उम्मीद की किरण

बंजर धरती ने यूं ओढ़ी हरियाली की चादर

राजस्थान के दिल में, चंबल नदी के किनारे बसा एक छोटा सा गांव है, ओंड। यह गांव करौली जिले के मंद्रायल ब्लॉक में बीहड़ क्षेत्र के अंतर्गत आता है। गांव कुल 1224.9 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला है। ओंड गांव में 246 परिवार हैं। यहां की कुल जनसंख्या 1275 है। इस समुदाय की खासियत इसकी विविधता में निहित है, जहाँ लगभग 56% लोग अनुसूचित जाति और जनजाति से संबंध रखते हैं, जबकि बाकी लोग सामान्य वर्ग से हैं।

यहां बहुत से छोटे और सीमांत किसान हैं, जो बारिश पर अधिक निर्भर थे। उनकी ज़मीन समतल न होने के कारण, मानसून के दौरान पानी खेतों में नहीं रुकता था। तेज़ पानी के बहाव के कारण मिट्टी भी धीरे-धीरे कटने लगी, जिससे किसानों को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा। इनकी फ़सलें भी कमज़ोर हो गईं और आय भी कम होने लगी। इसका असर यह हुआ कि लोगों को ग़रीबी का सामना करना पड़ा, और उनमें गुस्सा भी बढ़ने लगा।

इस ग़ुस्से की वजह से कई किसान लकड़ी की तस्करी में लग गए। पेड़ों की कटाई में कमाई की वजह से बहुत से किसान इसमें शामिल हो गए, जिससे यहां के जंगल भी धीरे-धीरे नष्ट होने लगे। इसके साथ ही लोग रोज़गार की खोज में शहरों की ओर पलायन करने लगे।

जीवन की जद्दोजहद
ओंड के लोग मुश्किलों के आदी हो चुके थे। केवल 20% ज़मीन ही खेती के लायक थी, बाकी मिट्टी कटाव से खत्म हो चुकी थी। पानी की कमी ने उनकी खेती को मुश्किल बना दिया था। फसलें सूख गईं और उनके बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने भी मुरझा गए। अनुसूचित जातियों और जनजातियों से आने वाले लोगों के लिए तो यह संघर्ष और भी कठिन था।

उम्मीद की किरण: जन जागृति ग्राम विकास समिति का गठन
लेकिन इसी निराशा के बीच, कुछ अद्भुत हुआ। सृजन नामक एक गैर-लाभकारी संगठन, जो जल, जंगल, ज़मीन, जानवर और जीवन के विभिन्न पहलुओं पर काम करता है और ग्रामीण विकास के लिए प्रतिबद्ध है, यहां काम करने पहुंचा। संगठन ने इस गांव में एक नई आशा की किरण जगाई। हालांकि, सृजन के लिए यह कार्य आसान नहीं था। उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सबसे पहले, उन्हें यहां के किसानों का विश्वास जीतना पड़ा। उनके सहयोग से गांववालों ने जन जागृति ग्राम विकास समिति का गठन किया, जिसने गांव में बदलाव की नींव रखी। गांव के 98 सदस्यों ने ₹100-₹100 मिलाकर एक कोष बनाया ताकि गांव को बचाने के लिए खुद पहल की जा सके। उन्हें अहसास हो गया था कि अगर उन्हें अपने गांव को बचाना है, तो खुद ही कुछ करना होगा।

बदलाव की लड़ाई: चुनौतियाँ और मेहनत
ओंड को बदलने का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। सबसे पहले, गांववालों को यह समझाना जरूरी था कि नई विधियाँ उनके लिए कैसे लाभकारी होंगी। कई लोग संदेह में थे क्योंकि उन्होंने पहले भी ऐसी कई पहलों को असफल होते देखा था। इसलिए सबसे पहले उन्हें एक्सपोज़र विज़िट पर ले जाया गया ताकि वे समझ सकें कि फील्ड बंडिंग कैसे की जाती है और इसके क्या फायदे होते हैं।

शुरुआत में गांव में कुछ किसानों ने फील्ड बंडिंग की। जब बाकी लोगों ने इसके परिणाम महसूस किए, तो वे भी आगे आने लगे। जब अधिकतर किसान फील्ड बंडिंग के लिए इच्छुक हो गए, तब जन जागृति ग्राम विकास समिति ने किसानों के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सबसे पहले उन किसानों की फील्ड बंडिंग की गई जो अधिक जरूरतमंद थे।

फील्ड बंडिंग की मदद से मिट्टी के बहाव को रोका गया। इसके साथ ही पानी भी खेतों में ही रुकने लगा। इस वजह से किसानों की फ़सलों की पैदावार बढ़ने लगी। सोलर सिंचाई और माइक्रो इरिगेशन जैसी नई तकनीक को समझने और अपनाने में समय लगा, लेकिन गांववालों की मेहनत और लगन आखिरकार रंग ले ही आयी।

फील्ड बंडिंग, जिसे मेढ़बंदी भी कहा जाता है, खेत में पानी के संरक्षण और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए की जाती है। इसे मिट्टी की मदद से खेत के किनारों पर उभरी हुई मेढ़ या बांध बनाकर किया जाता है। मिट्टी से मेढ़बंदी के लिए ट्रैक्टर का उपयोग होता है। चटाई (ट्रॉली) की मदद से मिट्टी को लगभग 50 मीटर की दूरी से मेढ़ पर डाला जाता है। आमतौर पर 1 मीटर ऊँचा बंड बनाया जाता है, जो पानी और मिट्टी को रोकने में सहायक होता है।

मेढ़बंदी के लिए किसान को कुल लागत का 20% देना होता है, जबकि शेष 80% लागत संस्था देती है। इस तरह, किसान को आर्थिक बोझ से राहत मिलती है और वे जल संरक्षण और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।

इसी तरह सोलर पैनल लगाने के लिए किसान को कुल लागत का 50% वहन करना होता है, जबकि शेष 50% लागत संस्था देती है। पहले जब सोलर पंप नहीं थे, तब किसान केवल खरीफ के मौसम में बाजरा उगा पाते थे, जो पूरी तरह से मानसून पर निर्भर था। लेकिन सोलर पंप लगाने के बाद अब किसानों की मानसून पर निर्भरता कम हो गई है। अब किसान रबी के मौसम में भी सरसों की खेती कर पाते हैं, जिससे उनकी आमदनी में वृद्धि हुई है। सोलर पंप ने सिंचाई के लिए पर्याप्त और निरंतर पानी उपलब्ध कराना संभव बना दिया है, जिससे किसानों को पूरे साल फसल उगाने का अवसर मिला है। पिछले साल सरसों बेचने से किसानों को ₹50,000 का मुनाफा हुआ।

बंजर ज़मीन से हरे-भरे खेतों तक
धीरे-धीरे परिणाम सामने आने लगे। 233.88 हेक्टेयर भूमि में फील्ड बंडिंग से से मिट्टी का कटाव रुक गया, और बंजर ज़मीन फिर से उपजाऊ हो गई। सोलर पंपों से साल भर सिंचाई संभव हो गई, जिससे परिदृश्य बदल गया। माइक्रो इरिगेशन तकनीक ने पानी की हर बूंद का सही उपयोग सुनिश्चित किया, जिससे फसलें स्वस्थ हुईं और उपज बढ़ी।

अनीता शर्मा, एक स्थानीय किसान, याद करती हैं कि कैसे उनकी बंजर ज़मीन ने फिर से फसलें उगाना शुरू किया। ‘हमने उम्मीद खो दी थी, लेकिन अब हमारी ज़मीन उपजाऊ है, और हमारे बच्चे स्वस्थ हैं।‘ मिथलेश, एक और किसान, कहते हैं: “सोलर पैनल ने सब कुछ बदल दिया है। अब हम अपने खेतों की सिंचाई कर सकते हैं और साल भर फसलें उगा सकते हैं।”

एक गांव का रूपांतरण
आज, ओंड एक पुनर्जीवित गांव है। जो खेत कभी बंजर थे, वे अब हरे-भरे हो गए हैं। जन जागृति ग्राम विकास समिति, सृजन के सहयोग से, ने न केवल भूमि को बल्कि उन लोगों के जीवन को भी बदल दिया है जो ओंड को अपना घर कहते हैं।
यह कहानी उम्मीद, दृढ़ता और सामुदायिक शक्ति की है। ओंड गांव ने साबित कर दिया है कि जब लोग एकजुट होते हैं, तो वे सबसे बड़ी चुनौतियों को भी पार कर सकते हैं।

उदय कुमार साव और मोहम्मद शाकिब खान, सृजन संस्था , संपर्क नंबर 70427 31670
(यह कहानी रणनीतिक संचार केन्द्र, विकास संवाद के सिविक आख्यान पहल के तहत तैयार की गई है। केन्द्र सामाजिक—नागरिक संस्थाओं के रणनीतिक संचार और स्टोरीटेलिंग पर क्षमतावृद्धि कार्यक्रम संचालित कर रहा है।)

Scroll to Top