मुस्कराहट की वापसी

चौका प्रणाली ने बदल दी लोगों की तकदीर…

गोचर बचेगा तो गाय बचेगी!
गाय बचेगी तो गांव बचेगा!!

चौका प्रणाली ने लोगों के चेहरों से गुम हुई हंसी ओर मुस्कुराहट को वापस लौटाया है। जब यह गांव ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा था, तब चौका ने इसे प्रेम की माला में संजोने जैसा कार्य किया है। इतना ही नहीं, लोगों को प्रकृति से जोड़ने की दिशा भी प्रदान की है। साथ ही, गांव के हर प्राणी को खुशी से जीवन जीने का आधार दिया है। गोचर को हरा-भरा करके पर्यावरण को संरक्षण और वन्य जीवों को सुरक्षा दी है। गांव में शांतिमय वातावरण बनने के साथ सब का विकास हुआ है आईये जानें, यह अद्भुत काम कैसे हुआ।

यह कहानी बालापुरा गांव की है, जो राजस्थान के टोंक जिले के मालपुरा उप खण्ड के मलिकपुर ग्राम पंचायत का राजस्व गांव है। गांव में गुर्जर, गुसाईं और हरिजन समाज के लोग रहते हैं। इसकी कुल आबादी लगभग 2500 है। पशुधन में छोटे-बड़े पशुओं को मिलाकर 1700-1800 की संख्या है। इनका पैतृक काम खेती और पशुपालन है। खेती बरसात पर निर्भर रहती है। बरसात अच्छी होने पर फसल अच्छी हो जाती है, बरसात समय पर पर्याप्त नहीं होने पर फसल नहीं होती है।

वर्ष 2002-03 के अकाल में इनके खेतों में ना तो अनाज हुआ ना ही गोचर में चारा। ऐसे विकट समय में लोगों के पास पलायन करने और अपने पशु बेचने के अलावा ओर कोई रास्ता नहीं बचा था। लोग मवेशियों को बचाने के लिए पलायन करने लगे और एक के बाद एक पलायन पर जाने लगे। गांव के गांव मवेशियों के साथ खाली होने लगे। गाँवों की चहल-पहल खत्म हो गयी, चौपालों पर सन्नाटा छाने लगा। यह गांव भी एक ढाणी में बदलता नजर आने लगा। क्योंकि आधे से अधिक लोग पलायन कर गये थे। वे साल में आठ नौ माह मवेशियों के साथ बाहर ही रहते थे। इसी वजह से परिवार के सदस्यों को रात में नींद व दिन में खुशी नहीं मिल पा रही थी।

सच तो यही है कि गांव छोड़कर जाने वालों का दुख लिखकर बयान नही किया जा सकता। दूसरी जगह हर कोई बेगाना लगता था। चारों ओर देखते तो अंधकार के अलावा कुछ नजर नहीं आता था। ऐसे में नींद क्या, पेट की भूख भी मिट जाती थी। बस कुछ हंसी-खुशी के पलों के साथ बचपन की यादें गांव में ही रह गई। आप क्या जानो गांव छूटने का दर्द। दिनभर मवेशी चराना और रात में चौकीदारी करना। पूरी जिंदगी मानो पशुओं तक ही सिमट कर रह गई थी। जब गांव आते ओर अपने गोचर की ओर देखते तो कुछ भी दिखाई नहीं देता था। गोचर में वनस्पति के नाम पर कुछ भी नहीं बचा था। बरसाती पानी के साथ उपजाऊ मिट्टी बहकर चली गई और गोचर बंजर हो गया था।

वर्ष 2002-03 में सायर देवी गुर्जर का लापोडिया आना हुआ। लापोडिया में इनका पीहर है। इन्होंने अपने भाई रामकरण गुर्जर को साथ लेकर ग्राम विकास नवयुवक मंडल लापोडिया संस्था के सचिव श्रीमान् लक्ष्मण सिंह जी से मुलाकात की। उन्हें अपने गांव की दुख भरी कहानी सुनाई। इसके बाद संस्था के कार्यकर्ताओं ने उनके गांव का भ्रमण किया और गांव के लोगों को लापोडिया गोचर का भी भ्रमण करवाया। उन्हें जल संरक्षण के बारे में समझाया गया कि जल है तो सब कुछ है। अगर जल नहीं तो कुछ नहीं। लोगों को लापोडिया की जल संरक्षण नीति और चौका प्रणाली से गोचर विकास की तकनीक पसंद आई। उन्होंने इस बारे में आपस में लोगों से चर्चा भी की।

इसके बाद गांव में पन्द्रह सदस्यों की ग्राम विकास समिति बनी। इसमें दस पुरुष और पांच महिलाऐं चुनी गयींं। समिति निर्माण के बाद गोचर विकास प्लान पर काम शुरू हुआ। समिति व संस्था ने पूरे 600 बीघा जमीन का भ्रमण किया। इस दौरान गोचर का ढलान, मवेशी पेयजल के लिए नाडियां निर्माण की जगह का चयन, गोचर में से जाने वाले रास्ते और वनस्पति को ध्यान में रखते हुए पूरे गोचर विकास का प्लान तैयार किया गया।

प्लान के अनुसार टाॅप स्तर से गोचर में चौका निर्माण का काम शुरू हुआ। चौका प्रणाली निर्माण कर गोचर में नौ इंच बरसाती जल को रोकने का काम किया और अधिक पानी को प्लानिंग के अनुसार बनाई गई नाडियो में जुटाया गया। इससे गोचर में नमी बढ़ी ओर वनस्पति पनपने लगी। देखते ही देखते गोचर हरा-भरा हो गया। गोचर में विभिन्न प्रकार की घास व तरह-तरह के पेड़ उग आये। हमें यकीन नहीं हुआ कि बंजर पड़ी गोचर भूमि में यह करिश्मा कैसे हो गया। बस यह करिश्मा पानी का था। सभी लोगों ने मिलकर चौका प्रणाली बनाने में दिल से मेहनत की थी। यह करिश्मा चौका प्रणाली बनने के दो-तीन साल बाद देखने को मिला।

वर्ष 2002-03 से शुरू करके 2004-05 तक 600 बीघा गोचर में चौका प्रणाली का काम पूरा किया गया। इस दौरान मवेशी पेयजल के लिए तीन नाडियो का निर्माण भी हुआ। चौका प्रणाली से मवेशियों का पलायन रुका है। वर्तमान में गांव का एक भी परिवार मवेशियों के साथ पलायन नही करता है, बल्कि गांव में छोटे पशुओं की संख्या बढ़कर दुगनी हो गई है। सभी मवेशियों को गोचर में चरने के लिए अच्छी और उनकी मनपसंद घास मिलती है।

मवेशियों को सालभर में तैंतीस प्रकार की घास खाने को मिलती है, और गर्मियों में देशी बबूल की लूग पाती पर्याप्त मात्रा में मिलती है। यह पातड़ी मवेशियों के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। देशी बबूल पर गर्मियों के दिनों में फल के रूप में पातड़ी आती है, जो मवेशियों के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। इससे मवेशियों के दूध की मात्रा में 20-30 प्रतिशत की वृद्धि होती है। उन्हें बीमारी भी कम होती है। यह सब कमाल गोचर में चौका प्रणाली का ही है।

समिति ने अपना काम यहीं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने गांव में रहने वाले हर प्राणी के बारे में सोचा। हर प्राणी के लिए प्लान किया। गोचर में पक्षियों के रहने के लिए 5-6 बीघा में एक बगीची बनायी गयी। इस बगीची में घास और पेड़ लगाकर चारों ओर से बाड़ बनाकर बंद किया गया। बगीची में लोगों का और मवेशियों का आवागमन बंद किया। ताकि पक्षी अपने आप को सुरक्षित महसूस करें ओर अंडे देने लगें।

समिति ने गोचर प्रबंधन और रखरखाव के नियम भी बनाये। गांव में परिवारों की आय बढ़ाने केे लिए गिर नस्ल की गाय और मालपुरी भेड़ रखने के लिए लोगों को प्रेरित किया गया। देव ऊठनी एकादशी पर आजीविका के सभी संसाधनों की पूजा करना व हरियाली को बढ़ाने तथा पर्यावरण को बचाने का संकल्प लेकर पेड़ों को रक्षासूत्र बांधने जैसी पहल भी की गयी। इस गांव का विकास गांव जैसा ही हुआ है, इसलिए यहां पर शान्ति और सहभागिता के साथ सब का विकास हुआ है।

रामेश्वर, ग्राम विकास नवयुवक मंडल, लापोडिया, संपर्क नंबर 9680946355
(यह कहानी रणनीतिक संचार केन्द्र, विकास संवाद के सिविक आख्यान पहल के तहत तैयार की गई है। केन्द्र सामाजिक—नागरिक संस्थाओं के रणनीतिक संचार और स्टोरीटेलिंग पर क्षमतावृद्धि कार्यक्रम संचालित कर रहा है।)

Scroll to Top