पर निर्भर हो गई।

आज औद्योगिक कृषि के परिणाम हमारे सामने हैं—मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, पानी का संकट, बढ़ती लागत और किसानों पर बढ़ता कर्ज। भारत में भी कृषि शिक्षा और अनुसंधान के अधिकांश संस्थान रासायनिक खेती और उन्नत बीजों के प्रचार-प्रसार के केंद्र बनकर रह गए हैं। ऐसे माहौल में प्रकृति आधारित खेती की बात करना कई लोगों को आदर्शवादी कल्पना जैसा लगता है।

लेकिन इसी निराशाजनक परिदृश्य के बीच कुछ किसान ऐसे भी हैं जो यह साबित कर रहे हैं कि खेती केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन और समाज को जोड़ने वाली प्रक्रिया भी है। ऐसे ही एक किसान हैं सुभाष शर्मा, जो महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के यवतमाल जिले में प्राकृतिक खेती का प्रयोग कर रहे हैं।

विदर्भ : संकट के बीच उम्मीद

विदर्भ का नाम आते ही सबसे पहले कपास की खेती और किसानों की आत्महत्याओं की खबरें याद आती हैं। यवतमाल जिले की आबादी करीब 20 लाख है और यहां मुख्यतः कपास की खेती होती है। पिछले दो दशकों में यह इलाका किसानों की आत्महत्या के कारण पूरे देश में चर्चा का विषय रहा है।

कर्ज, सूखा और खेती की बढ़ती लागत ने हजारों किसानों को निराशा के ऐसे दौर में धकेल दिया कि उन्होंने जीवन समाप्त करने तक का फैसला कर लिया। महाराष्ट्र में पिछले दस वर्षों में 60 हजार से अधिक किसानों की आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं। ऐसी परिस्थितियों में सुभाष शर्मा का प्रयोग केवल खेती का प्रयोग नहीं, बल्कि उम्मीद की कहानी भी है।

रासायनिक खेती से मोहभंग

सुभाष शर्मा हमेशा से प्राकृतिक खेती नहीं करते थे। 1975 से लेकर 1994 तक उन्होंने भी रासायनिक खेती की। शुरुआत में उत्पादन अच्छा मिला और आमदनी भी बढ़ी। लेकिन कुछ ही वर्षों में स्थिति बदलने लगी। वे बताते हैं कि पहले कपास की पैदावार प्रति एकड़ 12 क्विंटल तक होती थी, लेकिन धीरे-धीरे यह घटकर 3–4 क्विंटल रह गई।

ज्वार की पैदावार 20 क्विंटल से घटकर लगभग 7 क्विंटल रह गई। सब्जियों में रोग फैलने लगे और मिट्टी में फफूंद बढ़ने लगी। कुल मिलाकर खेती की लागत बढ़ती जा रही थी और उत्पादन घटता जा रहा था। इसी समय उन्हें जापान के कृषि वैज्ञानिक मासानोबू फुकूओका की प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी मिली।

फुकूओका की प्रसिद्ध पुस्तक “द वन स्ट्रॉ रेवोल्यूशन” ने दुनिया भर में प्राकृतिक खेती को लेकर नई बहस छेड़ी थी। सुभाष शर्मा इस विचार से प्रभावित हुए और धीरे-धीरे रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर मुड़ गए।

तिउसा का खेत बना खेती की पाठशाला

यवतमाल जिले के तिउसा गांव में सुभाष शर्मा का 17 एकड़ का खेत है, जिसमें से 13 एकड़ पर खेती होती है। बाकी जमीन गायों और घर के लिए है। आज यह खेत केवल खेती का स्थान नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केंद्र बन चुका है।

देश के विभिन्न हिस्सों से किसान यहां आते हैं, खेती को समझते हैं और प्रशिक्षण लेते हैं। सुभाष शर्मा कहते हैं—“यहां किताबों से नहीं, खेत से सीखने को मिलता है। मिट्टी, पेड़, पक्षी, कीट, पशु—सब हमारे शिक्षक हैं।”

प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते हुए सुभाष शर्मा ने सबसे पहले मिट्टी को समझना शुरू किया। उनका कहना है कि मिट्टी कोई निर्जीव पदार्थ नहीं है। यह एक जीवित संरचना है जिसमें असंख्य सूक्ष्म जीवाणु, केंचुए, फफूंद और जैव पदार्थ मौजूद रहते हैं।

यही जीव मिट्टी को उर्वर बनाते हैं। लेकिन रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों ने इन जीवों का संतुलन बिगाड़ दिया है। मिट्टी की इस जीवंतता को वापस लाने के लिए उन्होंने खेत में जैविक खाद, मल्चिंग, हरी खाद और फसल चक्र जैसी विधियों को अपनाया।

मिट्टी को जीवित करने की कोशिश

मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए वे देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से जैविक खाद तैयार करते हैं। इस खाद में पानी, गोबर, गोमूत्र और गुड़ मिलाकर कुछ दिनों तक सड़ाया जाता है। इससे जीवाणुओं से भरपूर तरल खाद तैयार हो जाती है। जब इसे खेत में डाला जाता है तो मिट्टी में सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है और मिट्टी धीरे-धीरे उर्वर होने लगती है।

इसके साथ ही वे खेत की मिट्टी को खुला नहीं छोड़ते। फसल के अवशेष, घास, पत्तियां और भूसा जमीन पर फैला देते हैं। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और धीरे-धीरे यह जैविक खाद में बदल जाता है।

प्राकृतिक खेती में पेड़ों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सुभाष शर्मा ने अपने खेत में लगभग 200 पेड़ लगाए हैं—पीपल, नीम, आम, जामुन, इमली, कटहल, अर्जुन और कई अन्य पेड़। इन पेड़ों से खेत का तापमान नियंत्रित रहता है और पक्षियों का बसेरा भी बनता है।

पक्षी कीट नियंत्रण में मदद करते हैं और मधुमक्खियां परागण में। पेड़ों की पत्तियां गिरकर मिट्टी में मिल जाती हैं और जैविक खाद का काम करती हैं।

पानी का प्रबंधन

विदर्भ सूखा प्रभावित क्षेत्र है। इसलिए पानी का प्रबंधन खेती का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुभाष शर्मा ने अपने खेत में कंटूर फार्मिंग, माइक्रो लॉकिंग और जल संचयन जैसी तकनीकों का उपयोग किया है। इससे बारिश का पानी खेत में ही रुक जाता है और धीरे-धीरे जमीन के भीतर समा जाता है। इस वजह से उनके खेत के कुओं में पूरे साल पानी बना रहता है।

प्राकृतिक खेती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है देसी बीजों का संरक्षण। सुभाष शर्मा बाजार से बीज नहीं खरीदते। उनके पास कई पीढ़ियों से सुरक्षित देसी बीज हैं, जिन्हें उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों से भी एकत्र किया है। देसी बीज स्थानीय मिट्टी और मौसम के अनुकूल होते हैं और विपरीत परिस्थितियों में भी टिके रहते हैं।

सुभाष शर्मा केवल एक फसल पर निर्भर नहीं रहते। उनके खेत में चना, अरहर, मूंग, सोयाबीन, हल्दी, अदरक, भिंडी, कद्दू, मेथी, प्याज, टमाटर और केला जैसी कई फसलें होती हैं।

फसल विविधता से जोखिम कम होता है और बाजार में बेहतर आय की संभावना भी बढ़ती है। आज उनके खेत से सालाना लगभग 25 लाख रुपये का कारोबार होता है, जिसमें से करीब 13 लाख रुपये का शुद्ध लाभ होता है।

खेती और मानवीय संबंध

लेकिन सुभाष शर्मा की खेती की सबसे बड़ी विशेषता केवल उत्पादन नहीं है। उनका मानना है कि खेती केवल मिट्टी से जुड़ी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों से भी जुड़ी है। उनके खेत पर लगभग 40 मजदूर साल भर काम करते हैं, जिन्हें वे मजदूर नहीं बल्कि “भाई-बहन” कहते हैं।

वे उन्हें नियमित मजदूरी के साथ बोनस भी देते हैं और कई बार तीर्थ यात्राओं पर भी ले जाते हैं। उनके खेत पर काम करने वाले कई मजदूरों के खातों में 3–4 लाख रुपये तक की बचत हो चुकी है।

सुभाष शर्मा एक और अलग प्रयोग करते हैं। वे महिलाओं को पुरुषों से अधिक मजदूरी देते हैं। उनका तर्क है कि महिलाएं सुबह से घर के काम करती हैं और फिर खेत में काम करने आती हैं, इसलिए उनका श्रम अधिक होता है।

सुभाष शर्मा का मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल कृषि पद्धति नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन दृष्टि है। इसमें मिट्टी, पानी, बीज, पशु, पेड़, पक्षी और मनुष्य—सभी एक दूसरे से जुड़े हैं। इस खेती में मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक बनता है।

निष्कर्ष

सुभाष शर्मा का प्रयोग बताता है कि खेती केवल उत्पादन बढ़ाने की तकनीक नहीं है। यह मिट्टी की सेहत, पानी के संरक्षण, जैव विविधता और सामाजिक संबंधों से जुड़ी प्रक्रिया है।

प्राकृतिक खेती में उत्पादन के साथ-साथ मानवीय मूल्यों का भी स्थान है—साझेदारी, सहयोग और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता। आज जब खेती संकट के दौर से गुजर रही है, तब ऐसे प्रयोग यह याद दिलाते हैं कि प्रकृति की ओर लौटना केवल विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता भी है।

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